Fall of Sikh Empire: 1845 से लेकर 1849 का साल सिख साम्राज्य और ब्रिटिश हुकूमत दोनों के लिए ही बेहद अहम रहे। जिस सिख साम्राज्य को हथियाने के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने एड़ी से छोटी का जोर लगा दिया था और बड़ी बेसब्री से इंतजार किया महाराजा रणजीत सिंह के मृत्यु का। उन्हें महाराजा की मृत्यु के बाद भी सिख साम्राज्य जैसी मजबूत सल्तनत को अपने अधीन करने के लिए 10 साल का लंबा इंतजार करना पड़ा था। अनगिनत युद्ध लड़ने पड़े थे, अगर सिख सम्राज्य के दगाबाजों ने धोखा न दिया होता तो अकेली महारानी जिंद कौर सिख सम्राज्य को एक रिजेंट के तौर पर बखूबी संभाल सकती थी।
लेकिन अंग्रेजी हुकुमत ने 1845 में जो किया था वो काफी नहीं थी.. पंजाब पर भारी कर और जुर्माना लगाने के बाद भी उन्हें डर था कि कहीं सिख फिर से वापसी न कर दें, जिस डर के कारण उन्होंने फिर से 1849 में दूसरा एंग्लो सिख वॉर लड़ा…जिसके बाद सिख सम्राज्य का पतन पूरी तरह से हो गया है। अपने इस वीडियो में हम दूसरे एंग्लो सिख वॉर के बारे में बात करेंगे.. जिसने सिखों से सबसे बड़ी ताकत ही नहीं छीनी, बल्कि पंजाब पर अंग्रेजों के अधिकार की कहानी भी लिखी थी।
जब गद्दारों ने डुबोई महाराजा रणजीत सिंह की सल्तनत
1846 अंग्रेजी हुकुमत पंजाब के अंदर आ गई और सिखों की हार हुई और अंग्रेजो ने 9 मार्च 1846 को लाहौर की संधि करके पंजाब पर अनाधिकारिक रूप से अधिकार कर लिया था। संधि के तहत सिखों को युद्ध के हर्जाने के रूप में करीब 1.5 करोड़ रूपय का हर्जाना ब्रिटिश हुकुमत को देना पड़ा। उसके अलावा जालंधर दोआबा क्षेत्र और जम्मू कश्मीर पर भी अधिकार जमा लिया था। इसके अलावा माहाराजा दलीप सिंह को केवल नाम का राजा माना गया औऱ लाहौर दरबार में ब्रिटिश रेजिडेंट सर हेनरी लॉरेंस को नियुक्त कर दिया गया जो दरबार की हर गतिविधि पर नजर रखे हुए था। सिखों की सेना को सिमित कर दिया गया.. जिससे उनकी ताकत कमजोर होने लगी थी। लेकिन अंग्रेजी हुकूमत को इसके बाद भी लग रहा था कि जब तक वो पूरी तरह से पंजाब को ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन नही कर लेते, पंजाब जाने का खतरा बना रहेगा।
मात्र 4 सरदारों के पास ही नियंत्रण
अंग्रेजो के भीतर के शक को तब हवा मिली जब पंजाब के दक्षिणी हिस्से में बगावत शुरु हो गई। सिख दरबार में महारानी फिर से अपनी ताकत को पाने की कोशिशे कर रही थी, लेकिन लॉरेंस की चाल के कारण उन्हें दरबार से निर्वासित कर दिया गया। इससे कुछ सिख दरबारी काफी नाराज थे। सिख सरदारों से क्षेत्रीय और न्यायिक नियंत्रणों को काफी हद से छीन लिया गया और मात्र 4 सरदारों के पास ही नियंत्रण रह गया, जिसमें सरदार छत्तर सिंह अटारीवाला झेलम और सिंधु के बीच के क्षेत्र को, सरदार कहान सिंह मान लाहौर को सरदार राम सिंह जल्लावाला छज दोआब को और सरदार लेहना सिंह मजीठिया रावी के दक्षिण-पूर्व और माझा के इलाको को नियंत्रित करते थे।
पंजाबी वायसराय दीवान मूलराज का शासन
सब कुछ कुछ सालों तक तो ठीक ही रहा लेकिन जब सर हेनरी की तबियत खराब हुई तो वो इंग्लैंड वापिस चले गए और गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौज़ी ने सर फ्रेडरिक क्यूरी को नियुक्त कर दिया, जो कि बेहद सख्त और तेज था..जो भी रिपोर्ट उसे भेजी जाती वो बेहद सख्ती से जांच करता था, जिसका नतीजा ये हुआ कि हजारा के राजनीतिक एजेंट जेम्स एबॉट ने सरदार छत्तर सिंह अटारीवाला के शासन व्यवस्था की रिपोर्ट भेजी थी, जिसे ये शक जाहिर किया था कि वो बाकि के सरदारो के साथ मिलकर विद्रोह की साजिश कर रहे है, लेकिन सर फ्रेडरिक क्यूरी ने इस रिपोर्ट पर कार्यवाई करने से साफ इंकार कर दिया था, लेकिन दूसरी तरफ मुल्तान में विरोध की आग जल उठी.. पहले एंग्लो सिख युद्ध के बाद मुल्तान को एक आजाद राज्य घोषित किया गया जिसपर पंजाबी वायसराय दीवान मूलराज ने शासन करना शुरु कर दिया। लेकिन लाहौर दरबार ने उसके बदले अच्छी खासी रकम मांगी, मगर मूलराज ने ऐसा करने के बजाय अपने बेटे को मुल्तान की गद्दी सौंपने का फैसला किया।
अधिकारी लेफ्टिनेंट विलियम एंडरसन कौन था?
