Maharashtra Ends Hind Exam: महाराष्ट्र में भाषा और स्थानीय अस्मिता से जुड़ा विवाद एक बार फिर गरमा गया है। ऑटो और टैक्सी ड्राइवरों के लिए मराठी भाषा का ज्ञान जरूरी करने के फैसले पर मचे घमासान के शांत होते ही, अब राज्य सरकार ने हिंदी भाषा को लेकर एक बड़ा यू-टर्न ले लिया है। सरकार ने सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए आयोजित होने वाली अनिवार्य हिंदी भाषा परीक्षा को हमेशा के लिए समाप्त करने का आदेश जारी कर दिया है। इस नए आदेश के साथ ही राज्य में करीब 50 साल से चले आ रहे उस नियम पर पूरी तरह रोक लग गई है, जिसके तहत कुछ कर्मचारियों के लिए सेवा के दौरान हिंदी परीक्षा पास करना अनिवार्य था।
ड्राइवरों को 1 साल की मोहलत के तुरंत बाद आया आदेश| Maharashtra Ends Hind Exam
गौरतलब है कि पिछले हफ्ते ही मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा अनिवार्य करने के विवाद पर एक साल का एक्सटेंशन (समय) देकर मामले को शांत किया था। महाराष्ट्र के परिवहन विभाग ने मुंबई समेत पूरे राज्य में ऑटो-टैक्सी ड्राइवरों के लिए मराठी भाषा की जानकारी अनिवार्य कर दी थी, जिसे सीखने के लिए सरकार ने अब उन्हें 12 महीने का वक्त दिया है। इस विवाद की आग ठंडी भी नहीं हुई थी कि अब सरकारी मुलाजिमों के लिए हिंदी परीक्षा खत्म करने का फैसला सामने आ गया।
क्या राजनीतिक दबाव में पीछे हटी सरकार?
सरकार के इस फैसले के बाद अब राज्य के कर्मचारियों को अपनी नौकरी में प्रमोशन पाने या सालाना वेतन वृद्धि (इंक्रीमेंट) के लिए हिंदी परीक्षा पास करने की कोई मजबूरी नहीं रहेगी। लेकिन सवाल उठ रहा है कि आखिर सरकार को यह कदम क्यों उठाना पड़ा? दरअसल, यह मामला जून 2026 में तब शुरू हुआ जब भाषा संचालनालय ने सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए हिंदी भाषा परीक्षा कराने का ऐलान किया और इसके लिए 28 जून की तारीख तय कर दी। जैसे ही यह तारीख सामने आई, महाराष्ट्र के राजनीतिक दलों और कई मराठी संगठनों ने इसे आड़े हाथों लिया और विरोध तेज हो गया।
मनसे और शिवसेना (UBT) ने खोला था मोर्चा
इस परीक्षा के खिलाफ सबसे आक्रामक तेवर राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने दिखाए। मनसे नेता संदीप देशपांडे ने इसे सीधे तौर पर ‘केंद्र के इशारे पर हिंदी थोपने की कोशिश’ करार दिया। मनसे ने सीधी चेतावनी दी थी कि अगर 28 जून को परीक्षा कराई गई, तो उनके कार्यकर्ता परीक्षा केंद्रों पर उतरकर उग्र विरोध करेंगे और अगर कानून-व्यवस्था बिगड़ी, तो उसकी पूरी जवाबदेही सरकार की होगी।
वहीं उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) ने भी सरकार को घेरते हुए सवाल दागा कि जब मराठी को हाल ही में शास्त्रीय भाषा (क्लासिकल लैंग्वेज) का दर्जा मिल चुका है, तो फिर महाराष्ट्र के कर्मचारियों पर हिंदी परीक्षा की शर्त क्यों थोपी जा रही है? उन्होंने यह भी पूछा कि क्या गुजरात या पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में वहां के कर्मचारियों के लिए हिंदी परीक्षा पास करना जरूरी है?
मराठी और अंग्रेजी में होता है काम, फिर हिंदी क्यों?
बढ़ते सियासी विरोध के बीच सरकार ने 1976 से चली आ रही इस व्यवस्था को करीब पांच दशक बाद पूरी तरह खत्म कर दिया। सरकार ने तर्क दिया कि महाराष्ट्र में आंतरिक प्रशासनिक कामकाज की मुख्य भाषा मराठी है, जबकि अन्य राज्यों और केंद्र के साथ पत्राचार अंग्रेजी में होता है। ऐसे में कर्मचारियों पर अलग से हिंदी परीक्षा का बोझ डालने का कोई मतलब नहीं रह जाता। सरकार ने इस आदेश को 7 मई 2026 से प्रभावी माना है। इस फैसले ने एक बार फिर महाराष्ट्र की सियासत में मराठी अस्मिता के मुद्दे को हवा दे दी है।














































