India-China border dispute अतिक्रमण के दावों से मैकमोहन रेखा तक, क्या है इतिहास?

Shikha Mishra | Nedrick News India Published: 11 अगस्त 2026, 10:24 PM Updated: 11 अगस्त 2026, 10:24 PM
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India-China border dispute: सोशल मीडिया पर एक वीडिया वायरल हुई.. और एक मुद्दे ने फिर से तूल पकड़ लिया.. सुर्खियां का बाजार गर्म हो गया है.. क्या सच में 1962 में चीन ने जो भारत के साथ किया वो फिर से रिपीट होने वाला है.. क्या चीन भारत की नाक के नीचे से अरूणाचल प्रदेश पर कब्जा कर रहा है…. क्या भारत के नक्शे से फिर से एक राज्य कम होने वाला है.. जैसे सवाल भी उठने लगे है। सरकार सवालों के घेरे में है और देश की सुरक्षा व्यवस्था भी..इतिहात फिर खुद को दोहरा तो नहीं देगा।

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मैकमोहन रेखा क्या है?

एक अरूणाचल प्रदेश का रहने वाला शख्स साफ तौर पर भारत को गुडबाय करते हुए नजर आ रहा है.. उसने बेहद खुल कर कहा कि वो जल्द ही चीन का हिस्सा बनने वाले है.. पूरा अरूणाचल चीन का हिस्सा बनने वाला है.. ये वीडियो ही काफी है सनसनी फैलाने के लिए.. चीन भारत में घुस रहा है.. हमारी जमीन पर कब्जा कर रहा है, लेकिन हमारी सरकार को जाति और धर्म की राजनीति से फुरसत ही कहां है जो वो इस संवेदनशील मुद्दे पर ध्यान दें.. आईये आपको बताते है कि आखिर चीन ने इस बार क्या हरकत की.. और जिस मैकमोहन रेखा पर चीन कुंडली मार कर बैठा है वो इतना विवादित क्यों है।

चीन की सलामी स्लाईसिंह अप्रोच

दरअसल पिछले दिनो एक खबर सामने आई थी जिसमें अरूणाचल प्रदेश की एक वेलफेयर सोसाइटी नाह वेलफेर सोसाइटी औऱ पीपुल्स पार्टी ऑफ अरूणाचलI(PPA) ने दावा किया था कि राज्य के अपर सुबनसीरी जिले के टक्सिंग क्षेत्र पर चीनी सेना PLA की गतिविधिया तेज हो गई है और उन्होंने उस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है। चीन की सलामी स्लाईसिंह अप्रोच के मद्देनजर इन दावो की सच्चाई की जांच जरूरी है। क्योंकि जमीन हथियाने की चीन की नीति से पूरी दुनिया वाकिफ है। सलामी स्लाइसिंग अप्रोच, चीन हमेशा से ही गैरतय सीमा पर अपने दावे करता आया है। सलामी स्लाइसिंग अप्रोच्च का इस्तेमाल तब किया जाता है जब किसी बड़े लक्ष्य को पाने के लिए उसे छोटे छोटे हिस्सों में बांट दिया जाता है, और फिर धीरे धीरे उनकी तरफ बढ़ा जाता है, इससे सामने वाले को पता ही नहीं चलता कि कब उसके पैरो तले की जमीन भी निकल गई.. ऐसा ही चीन भारत, तिब्बत, ताईवान जैसे देशों के साथ भी करता आया है।

