Bihar Flood News: बिहार और बाढ़ का नाता दशकों पुराना है, लेकिन इस आपदा से निपटने के तरीके आज भी पुराने हैं। हर साल जब उत्तर बिहार डूबता है, तो सोशल मीडिया पर वायरल होते वीडियो और बदहाल लोगों की तस्वीरें सरकार के बड़े-बड़े दावों की पोल खोल देती हैं। राहत और मुआवजे के चक्रव्यूह में फंसी जनता अब पूछ रही है कि आखिर कब तक दावों और जमीनी हकीकत का यह फासला बना रहेगा और कब उन्हें इस सालाना बर्बादी से स्थायी मुक्ति मिलेगी?
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बड़े-बड़े दावे और जमीनी हकीकत
दावों की चमक अक्सर जमीनी सच के आगे फीकी पड़ जाती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 2015 में घोषित हुआ बिहार का बहुचर्चित 1.25 लाख करोड़ का विशेष पैकेज है, जिसे लेकर चुनावी मंचों पर बड़े-बड़े दावे किए गए थे। बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राज्य के चौमुखी विकास, बुनियादी ढांचे और बाढ़ नियंत्रण परियोजनाओं के लिए 1.25 लाख करोड़ के विशेष वित्तीय पैकेज की घोषणा की गई थी।
हालांकि, बाद के वर्षों में विपक्ष और सूचना के अधिकार (RTI) से मिली जानकारियों के आधार पर सवाल उठाए गए कि इस पैकेज में कई पुरानी और पहले से जारी केंद्रीय योजनाओं की राशि को ही नए आंकड़ों के रूप में शामिल कर लिया गया था। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की जनता आज भी पूछ रही है कि क्या एक दशक बीत जाने के बाद भी उत्तर बिहार की कई महत्वपूर्ण बाढ़ नियंत्रण और तटबंध निर्माण परियोजनाएं आज भी कछुआ गति से चल रही हैं या फाइलों में अटकी हुई हैं।
कागजों पर 11,000 करोड़, जमीन पर वही पुरानी बेबसी
बिहार में बाढ़ के स्थायी समाधान के नाम पर केंद्रीय बजट में कोसी, गंडक और बागमती जैसी विनाशकारी नदियों के लिए 11,000 करोड़ से ज्यादा के प्रोजेक्ट्स की घोषणा की गई। लेकिन जब बात इन योजनाओं के क्रियान्वयन (Implementation) की आती है, तो रफ्तार सुस्त पड़ जाती है।
यही वजह है कि सुपौल से लेकर पूर्णिया और दरभंगा से लेकर सीतामढ़ी तक, जनता को इस बड़े बजट का कोई सीधा असर देखने को नहीं मिला है। हर साल नदियाँ उफान पर होती हैं, तटबंध टूटते हैं और लाखों की आबादी को अपनी ही जमीन पर शरणार्थी बनना पड़ता है। यह विरोधाभास साफ दिखाता है कि जब तक बजट फाइलों से निकलकर जमीन पर ईमानदारी से लागू नहीं होगा, तब तक प्लास्टिक की पन्नियों के नीचे कटती जिंदगी का यह सच नहीं बदलेगा।
Bihar Flood को लेकर तत्काल राहत के दावे भी फेल!
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकारी दावों और तैयारियों के बावजूद हर साल मानसून आते ही कई तटबंध ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं। इस पर विपक्षी दल लगातार यह आरोप लगाते रहे हैं कि तटबंधों की मरम्मत और बाढ़ राहत सामग्री के वितरण में बड़े पैमाने पर प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार होता है। यही वजह है कि वास्तविक पीड़ितों तक सूखा राशन और सरकार द्वारा घोषित 7,000 प्रति परिवार की तात्कालिक सहायता राशि का एक बड़ा हिस्सा समय पर या सही तरीके से नहीं पहुँच पाता।
वहीं दूसरी तरफ, इस त्रासदी के स्थायी समाधान के रूप में दशकों से भारत-नेपाल सीमा पर कोसी नदी पर ‘हाई-डैम’ (उच्च बांध) बनाने की चर्चा की जाती रही है। हालांकि, भारत और नेपाल के बीच कूटनीतिक असहमति और अंतरराष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अंतर के कारण यह महत्वाकांक्षी योजना आज भी केवल फाइलों और चुनावी वादों तक ही सीमित है।














































