CVC Annual Report: आज भ्रष्टाचार अपने चरम पर है, स्थिति ऐसी है कि कोई भी सरकारी बाबू बिना रिश्वत लिए काम करने को तैयार नहीं होता। लेकिन सवाल उठता है कि आखिर इन बाबुओं पर कोई सख्त कार्रवाई क्यों नहीं होती? यही वजह है कि सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार की शिकायतें रुकने का नाम नहीं ले रही हैं।
केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) की लेटेस्ट रिपोर्ट ने एक बार फिर सरकारी विभागों में पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। पिछले 5 साल के ट्रेंड की तरह, इस बार भी बैंक और रेलवे भ्रष्टाचार के मामलों में सबसे आगे हैं। अकेले साल 2025 में ही इन दोनों विभागों के खिलाफ हजारों शिकायतें दर्ज हुईं। तो चलिए, इस लेख के जरिए विस्तार से जानते हैं बैंक, रेलवे और अन्य प्रमुख विभागों में भ्रष्टाचार के मामलों का पूरा लेखा-जोखा।
CVC का कुल डेटा
केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) की (CVC Annual Report ) ताजा वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, इस साल विभिन्न सरकारी विभागों के मुख्य सतर्कता अधिकारियों (CVOs) को भ्रष्टाचार की कुल 70,584 शिकायतें मिली थीं। सीवीसी के तहत काम करने वाले इन सतर्कता अधिकारियों ने तत्परता दिखाते हुए 31 दिसंबर 2025 तक 64,905 शिकायतों का निपटारा भी कर दिया।
हालांकि, साल के अंत तक 5,679 मामले लंबित (पेंडिंग) रह गए, जिनमें से कई मामले तय समय-सीमा को पार कर चुके हैं। नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इन पेंडिंग मामलों में से 2,002 शिकायतें ऐसी थीं, जो तीन महीने से अधिक समय से लटकी हुई थीं।
नियमों के मुताबिक, सभी CVOs को किसी भी भ्रष्टाचार की शिकायत की जांच तीन महीने के भीतर अनिवार्य रूप से पूरी करनी होती है। सीवीसी इन लंबित मामलों में तेजी लाने के लिए समय-समय पर समीक्षा बैठकें भी करता है। रिपोर्ट के अनुसार, इन कुल शिकायतों में से सबसे ज्यादा मामले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (9,933) और भारतीय रेलवे (9,381) के खिलाफ दर्ज किए गए थे।
बैंक और रेलवे का मुख्य डेटा (CVC Annual Report)
सीवीसी (CVC) की रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि देश के दो सबसे बड़े सार्वजनिक सेवा तंत्र—बैंकिंग और रेलवे—रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के मामलों में शीर्ष पर बने हुए हैं। इन दोनों विभागों का विस्तृत लेखा-जोखा इस प्रकार है:
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (Banks): भ्रष्टाचार की लिस्ट में बैंक सबसे ऊपर रहे, जहाँ मुख्य सतर्कता अधिकारियों (CVOs) के पास सबसे अधिक 9,933 शिकायतें दर्ज की गईं। इनमें से 9,520 शिकायतों का समाधान कर दिया गया, जबकि साल के अंत तक 413 शिकायतें लंबित (पेंडिंग) रह गईं (जिनमें से 52 शिकायतें तीन महीने की कानूनी समय-सीमा को पार कर चुकी थीं)।
भारतीय रेलवे (Indian Railways): शिकायतों के मामले में भारतीय रेलवे दूसरे स्थान पर रहा, जहाँ कुल 9,381 भ्रष्टाचार की शिकायतें मिलीं। इनमें से रेलवे अधिकारियों द्वारा 8,754 शिकायतों का निपटारा किया गया, जबकि कुल 627 मामले साल के अंत तक लंबित रह गए (जिनमें से 10 गंभीर मामले तीन महीने से अधिक समय से पेंडिंग चल रहे थे)।
मंत्रालयों और स्थानीय निकायों का हाल भी बेहाल
सीवीसी (CVC) की इस रिपोर्ट से साफ है कि भ्रष्टाचार सिर्फ बैंक और रेलवे तक ही सीमित नहीं है, बल्कि आम जनता से सीधे जुड़े मंत्रालयों और स्थानीय निकायों (Local Bodies) का हाल भी बेहाल है:
बैंकिंग और रेलवे के बाद सबसे ज्यादा 6,531 शिकायतें आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय (Housing & Urban Affairs) के खिलाफ दर्ज की गईं।
दिल्ली सरकार के अधिकार क्षेत्र को छोड़कर, देश भर के अन्य स्थानीय निकायों और नगर निगमों के खिलाफ 4,834 भ्रष्टाचार के मामले सामने आए। इन निकायों में दिल्ली जल बोर्ड (DJB), दिल्ली नगर निगम (MCD) और नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (NDMC) जैसी प्रमुख नागरिक एजेंसियां शामिल हैं।
राष्ट्रीय राजधानी की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाली दिल्ली पुलिस के खिलाफ 2,633 शिकायतें मिलीं, जबकि दिल्ली पुलिस को छोड़कर अकेले गृह मंत्रालय (MHA) के खिलाफ 2,036 मामले दर्ज किए गए।
कोयला क्षेत्र में 4,118, वित्त क्षेत्र में 3,107, दिल्ली सरकार के खिलाफ 2,804 और पेट्रोलियम मंत्रालय के खिलाफ 2,722 शिकायतें दर्ज की गईं। इसके अलावा सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के खिलाफ भी 2,139 मामले सामने आए।
आखिर क्यों नहीं होती इन बाबुओं पर कार्रवाई?
फाइलों की यह सुस्त रफ्तार और विभागीय जांच में होने वाली देरी ही भ्रष्ट अधिकारियों के हौसले बुलंद रखती है। जब तक पेंडिंग मामलों पर त्वरित एक्शन और दोषियों को सख्त सजा नहीं मिलेगी, तब तक सरकारी दफ्तरों से इस रिश्वतखोरी को मिटाना नामुमकिन होगा। CVC की यह रिपोर्ट महज़ एक डेटा नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम की पारदर्शिता पर एक बड़ा सवालिया निशान है।













