जिन सीमाओं को अब तक घेरे बंदी नहीं की गई है और उनकी सीमा आधिकारिक तौर पर तय नहीं है वहां धीरे धीरे पहले पेट्रोलिंग की जाती है और फिर वहां कैंप बना दिये जाते है.. जब लगता है कि लोह गर्म है तो दस गुना ज्यादा अप्रोच्च से वहां कब्जा कर लिया जाता है। दस गुना ज्यादा अप्रोच्च यानि की दस गुना ज्याद ताकत लगा कर.. अरूणाचल प्रदेश के सीमा पर भी चीन सलामी क्लाइसिंग अप्रोच्च का इस्तेमाल करने की कोशिश करता रहा है। मगर अब सवाल ये है कि जैसे बंग्लादेश और पाकिस्तान की सीमा तय़ है, वैसे चीन और भारत की सीमा तय क्यों नहीं है। और क्यों चीन हो या भारत कुछ हिस्सों पर अपनी अपनी दावेदारी ठोंकते है। तो इसका जवाब है मैकमोहन लाइन… जिसे शिमला कंनेशन के तहत 1914 में खिंची गई थी। क्या है मेकमोहन लाइन जिसने विवाद को खत्म करने के बजाय और बढ़ा दिया.. इसका कारण भी जान लेने है।

चीन ने शिमला कंवेंशन को कभी स्वीकार ही नहीं किया

3 जुलाई 1914 को चीन और भारत के बीच एक कानूनी सीमा खींचने के लिए भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र और तिब्बत के दक्षिणी क्षेत्र में पड़ने वाले पूर्वी हिमालय क्षेत्र के बीच करीब 890 किलोमीटर की लंबी सीमा पर तय करते हुए हस्ताक्षर किया गया.. जिसे शिमला समझौता कहा जाता है..इस समझौते को ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव सर हेनरी मैक मोहन और तत्कालीन तिब्बत के प्रधानमंत्री लोचन सात्रा के बीच हुआ था। मैक मोहन ने इस सीमा को हिमालय के भौगोलिक स्थिति को देखते हुए तय किया था.. लेकिन यहां सबसे बड़ा अड़ंगा लगाया चीन ने.. चीन ने शिमला कंवेंशन को कभी स्वीकार ही नहीं किया.. उसके पीछे कई कारण थे,.. अब चलते है साल 1906 में.. ब्रिटिश औपनिवेश के लिए भारत एक ऐसी कॉलोनी थी जिससे उसे सबसे ज्यादा फायदा होता था.. तो वो किसी कीमत पर भारत को हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी, वहीं दूसरी तरफ रशियन आर्मी ने भी ब्रिटिशों की तरह ही दूसरे देशों पर कब्जा करने के लिए भारत की तरफ रूख किया था.. और वो अफगानिस्तान तक पहुंच भी चुके थे.. ऐसे में चीन के शासक, तब वहां किंग डायनेस्टी का शासन था.. और अंतिम शासक जुयांगतोंग पुयी राजा था, उसने तिब्बत को चीन संरक्षण में ले रखा था।

तिब्बत पर भी ब्रिटिश की नजर

इस संरक्षण के बदले तिब्बत किंग डायेनेस्टी को एक तरह का टैक्स दिया करता था। वहीं तिब्बत पर भी ब्रिटिश की नजर थी, उन्होंने कई बार तिब्बत में यात्रा भी की थी, जिसका खबर भी राजा को थी.. लेकिन जब रशियन आर्मी ने अफगानिस्तान में एंट्री की तो उस वक्त उन्हें भारत पर कब्जा करने से रोकने में चीन ही बड़ी भूमिका निभा सकता था.. नतीजा ये हुआ कि चीन और ब्रिटिश भारत के अधिकारियों के बीच एक समझौता हुआ। समझौते में इस बात हस्ताक्षर होता कि ब्रिटिश कभी भी तिब्बत पर अपना अधिकार जमाने की कोशिश नही करेंगे, लेकिन उन्हें अगर रशियन अंपायर से क्लैश के समय मदद चाहिए होगी तो वो मदद करेंगे। लेकिन 1907 में ब्रिटिश अंपायर और रशियन अंपायर के बीच बातचीत से मामला सुलझने लगता है, और दोनो अपना अपना बफर जोन तय कर एक समझौता करते है।

