Gurudwara Aarti Sahib: सिखों के आदिगुरु गुरु नानक देव जी का श्री जगन्नाथपुरी से एक अलग ही लगाव था, इसी स्थान पर पहली बार गुरुसाहिब ने भगवान जगन्नाथ के छवि को देखकर पंजाबी आरती गगन में थाल की रचना की थी.. इतना ही जब गुरु नानक देव जी को मंदिर के पुजारियों ने प्रवेश नहीं करने दिया था तब खुद भगवान ने भी भक्तों से मुंह मोड़ लिया था, और मंदिर के पीछे बैठे गुरु नानक देव जी की भक्तिमय भजन को सुनने के लिए मुड़ गए थे.. जिसके बाद पुजारियों ने गुरु साहिब को मंदिर के प्रांगण में बुलाया था।
जगन्नाथ मंदिर के पास गुरुद्वारा श्री आरती साहिब
जगन्नाथपुरी में ही गुरु साहिब की मुलाकात संत श्री चैतन्य प्रभु से भी हुई थी.. गुरु साहिब द्वारा मीठे पानी का कुआं बनाने की याद में एक गुरुद्वारा बाओली साहिब भी मौजूद है, लेकिन करीब 500 साल बीत जाने के बाद भी दुबारा यहां गुरुद्वारा नही बनवाया जा सका था, जिसकी मांग काफी संमय से हो रही थी। जिसके बाद आखिरकार 500 सालों के इंतजार के बाद जगन्नाथ मंदिर के पास एक और गुरुद्वारा बना, जिसका नाम है गुरुद्वारा श्री आरती साहिब। अपने इस वीडियो में हम गुरुद्वारा आरती साहिब के बारे में जानेंगे।
सिख धर्म की स्थापना करने वाले सिखों के पहले गुरु गुरु नानक देव जी ने जो परम ज्ञान पाया था, उस ज्ञान को, मानवता की सेवा की सबसे बड़ा धर्म है, जो दुनिया के बाहरी आंडबरो और भेदभाव से परे है, इस भाव को दुनिया के कोने कोने में पहुंचाने के लिए उन्होंने भारत के चारो दिशाओं में यात्रायें की। जिसमें उन्होंने 1508 में उड़िसा के पुरी के प्रसिद्ध मंदिर भगवान जगन्नाथ पुरी के मंदिर की यात्रा की थी।
इस मंदिर में पहली बार उन्हें उस अदृश्य स्वामी निरंकार के होने का अहसास हुआ था, जिनकी वो तलाश में थे। गुरु साहिब के वहां आगमन का पहला सबूत है गुरुद्वारा बाओली साहिब.. यहां खुद गुरु साहिब के आदेश पर भाई मरदाना ने समुद्र तल पर गड्ढा खोदा.. जहां से मीठा पानी निकलने लगा, जहां इसके आसपास एक बाउली यानि की कुआं बनवा दिया गया, जिसे गुरु साहिब के बेटे श्रीचंद जी ने बाउली साहिब नाम से ऐतिहासिक स्मारक का रूप दिया।
सिखों की धरोहर का प्रतीक गुरु साहिब की गाई हुई आरती
वहीं उसके बाद फिर से यहां एक गुरुद्वारा बनवाया गया, जिसे गुरु साहिब के गाई आरती के सम्मान मे नाम दिया गया गुरुद्वारा श्री आरती साहिब। 1508 में गुरु साहिब के यहां आगमन और उनके गाई आरती को याद कर साल 2010 में श्री गुरु नानक देव जी धार्मिक एवं धर्मार्थ ट्रस्ट के मुख सेवक बाबा शमशेर सिंह जी ने करीब 500 सालों के बाद यहां फिर से एक गुरुद्वारा बनवाया था।
दरअसल 2007 में पहली बार अमृतसर के श्री अकाल तख्त में इस बात पर चर्चा की गई कि जगन्नाथ पुरी में गुरु साहिब की गाई हुई आरती के एक स्मृति साहिब होना ही चाहिए, जो गुरु साहिब की और सिखों की धरोहर का प्रतीक है, और श्री अकाल तख्त में पाँच सिंह साहिबानों ने हुकुमनामा जारी कर पुरी में गुरुद्वारा श्री आरती साहिब बनवाने का फैसला किया, ये बाबा शमशेर सिंह जी की देखरेख में स्थापित किया जायेगा।
बलिया पांडा में गुरूद्वारे के लिए जमीन खरीदी
उन्होंने ही समुद्र तट के पास बलिया पांडा में गुरूद्वारे के लिए जमीन खरीदी और निर्माण का पूरा भार अपने कंधो पर ले लिया। 4 अप्रैल 2010 को जत्थेदार तख्त श्री पटना साहिब जी ने गुरुद्वारा श्री आरती साहिब का उद्घाटन किया। चार मंजिला गुरुद्वारा काफी भव्य और सफेद पत्थर से बना हुआ है। जो कि रोजाना सुबह 4 बजे संगतो के लिए खोला जाता है और रात को 10.30 बजे तक खुला रहता है। इस गुरुद्वारे में 24 घंटे और सातो दिन लंगर की सुविधा मौजूद है। जो हर किसी के लिए हमेशा खुला रहता है। इतना ही नहीं बाहर से आने वाले भक्तो के लिए इसके परिसर में किफायती आवास भी दिये जाते है ताकि गुरुद्वारे में आने वाले संगतो को किसी तरह समस्या का सामना न करना पड़े।
इस गुरुद्वारे में श्रद्धालुओ की भीड़ रहती है लेकिन बावजूद इसके यहां आने वालों को एक अलग सी मानसिक शांति और आध्यत्मिकता का अहसास होता है। हालांकि सिखो के जगन्नाथपुरी काफी अहम माना जाता है लेकिन ये एक हिंदू बहुल इलाका है, और यहां सिख न के बराबर रहते है, मगर सिख श्रद्धालु अपने धरोहर का पूरा ख्याल रखते है.. गुरुद्वारा श्री आरती साहिब के निर्माण में भी शायद इसलिए 5 सदी का समय लग गया क्योंकि इस स्थान पर सिखों की संख्या काफी कम है, जिससे उनका प्रभाव कम है। लेकिन भले ही देर से मगर सिखों की संस्कृति को बड़ी पहचान मिल ही गई। अगर आप जगन्नाथ पुरी जाते है तो आपको इन ऐतिहासिक गुरुद्वारों के दर्शन भी जरूर करने चाहिए।
