मगर अंग्रेजी हुकुमत अब पीछे नहीं बटने वाली थी, क्यूरी ने सरदार कहान सिंह मान को राज्यपाल नियुक्त किया और एक ब्रिटिश राजनीतिक एजेंट, लेफ्टिनेंट पैट्रिक वैन्स एग्न्यू को साथ मुल्तान भेज दिया। यहां तक सब ठीक ही था लेकिन 18 अप्रैल 1848 को, कहान सिंह और वंस एग्न्यू , एक और अधिकारी लेफ्टिनेंट विलियम एंडरसन के साथ मुल्तान पहुंचा तो मुलराज ने किले की चाबियाँ सौंप तो दीं लेकिन जैसे ही किले पर कब्जा शुरु हुआ मुलराज के अनियमित सैनिकों के एक दल और भीड़ ने हमला कर दिया, जिसमें दोनो अंग्रेजी अधिकारी बुरी तरह से घायल हो गये…किसी तरह मस्जिद में जाकर जान बचाने की कोशिश तो की गई लेकिन अगले दिन भीड़ ने दोनो की हत्या कर दी। जिससे पहली बार पंजाब में अशांति और विद्रोह की आग तेज हो गई। लाहौर दरबार में कुछ को छोड़ कर सभी विद्रोह करने लगे और मूलराज को समर्थन करने लगे। ये था आगाज दूसरे एंग्लो सिख वॉर का।
1848 को सुद्दूसैन में युद्ध
जिसके बाद अंग्रेजी हुकुमत ने तय कर लिया था कि अब हमला आमने सामने होगा। 18 जून 1848 को लेफ्टिनेंट एडवर्ड्स तोपों के साथ बहावलपुर पर हमला कर दिया, जिससे सिख सैना कमजोर पड़ गई औऱ अंग्रेजो की जीत हुई, उसके बाद 1 जुलाई 1848 को सुद्दूसैन में युद्ध हुआ और यहां सिख सैनिक तोपो के आगे धाराशाई हो गई..उसके बाद मुल्तान की बारी थी, जुलाई 1848 के अंत में क्यूरी ने बंगाल सेना के कमांडर-इन-चीफ सर ह्यू गॉफ को चिट्ठी लिख कर मुल्तान में युद्ध के ले भारी संख्या में सेना मांगी थी, मगर केवल क छोटी टुकड़ी पहुंची, जिसके बाद क्यूरी ने 18 से 28 अगस्त के बीच खालसा सेना के साथ साथ अनिमियत सेनिकों को भी घेरेबंदी के लिए कहा।
लेकिन कुछ ही समय के बाद छत्तर सिंह ने भी विद्रोह कर दिया, वहीं सितंबर में शेर सिंह की सेना भी विद्रोह कर दिया। जिसके बाद ठंड के मौसम में बॉम्बें सेना को बुलाया गया, जिसके बाद 17,000 सैनिकों और 64 तोपों के साथ मुल्तान के किले की घेरेबंदी शुरु की गई, और 2 जनवरी 1849 को पहले तो शहर पर कब्जा किया गया और फिर 22 जनवरी को मुल्तान के किले पर कब्जा कर लिया गया।
अब बारी थी लाहौर की.. अंग्रेजी सेना ने लाहौर की तरफ कूच कर दिया मगर रास्ते में रुंगुर मुज़ल किले में रहने वाले शेर सिंह अटारीवाला ने लाहौर दरबार के खिलाफ जाकर अंग्रेजी सेना पर हमला कर दिया, कुछ देर के लिए तो जीत हुई औऱ फिर हार गए, लेकिन 13 जनवरी 1849 को झेलम नदी के पास चिल्लियांवाला ब्रिटिश सेना का सामना शेर सिंह से हुआ था, इस युद्ध में शेर सिंह भारी पड़े और अंग्रेजी हुकूमत को कुछ समय के लिए हार का सामना करना पड़ा.. लेकिन उससे उनकी काफी बेज्जती हुई जिसके बाद जनरल चार्ल्स जेम्स नेपियर को नियुक्त किया गया.. अंग्रेजो की ताकत काफी ज्यादा थी।
शेर सिंह ने वाल्टर गिल्बर्ट के सामने किया आत्मसमर्पण
12 मार्च को, छत्तर सिंह और शेर सिंह ने रावलपिंडी के पास सर वाल्टर गिल्बर्ट के सामने आत्मसमर्पण कर दिया.. खैबर दर्रा अंग्रेजी हुकुमत के हाथों में चला गया, और अफगानी सेना भी पीछे हट गई.. और 29 मार्च को सिख सैनिकों ने पूरी तरह से हथियार डाल दिये और खालसा सेना को भंग कर दिया। जिसके बाद लॉर्ड डलहौज़ी ने 2 अप्रैल 1849 को घोषणा कर दी कि अब से पंजाब ईस्ट इंडिया कंपनी का हिस्सा होगा। इस युद्ध के बाद सिख अंग्रेजी सेना का हिस्सा बन गए.. और अंग्रेजो ने सिखों की ताकत को पहचाना और उन्हें अपनी सेना का एक अहम हिस्सा बना लिया था।