शिन्हाई क्रांति के कारण किंग साम्राज्य

इस समझौते में रशियन अंपायर शर्त के तौर पर चीन को एक ताकत दे देता है कि जब भी ब्रिटेन तिब्बत को लेकर कोई भी समझौता करता है, या फैसला करता है तो उसमें चीन की सहमति जरूरी है.. समझौता हो जाता है..लेकिन जब 1912 में शिन्हाई क्रांति के कारण किंग साम्राज्य का अंत हुआ और चीन में गणतंत्र शुरु हुआ तब तिब्बत ने भी इसका फायदा उठाया और खुद को चीन से आजाद मान लिया.. वहीं चीन अब भी तिब्बत के इनर हिस्से पर अपना दावा ठोकता रहता था तब ऐसे मे ब्रिटेन तिब्बत औऱ चीन के बीच एक सामांजस्य बिठाने के लिए 1913 में से लेकर 1914 तक 8 राउंड में बातचीत करता है। लेकिन यहां परेशानी ये थी कि दोनो देशों के लोग अलग अलग बात कर रहे थे मतलब ये मीटिंग संयुक्त नहीं थी, जिससे कोई रास्ता नही निकल रहा था। चीन के डेलीगेशन आउटर तिब्बत पर अपने अधिकार को छोड़ने के लिए राजी नहीं था… उनकी नई नई शर्ते आती रहती थी, जिसे मैकमोहन काफी परेशान हो गए थे।

आठवे राउंड की बात 3 जुलाई 1914 को होनी थी। उन्हें इंग्लैंड से ऑर्डर था कि अगर चीन मानता है तो ठीक है वर्ना उसके बिना ही तिब्बत से समझौता कर लिया जाये.. ये समझौता शिमला में किया गया.. जहां चीन की हामी के बिना ही समझौते पर हस्ताक्षर कर लिया गया.. और 890 किलोमीटर की एक रेखा खींच दी गई.. ये समझौता 1907 में रशियन अंपायर से हुए समझौते के खिलाफ था..नतीजा ये हुआ कि चीन ने इस समझौते को कभी स्वीकार ही नहीं किया। जिसके कारण 100 सालो से भी ज्यादा समय बीतने के बाद भी ये विवाद तल रहा है। खासकर 1950 में चीन में तख्ता पलट हुआ माओत्से तुंग की पिपुल्स लिबरेशन आर्मी का चीन पर शासन शुरु हुआ और अक्टूबर 1950 में तिब्बत पर हमला कर उसपर शासन शुरु कर दिया । मई 1951 में सत्रह सूत्री समझौता हुआ औऱ चीन ने तिब्बत पर दावा ठोक दिया। वहीं अरूणाचल प्रदेश को चीन दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा मानता है।

इसलिए वो इस पर अपना दावा ठोकता है तो वहीं भारत मैकमोहन लाइन के हिसाब ही अरूणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा मानता है। वहीं भारत ने कुछ समय पहले ही अरूणाचल प्रदेश के 27 जगहों पर औपचारिक तरीके से भारत का हिस्सा होने का दावा किया, जिनमें कुछ तो चीन के अधिकार क्षेत्र में है। लेकिन उससे भारत उसे अपना हिसासा मानना बंद नहीं करने वाला है.. क्योंकि मैकमोहन लाइन भी यहीं कहता है। इन क्षेत्रों में कोई घेरेबंदी नहीं बै, इसलिए दोनो देशों की सेनाएं यहां गश्त लगाती रहती है.. अब उस दावे के बारे में बात करते है जो पिछले दिनों किये जा रहे है.. तो अरूणाचल प्रदेश के सीएम पेमा खांडू ने खुद इन दावो को खारिज किया है वहीं सेना ने भी कहा कि ये केवल भ्रम फैलाने के लिए फैलाई गई अफवाह है.. अब ये अफवाह है या हकीकत.. समय आने पर पता चल ही जायेगा.. लेकिन कहते है कि न बिना आग के धुआं नहीं उठता.. कुछ तो हुआ है जो अफवाह इतनी दूर तक पहुंची है।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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