Crude oil price: पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य संघर्ष के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार पर एक और बड़ा संकट खड़ा हो गया है। अमेरिका और ईरान के बीच छिड़ी जंग की वजह से दुनिया का सबसे अहम समुद्री रास्ता ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ पहले से ही लगभग बंद पड़ा था। ऐसे में सऊदी अरब जिस वैकल्पिक रास्ते के जरिए अपना तेल सुरक्षित बाहर निकाल रहा था, अब वह लाइफलाइन भी खतरे में आ गई है। सऊदी अरब की करीब 1,200 किलोमीटर लंबी ‘ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन’ पर अचानक हुए ड्रोन हमले के बाद एहतियातन इसका संचालन रोक दिया गया है। इस घटना के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है और दाम 100 डॉलर का आंकड़ा पार करते हुए 109 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए हैं।
वैकल्पिक रास्ता भी ठप, 36 साल के निचले स्तर पर उत्पादन| Crude oil price
होर्मुज के समुद्री रास्ते पर मंडराते खतरे को देखते हुए सऊदी अरब अपने कच्चे तेल को सुरक्षित रखने के लिए इसी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के जरिए पश्चिमी तट पर स्थित यनबू बंदरगाह तक पहुंचा रहा था। यनबू से जहाजों के जरिए यह कच्चा तेल भारत और अन्य एशियाई मुल्कों को भेजा जा रहा था। लेकिन गुरुवार की सुबह रियाद और मदीना के इलाकों में पाइपलाइन को निशाना बनाकर ड्रोन दागे गए। मदीना के दक्षिण में पाइपलाइन से घना काला धुआं उठता देखा गया, जिसमें कुछ लोगों के घायल होने और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने की बात सामने आई है।
अधिकारियों का कहना है कि नुकसान का आकलन किया जा रहा है और सुरक्षा कारणों से तेल का प्रवाह रोका गया है। हमले का इशारा इराक की दिशा से होने की बात कही जा रही है। युद्ध के इस तनाव का असर यह हुआ है कि सऊदी अरब का कच्चा तेल उत्पादन गिरकर 36 साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है, वहीं अगस्त महीने में उसके कुल निर्यात में करीब 40 फीसदी की भारी गिरावट दर्ज की गई है।
दुनिया भर की 5 फीसदी सप्लाई पर सीधा असर
ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का बंद होना पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी इसलिए है, क्योंकि पिछले कुछ महीनों से इसके जरिए हर रोज लगभग 40 से 50 लाख बैरल कच्चा तेल निर्यात किया जा रहा था। यह मात्रा पूरी दुनिया की कुल तेल आपूर्ति का लगभग 4 से 5 प्रतिशत बैठती है। ऐसे नाजुक मोड़ पर, जब पारंपरिक समुद्री रास्ते बंद होने से बाजार में पहले से ही तेल की कमी का डर बना हुआ था, इस एकमात्र बड़े वैकल्पिक रूट का रुक जाना दुनिया भर की सप्लाई चेन को हिलाने के लिए काफी है।
भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और कच्चे तेल का बहुत बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से खरीदता है। सऊदी अरब भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता रहा है। आंकड़ों के लिहाज से देखें तो युद्ध भड़कने से पहले (सितंबर से फरवरी के दौरान) भारत को रोजाना करीब 7 लाख 43 हजार बैरल तेल मिल रहा था, जो फरवरी से अगस्त के बीच घटकर महज 4 लाख 40 हजार बैरल रह गया।
अब अगर यनबू बंदरगाह को जोड़ने वाली यह पाइपलाइन लंबे वक्त तक बंद रहती है, तो भारत और एशियाई देशों को कच्चे तेल के लिए नए विकल्प तलाशने होंगे। इसका सीधा असर न सिर्फ जहाजों के भाड़े और बीमा खर्च पर पड़ेगा, बल्कि भारत में ईंधन की कीमतों और महंगाई पर भी इसका गंभीर दबाव देखने को मिल सकता है।












































