मुसलमान नहीं चाहते हिन्दू- मुस्लिम भाईचारा, भीमराव अम्बेडकर ने आखिर ऐसा क्यों कहा?…

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 20 Mar 2023, 12:00 AM | Updated: 20 Mar 2023, 12:00 AM

भीमराव रामजी आंबेडकर, जिन्हें बाबासाहेब आंबेडकर के नाम से भी जाना जाता है. आंबेडकर स्वतंत्र भारत के सर्वप्रथम कानून मंत्री, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, और समाज सुधारक भी थे. उन्होंने दलितों, श्रमिकों, किसानों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन भी किया था. लेकिन आपको शायद ये नहीं पता होगा की आंबेडकर इस्लाम धर्म की मुखर खिलाफत करते थे. वजह थी उनकी धर्म के प्रति कट्टरता. उनके लिए देश में सबसे पहले कुरान आता है न की संविधान. उन्होंने अपने कई बयानों में खुलकर इस्लाम धर्म की आलोचना की है. और वो भी तार्किक और उन्ही के रिवाजों पर  आज का लेख उसी पर आधारित है कि आखिर किस तरह की विचारधारा के चलते आंबेडकर ने मुसलमानों में कभी बौध्द धर्म का प्रचार नहीं किया बल्कि जहाँ मौका मिला वहां उनका विरोध किया और जमकर आलोचना की.

इस्लाम में नहीं हुआ कभी समाज सुधार आन्दोलन

आंबेडकर ने इस्लाम धर्म की हिंदू धर्म से तुलना करते हुए इस्लाम की इसलिए भी आलोचना की थी कि इस्लाम में हिंदू धर्म की तरह कभी भी कोई समाज सुधार आन्दोलन नहीं हुआ. वे अपने धर्म में मौजूद बुराइयों को पीढ़ी दर पीढ़ी ढोते रहे जबकि इसके उलट हिंदू धर्म में समय-समय पर कई ऐसे समाज सुधार आन्दोलन हुए जिसके परिणामस्वरूप हिंदू धर्म के अनुयायियों ने एक समाज के रूप में तरक्की की. 

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इस्लाम धर्म में मौजूद सामाजिक बुराइयों पर आंबेडकर ने अपने एक बयान में कहा, “मुसलमानों में इन बुराइयों का होना दुःखद है. लेकिन उससे भी ज्यादा दुखद बात ये है कि भारत के मुसलमानों में समाज सुधार का ऐसा कोई संगठित आंदोलन नहीं उभरा जो इन बुराइयों का सफलतापूर्वक उन्मूलन कर सके. हिंदुओं में भी अनेक सामाजिक बुराइयां हैं. लेकिन इस धर्म की खास बात ये है कि उनमें से अनेक इनकी मौजूदगी से भली भांति परिचित हैं. और उनमें से कुछ उन बुराइयों को समाज से मिटाने के लिए सक्रिय तौर पर आंदोलन भी चला रहे हैं.

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दूसरी ओर मुसलमान यह महसूस ही नहीं करते कि ये बुराइयां हैं. जिसकी वजह से वो मुस्लिम समाज में पनप रही बुराइयों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाते. इसके ठीक उल्टा, अपनी मौजूदा प्रथाओं में किसी भी परिवर्तन का विरोध करते हैं. यह उल्लेखनीय है कि मुसलमानों ने केंद्रीय असेंबली में 1930 में पेश किए गए बाल विवाह विरोधी विधेयक का भी विरोध किया था, जिसमें लड़की की विवाह योग्य आयु 14 वर्ष और लड़के की 18 वर्ष करने का प्रावधान था. मुसलमानों ने इस विधेयक का विरोध इस आधार पर किया कि ऐसा किया जाना मुस्लिम धर्मग्रंथ द्वारा निर्धारित कानून के विरुद्ध होगा. उन्होंने इस विधेयक का हर चरण पर विरोध ही नहीं किया, बल्कि जब यह कानून बन गया तो उसके खिलाफ सविनय अवज्ञा अभियान भी छेड़ा.”

इस्लाम धर्म में लोकतंत्र की प्रमुखता नहीं: आंबेडकर

इस्लाम धर्म में लोकतंत्र की कमी को उजागर करते हुए आंबेडकर लिखते हैं,  “मुसलमानों की सोच में लोकतंत्र के कोई मायने नहीं है. उनकी सोच को प्रभावित करने वाला तत्व यह है कि लोकतंत्र प्रमुख नहीं है. उनकी सोच को प्रभावित करने वाला तत्व यह है कि लोकतंत्र, जिसका मतलब बहुमत का शासन है, हिंदुओं के विरुद्ध संघर्ष में मुसलमानों पर क्या असर डालेगा. क्या उससे वे मजबूत होंगे अथवा कमजोर ? यदि लोकतंत्र से वे कमजोर पड़ते हैं तो वे लोकतंत्र नहीं चाहेंगे. वे किसी मुस्लिम रियासत में हिंदू प्रजा का मुस्लिम शासक की पकड़ कमजोर करने के बजाए अपने निकम्मे राज्य को वरीयता देंगे.”

