Bangladesh news: पड़ोसी देश बांग्लादेश से एक बेहद दर्दनाक और झकझोर देने वाला मामला सामने आया है, जिसने इंसानियत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जेल में बंद हिंदू अधिकार नेता और संत चिन्मय कृष्ण दास की 71 साल की मां संध्या रानी धर का गुरुवार सुबह चटगांव स्थित श्री श्री पुंडरीक धाम आश्रम में निधन हो गया। वह पिछले काफी समय से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से लड़ रही थीं। जिंदगी की अंतिम घड़ियों में इस लाचार मां की बस एक ही हसरत थी कि वह दम तोड़ने से पहले अपने बेटे का चेहरा एक नजर देख लें। लेकिन सिस्टम की बेरुखी और कानूनी दांव-पेंचों के चलते उनकी यह अंतिम इच्छा पूरी नहीं हो सकी और वे बेटे की राह तकते-तकते ही इस दुनिया को अलविदा कह गईं।
अस्पताल छोड़कर आश्रम में कर रही थीं बेटे की राह| Bangladesh news
संध्या रानी धर लंबे वक्त से कैंसर की गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं। बेटे की गिरफ्तारी के बाद से वह मानसिक रूप से बुरी तरह टूट चुकी थीं। अस्पताल के बेड पर रहने के बजाय उन्होंने अपने जीवन के आखिरी दिन अपने बेटे के आश्रम में बिताने का फैसला किया था।
उनके भाई अंजन कुमार धर ने बेहद रुंधे गले से अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि उनकी मां इस दुनिया से चली गईं और उनका भाई अपनी मां को जीवित रहते देख भी नहीं सका। अदालत से बार-बार चिन्मय दास की जमानत अर्जी खारिज होने और जेल के भीतर उनकी सेहत बिगड़ने की लगातार आ रही खबरों ने मां को भीतर से बिल्कुल तोड़ कर रख दिया था।
सिस्टम की बेरुखी: बीमार मां से मिलने नहीं मिली पैरोल
मां की तेजी से बिगड़ती हालत को देखते हुए परिवार ने बुधवार को चटगांव के डिप्टी कमिश्नर के सामने गुहार लगाई थी। उन्होंने चिन्मय दास को अपनी मरणासन्न मां से मिलने के लिए सशर्त पैरोल देने की मांग की थी। लेकिन प्रशासन ने इस मानवीय अपील को यह कहकर ठुकरा दिया कि बीमार परिजन से मिलने के लिए पैरोल देने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है; पैरोल केवल किसी परिजन की मौत के बाद ही दी जा सकती है।
अब मां के निधन के बाद, परिवार के दूसरे भाई रंजन कुमार धर डेथ सर्टिफिकेट और मेडिकल दस्तावेजों के साथ दोबारा पैरोल की अर्जी लगाने की तैयारी कर रहे हैं, ताकि चिन्मय दास कम से कम अपनी मां के अंतिम संस्कार में शामिल होकर उन्हें मुखाग्नि दे सकें।
क्या है चिन्मय कृष्ण दास का पूरा मामला?
बांग्लादेश सम्मिलित सनातन जागरण जोत के प्रवक्ता चिन्मय कृष्ण दास को 25 नवंबर 2024 को ढाका से गिरफ्तार किया गया था। हालांकि उन्हें दो मामलों में जमानत मिल चुकी थी, लेकिन दो अन्य मुकदमों के चलते वे लगातार जेल की सलाखों के पीछे हैं। अदालत में जब भी उनकी रिहाई की बात आई, जमानत अर्जियां लगातार खारिज होती रहीं।
एक बीमार मां का अपने बेटे को देखने के लिए तड़प-तड़प कर जान दे देना और प्रशासन का अंतिम पलों में भी बेटे को मां से न मिलने देना, अब लोगों के बीच भारी गुस्से का कारण बन गया है। सोशल मीडिया पर इस अमानवीय रवैये को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं और लोग सिस्टम की इस संवेदनहीनता पर सवाल उठा रहे हैं।












































