Rehmat Punjabi Film: जब 1947 में देश का बंटवारा हुआ, तब लोगो को किन किस यातनाओं और त्रासदी से गुजरना पड़ा, इस पर आपको गदर, पिंजर, 1947 अर्थ, तमस और गर्म हवा जैसी अनगिनत फिल्में बॉलीवुड में देखने को मिलती है.. इन फिल्मों के जरिये भारत को आजादी के बदले किस बड़ी कीमत को चुकानी पड़ी थी। उसे बखूबी दिखाया गया है.. लेकिन अधिकतर फिल्मों उस बंटवारे के बाद जिन्होंने अपनी घर-बार, अपनी बचपन, अपनी जन्मभूमि खो दी.. वो किस भावनाओं और उतार चढ़ाव से गुजरे.. उनकी कहानी पर फोकस शायद नहीं किया गया। लेकिन अभी हाल ही में सदाबहार अभिनेता नसीरूद्दीन शाह की आगामी पंजाबी फिल्म रहमत काफी सुर्खियों में है। गुरिंदर सिंह द्वारा निर्देशित इस फिल्म का 6 अगस्त 2026 को वर्ल्ड प्रिमियर स्विट्जरलैंड के प्रतिष्ठित 79वें लोकार्नो फिल्म फेस्टिवल में किया गया। ये फिल्म 2026 में गोल्डन लेपर्ड अवॉर्ड की रेस में शामिल होने वाली एकमात्र भारतीय फिल्म भी बन गई.. हालांकि अभी इंडिया में इसकी रिलिज की डेट सामने नही आई है, लेकिन सवाल ये है कि आखिर ऐसा क्या है इस फिल्म में जिसने इसे इतना खास बना दिया।
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अंतरराष्ट्रीय मंच पर पंजाब का नाम
इंडिया और फ्रांस के दो प्रोडक्शन, वाहाओ स्टूडियो और पेरिस स्थित प्रोडक्शन कंपनी पावो फिल्म्स के बैनर्स तले बनी रहमत, हर एक पंजाबी, जो बंटवारे के दर्द को, और पाकिस्तान बनने के बाद पंजाब के खालीपन को महसूस करता है, वो रहमत से पूरी तरह से रिलेट कर सकता है.. अनगिनत कहानियां है, जब इस बंटवारे ने हिंदू मुस्लिम सौहार्द को न केवल बिगाड़ा बल्कि एक कभी न भरने वाली जख्म भी दिया.. दो जिगरी दोस्तो को दुश्मन बना दिया.. लेकिन रहमत को गुरविंदर सिंह ने एक ऐसे शख्स पर फोकस कर तैयार किया है। जिसने बंटवारा भले ही अपनी आंखो से न देखा हो लेकिन उस बंटवारे के बाद के खालीपानी का ताउम्र महसूस किया है। ये फिल्म तीन तीन अलग परिवारों, अलग अलग स्थिति की कहानी है।
जानें फिल्म की पूरी कहानी
जिसमें पहली कहानी है एक ऐसा युवा महिला की, जो दुश्मनों से छिप कर एक अजनबी को इंसानियत के नाते पनाह देती है.. उसकी देखभाल करती है.. हमारी फिल्मों में हमने बंटवारे की क्रूरता तो खूब देखी, लेकिन अनगिनत ऐसे हीरो होंगे, जो फरिश्ता बन कर सामने आये होंगे,.. वो गुमनाम ही रह गए.. दूसरी कहानी एक ऐसे परिवार की.. जिसका मुखिया उन दंगो के बाद से गायब है। परिवार उसके बिना ही जीना सीख रहा है.. औऱ घर के बुजुर्ग दादा, जिनकी रिटायर होने की उम्र है, वो उस उम्र में फिर से परिवार की जिम्मेदारी संभाल रहे है. तीसरी कहानी है एक बुजुर्ग राशिद अली की।
जो सालों से इंग्लैंड में रहता है, लेकिन जिंदगी के अंतिम समय में वो अपनी मिट्टी के बीच रहना चाहता है.. लेकिन जब वो गया था तब सब एक थे और जब वो लौटा तो सब बदल गया था.. उस बदलाव ने उसके जिंदगी में जो अकेलपन भरा.. उसे उसके अलावा कोई महसूस ही नहीं कर सकता। हालांकि उस अकेलेपन के बाद भी वो खुद के ईश्वर होने का दावा करता है.. जिससे उस त्रासदी में भी लोगो की आस्था ईश्वर से हटती नहीं है.. जिसके बाद उसे पुरानी यादों, टूटे हुए इतिहास के टुकड़े और अंदरूनी अकेलेपन के बीच बाहरी अपनेपन को महसूस कैसे किया..उसे फिल्म रहमत में बहुत गहराई से दर्शाया गया है।
फिल्म रहमत की पटकथा पंजाब की प्रसिद्ध लघु कहानियों की लेखिका अजीत कौर ने लिखी है। फिल्म के निर्देशक गुरविंदर सिंह ने जिस तरह से बंटवारे के घावों, पलायन औऱ इंसानी रहमत को एक साथ जोड़ कर पर्दे पर उतारा है, ये बताता है कि वो आखिर क्यों नेशनल अवार्ड विनर है। उन्होंने तीन अलग अलग हिस्सों में बांटने के बाद भी पंजाब की आत्मा को फिल्म से अलग नहीं होने दिया। इस फिल्म में नसीरुद्दीन शाह, सुविंदर विक्की, मीता वशिष्ठ, दिया कंबोज और नवजोत रंधावा के अलावा जसवंत जफर भी नजर आने वाले है। इस फिल्म से पंजाब के इतिहास में रूचि रखने वाला हर एक शख्स रिलेट कर सकता है। ये फिल्म समझाती है कि केवल एक बंटवारे ने उनकी जिंदगियों में क्या क्या बदला था।












































