मृत्यु के समय मुख में सोना, तुलसी और गंगाजल क्यों? Garuda Purana का वो रहस्य जो कोई नहीं जानता!

Rajni | Nedrick News Ghaziabad Published: 29 अगस्त 2026, 10:47 PM Updated: 29 अगस्त 2026, 10:47 PM
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Garuda Purana: हिंदू सनातन संस्कृति में जन्म से लेकर मृत्यु तक 16 संस्कारों का विधान है, जिसमें अंतिम संस्कार (अंत्येष्टि) सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद मृतक के मुंह में सोने का टुकड़ा क्यों रखा जाता है?

गरुड़ पुराण के पन्नों में छिपी यह एक ऐसी अनसुनी मान्यता है, जो न केवल आत्मा को मोक्ष दिलाती है, बल्कि यमराज के दंड से भी बचाती है। आइए जानते हैं अंतिम संस्कार से जुड़े इस रहस्यमयी और पवित्र नियम के पीछे का असली धार्मिक कारण।

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Garuda Purana और शास्त्रों से जुड़ी मान्यताएं

हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार (अंत्येष्टि) के समय मृतक के मुंह में गंगाजल, तुलसी का पत्ता और सोने का टुकड़ा (स्वर्ण) रखने की परंपरा सदियों पुरानी है। गरुड़ पुराण और अन्य शास्त्रों के अनुसार, इसके पीछे कई गहरी आध्यात्मिक और व्यावहारिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।

शास्त्रों के अनुसार, मृत्यु के समय जैसे ही प्राण शरीर छोड़ते हैं, भौतिक शरीर पंचतत्वों में विलीन होने की प्रक्रिया के कारण अशुद्ध होने लगता है। सोना एक ऐसी पवित्र धातु मानी जाती है जो अग्नि में तपने के बाद भी अपनी शुद्धता नहीं खोती है. मुंह में सोना रखने से मृतक के शरीर की अशुद्धियां दूर होती हैं और उसकी आत्मा सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर उच्च लोकों (मोक्ष) की ओर बढ़ती है।

गरुड़ पुराण (Garuda Purana ) में उल्लेख मिलता है कि मृत्यु के बाद जीवात्मा को एक लंबी और कठिन यात्रा पर जाना पड़ता है। मान्यता है कि मुख में सोने का अंश होने से यमदूतों का प्रभाव कम हो जाता है, परलोक का सफर आसान होता है और आत्मा को भय से मुक्ति मिलती है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से

धार्मिक मान्यताओं से अलग, इसका एक व्यावहारिक पहलू भी है। विज्ञान के अनुसार, मृत्यु के तुरंत बाद मृत शरीर से हानिकारक बैक्टीरिया और वायरस बाहर निकलने लगते हैं। सोना, तुलसी और गंगाजल में प्राकृतिक रूप से एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-वायरल गुण होते हैं। इन्हें मुख में रखने से संक्रमण (वायरस) फैलने का खतरा कम हो जाता है।

मृतक के मुख में सोना, तुलसी और गंगाजल रखने की परंपरा केवल एक अंधविश्वास या रस्म नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म के आध्यात्मिक दर्शन और व्यावहारिक विज्ञान का एक अनूठा संगम है। यह जीवात्मा की अंतिम यात्रा को पवित्र और बाधारहित बनाने का माध्यम है। यह मनुष्य के शारीरिक, मानसिक और वाचिक पापों का नाश करके उसे मोक्ष (वैकुंठ धाम) की ओर अग्रसर करता है। यह मृत्यु के बाद शव में होने वाले त्वरित बदलावों, जैसे कि बैक्टीरिया का पनपना, संक्रमण फैलना और दुर्गंध आना, को रोकने का एक प्राचीन और प्रभावी एंटी-बैक्टीरियल उपाय है।

Rajni

rajni@nedricknews.com

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