Dev Anand Guru Dutt shirt story: साल 1946 में, पुणे के प्रभात फिल्म स्टूडियो में दो युवा अपनी किस्मत आजमाने की कोशिश कर रहे थे-एक अपनी एक्टिंग का जादू बिखेरने को बेताब था और दूसरा कैमरे के पीछे अपनी दुनिया तलाश रहा था। देव आनंद और गुरु दत्त, दोनों के सपने बड़े थे लेकिन जेब खाली।
वैसे जब हम एवरग्रीन एक्टर देव आनंद और फिल्ममेकर गुरुदत्त के बारे में सोचते हैं, तो हमें उनका ज़बरदस्त हुनर और ‘बाज़ी’ या ‘सीआईडी’ जैसी फिल्में याद आती हैं। लेकिन इस साझेदारी के पीछे एक कटी-फटी अलमारी, बदली हुई कमीजें और एक बेहद दिलचस्प किस्सा छिपा है। आइए इस वीडियो के जरिए जानते हैं कैसे एक शर्ट की अदला-बदली ने बॉलीवुड का इतिहास हमेशा के लिए बदल दिया।
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धोबी की गलती से बने दोस्त
ये उन दिनों की बात है जब देव आनंद (Dev Anand) और गुरु दत्त (Guru Dutt) पुणे के ‘प्रभात फिल्म स्टूडियो’ में अपनी पहचान बनाने के लिए स्ट्रगल कर रहे थे। दोनों एक ही गेस्ट हाउस में रुकते थे, सपने बड़े थे और इत्तेफाक देखिए… दोनों के कपड़े भी एक ही धोबी धोया करता था। एक दिन धोबी ने गलती से देव आनन्द की शर्ट गुरु दत्त के यहाँ और गुरु दत्त की शर्ट देव आनंद के यहाँ पहुँचा दी। इत्तेफाक से उस दिन देव आनंद को एक फ्रेंड की बर्थडे पार्टी में जाना था और उन्हें अलमारी में अपनी शर्ट नहीं मिली। जल्दीबाज़ी में उन्होंने वही शर्ट पहन ली जो धोबी वहाँ छोड़ गया था।
लेकिन जैसे ही देव आनंद पार्टी के लिए निकलने को हुए, गेस्ट हाउस के गलियारे में उनकी नज़र एक ऐसे शख्स पर पड़ी, जो बिल्कुल उनकी पसंदीदा शर्ट पहने खड़ा था! वो शख्स कोई और नहीं, बल्कि गुरु दत्त थे। देव आनंद मुस्कुराते हुए उनके पास गए और मज़ाक में पूछा—”भाई, आपकी शर्ट बड़ी अच्छी है, कहाँ से ली?”
इस पर गुरु दत्त ने बड़े भोलेपन से फुसफुसाते हुए जवाब दिया—”अरे यार, मेरी नहीं है। आज धोबी कपड़े नहीं लाया, तो अलमारी में जो ठीक लगी पहन ली… किसी को बताना मत!” गुरु दत्त की ये बेबाकी और सादगी देख देव आनंद ठहाका मारकर हँस पड़े और बोले—”मगर भाई, ये शर्ट मेरी है!” शर्ट की इसी अदला-बदली और ठहाके के साथ शुरू हुई बॉलीवुड की वो दोस्ती, जिसने आगे चलकर सिनेमा का इतिहास बदल दिया। यहीं से उनकी वह दोस्ती शुरू हुई जो लाइफ टाइम रही।
Dev Anand और Guru Dutt ने किया वादा
क्योंकि दोनों ही उस समय स्ट्रगल कर रहे थे और सिनेमा को लेकर दोनों की सोच काफी मिलती थी, इसलिए दोनों ने एक-दूसरे से एक वादा किया। और वो वादा ये था कि फ्यूचर में गुरु दत्त जब भी कोई फिल्म डायरेक्ट करेंगे, तो देव आनंद को ही उसका हीरो बनाएंगे। और देव आनंद ने वादा किया कि जब भी वे अपनी खुद की फिल्म प्रोड्यूस करेंगे, तो गुरु दत्त को बतौर डायरेक्टर पहला मौका देंगे।
आगे चलकर देव आनंद (Dev Anand) ने जब अपना प्रोडक्शन हाउस ‘नवकेतन फिल्म्स’ शुरू किया, तो उन्होंने अपना वादा निभाया और साल 1951 में फिल्म ‘बाज़ी’ के डायरेक्शन की कमान गुरु दत्त (Guru Dutt) को सौंप दी। यह फिल्म गुरु दत्त के करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई।
तो, ये थी कहानी बॉलीवुड की उस दोस्ती की, जिसकी नींव भले ही एक धोबी की गलती से पड़ी थी, लेकिन उसने हमें सिनेमा के दो ऐसे अनमोल रत्न दे दिए जिनकी चमक आज भी फीकी नहीं पड़ी है। तो आपको यह दिलचस्प किस्सा कैसा लगा, हमें कमेंट्स में ज़रूर बताएं।














