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“मुस्लिम संप्रदाय में राजनीतिक और सामाजिक गतिरोध का केवल ही कारण बताया जा सकता है. मुसलमान सोचते हैं कि हिंदुओं और मुसलमानों को सतत संघर्षरत रहना चाहिए. हिंदू मुसलमानों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास करते हैं, और मुसलमान अपनी शासक होने की ऐतिहासिक हैसियसत बनाए रखने का.”

मुस्लिम नेताओं की भी आलोचना की

आंबेडकर ने तत्कालीन मुस्लिम राजनीति को केंद्र में रखते हुए मुस्लिम नेताओं की भी आलोचना की थी. उन्होंने अपने बयान में कहा, “मुसलमानों द्वारा राजनीति में अपराधियों के तौर-तरीके अपनाया और दंगे इस बात के पर्याप्त संकेत हैं कि गुंडागर्दी उनकी राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है. चेकों के विरुद्ध सुडेटेन जर्मनों ने जिन तौर-तरीकों को अपनाया था वे उसका जानबूझकर तथा समझते हुए अनुकरण करते प्रतीत हो रहे हैं.” 

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वैश्विक नहीं सिर्फ मुस्लिम भाई चारे की करते हैं बात

इस्लाम में अक्सर भाईचारे की बात की जाती है. अमन-चैन और सभी कौमों के एक साथ रहने की बात की जाती है. इस बारे में बाबासाहब ने कहा था कि इस्लाम जिस भाईचारे को बढ़ावा देता है, वह एक वैश्विक या सार्वभौमिक भाईचारा नहीं है. बाबासाहब के इस कथन से झलकता है कि वह इस्लाम में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ जैसी किसी भी धारणा होने की बात को सिरे से ख़ारिज कर देते हैं. इसका पता हमें उनकी इस बात से पता चलता है. 

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“इस्लाम में जिस भाईचारे की बात की गई है, वो केवल मुस्लिमों का मुस्लिमों के साथ भाईचारा है. इस्लामिक बिरादरी जिस भाईचारे की बात करता है, वो उसके भीतर तक ही सीमित है. जो भी इस बिरादरी से बाहर का है, उसके लिए इस्लाम में कुछ नहीं है- सिवाय अपमान और दुश्मनी के. इस्लाम के अंदर एक अन्य खामी ये है कि ये सामाजिक स्वशासन की ऐसी प्रणाली है, जो स्थानीय स्वशासन को छाँट कर चलता है. एक मुस्लिम कभी भी अपने उस वतन के प्रति वफादार नहीं रहता, जहाँ उसका निवास-स्थान है, बल्कि उसकी आस्था उसके मज़हब से रहती है. मुस्लिम ‘जहाँ मेरे साथ सबकुछ अच्छा है, वो मेरा देश है’ वाली अवधारणा पर विश्वास करें, ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता.”

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भारत को अपनी मात्रभूमि मानने से करते हैं इनकार

बाबासाहब ने कहा था कि इस्लाम कभी भी किसी भी अपने अनुयाई को यह स्वीकार नहीं करने देगा कि भारत उसकी मातृभमि है. बाबासाहब के अनुसार, इस्लाम कभी भी अपने अनुयायियों को यह स्वीकार नहीं करने देगा कि हिन्दू उनके स्वजन हैं, उनके साथी हैं. पाकिस्तान और विभाजन पर अपनी राय रखते हुए बाबासाहब ने ये बातें कही थीं. आंबेडकर की इन बातों पर आज ख़ुद को उनका अनुयायी मानने वाले भी चर्चा नहीं करते, क्योंकि ये उनके राजनीतिक हितों को साधने का काम नहीं करेगा. अपना धर्म बदलने की घोषणा करने वाली मायावती भी इस बारे में कुछ नहीं बोलतीं. 

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बाबा साहब कहते थे कि कोई भी मुस्लिम उसी क्षेत्र को अपना देश मानेगा, जहाँ इस्लाम का राज चलता हो. इस्लाम में जातिवाद और दासता की बात करते हुए आंबेडकर ने कहा था कि सभी लोगों का मानना था कि ये चीजें ग़लत हैं और क़ानूनन दासता को ग़लत माना गया, लेकिन जब ये कुरीति अस्तित्व में थीं, तब इसे सबसे ज्यादा समर्थन इस्लामिक मुल्कों से ही मिला. उन्होंने माना था कि दास प्रथा भले ही चली गई हो लेकिन मुस्लिमों में जातिवाद अभी भी है. आंबेडकर का ये बयान उन लोगों को काफ़ी नागवार गुजर सकता है, जो कहते हैं कि हिन्दू समाज में कुरीतियाँ हैं, जबकि मुस्लिम समाज इन सबसे अलग है. आंबेडकर का साफ़-साफ़ मानना था कि जितनी भी सामाजिक कुरीतियाँ हिन्दू धर्म में हैं, मुस्लिम उनसे अछूते नहीं हैं. ये चीजें उनमें भी हैं.

आपके ख्याल में बाबा साहब द्वारा मुसलमानों की कुरीतियों पर दिए तर्क और की गयी आलोचनाएं कितनी सही और तार्किक हैं और क्यों. क्या मुस्लिम समाज के लिए बाबा साहब द्वारा कही ये बात सच थी या फिर एक बयानबाजी? क्योंकि एक वक़्त पर उन्होंने हिन्दू समाज को भी नहीं छोड़ा था.

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