Makkah Defense Agreement: पश्चिम एशिया में जारी भारी तनाव के बीच सऊदी अरब के सामने अपने अस्तित्व और ऊर्जा सुरक्षा को बचाने की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। अभी पिछले महीने ही, 7 अगस्त को सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने मिलकर बड़े जोर-शोर से ‘मक्का डिफेंस एग्रीमेंट’ पर दस्तखत किए थे। इस समझौते में सामूहिक सुरक्षा का कड़ा प्रावधान रखा गया था, जिसका सीधा मतलब था कि तीनों में से किसी भी एक मुल्क पर हमला बाकी दोनों पर भी हमला माना जाएगा। लेकिन हकीकत की जमीन पर यह समझौता महीने भर के भीतर ही बेअसर साबित होता दिख रहा है। समझौता साइन होने के बाद से अब तक सऊदी अरब के तेल और प्रमुख ऊर्जा ठिकानों पर कम से कम चार बड़े हमले हो चुके हैं, मगर संकट के इस दौर में उसके दोनों नए रक्षा साझेदार तुर्की और पाकिस्तान पूरी तरह खामोश बैठे हैं।
लाइफलाइन बनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन भी ठप| Makkah Defense Agreement
सऊदी अरब पर सबसे ताजा और करारा प्रहार रियाद और मदीना के बीच से गुजरने वाली मुख्य ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर हुआ। ड्रोन हमले के बाद भारी नुकसान को देखते हुए इस 1200 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन को बंद करना पड़ा। दरअसल, जारी जंग के चलते पिछले छह महीनों से दुनिया के सबसे अहम तेल मार्ग ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ से जहाजों की आवाजाही रुकी हुई है।
होर्मुज बंद होने के बाद सऊदी अरब अपने कच्चे तेल को बचाने के लिए पश्चिमी तट पर मौजूद यनबू बंदरगाह का सहारा ले रहा था। उसने अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन की क्षमता बढ़ाई ताकि समुद्री नाकेबंदी से बचकर एशियाई बाजारों को तेल भेजा जा सके। लेकिन इसी पाइपलाइन पर हुए हमले ने रियाद के इस बैकअप प्लान पर भी पानी फेर दिया।
यमन में हूतियों का बढ़ता दबदबा और दोतरफा घेराबंदी
सऊदी नेतृत्व के लिए असल सिरदर्द यमन के मोर्चे से बढ़ा है। यमन में सऊदी समर्थित बलों को पीछे धकेलते हुए हूती विद्रोहियों ने रणनीतिक रूप से अहम मोखा बंदरगाह शहर पर पूरी तरह नियंत्रण कर लिया है। लाल सागर के तटीय इलाकों पर काबिज होकर हूतियों ने अब बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य की चाबी अपने हाथ में ले ली है।
नक्शे पर देखें तो आज सऊदी अरब दोनों तरफ से पूरी तरह घिर चुका है। एक तरफ होर्मुज स्ट्रेट पर पहरा है, तो दूसरी तरफ बाब अल-मंदेब के मुहाने पर हूती डटे हुए हैं। अलग-अलग दिशाओं से ऊर्जा ठिकानों और रिफाइनरियों पर लगातार मिसाइलें और ड्रोन दागे जा रहे हैं।
अरबों के आधुनिक हथियार भी बेअसर, नई नीति की दरकार
इस पूरे घटनाक्रम ने सऊदी अरब की मौजूदा सुरक्षा रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। तेल की ढुलाई रुकने और हमलों के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव पड़ रहा है। सऊदी अरब के पास दुनिया के सबसे आधुनिक और महंगे हथियार मौजूद हैं, लेकिन वह उन्हें मैदान में ठोस नतीजों में बदलने में लगातार नाकाम साबित हो रहा है।
सऊदी अरब के लिए सबसे कड़वा सच यह है कि जिस मक्का गठबंधन को उसने अपना सबसे बड़ा रक्षा कवच माना था, वह किसी भी हमले को रोकने में नाकाम रहा है। मुश्किल वक्त में न तो पाकिस्तान की तरफ से कोई ठोस मदद आई और न ही तुर्की ने कोई सैन्य सहारा दिया। ऐसे में अगर रियाद ने अपनी रक्षा रणनीति और प्राथमिकताओं को नए सिरे से नहीं बदला, तो आने वाले दिनों में उसकी आर्थिक और सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा सकती है।












































