Guru Ladho Re: सिखों के आठवे गुरु 6 साल के गुरु हरकृष्ण राय जी जब अचानक दिल्ली में चेचक के मरीजो की सेवा करते हुए बीमार पड़े, तब उन्हें पता था कि वो ज्यादा समय तक जीवित नहीं रहेंगे, लेकिन विडंबना ये थी कि 6 साल के गुरु साहिब के बाद अगला गुरु कौन होगा.. लेकिन अपने संगतो की इस विडंबना को खुद दूर किया आठवे गुरु साहिब ने, सचखंड जाने से पहले उन्होंने भविष्यवाणी की कि नौवे नानक बाबा बकाला होंगे, या फिर बकाला गांव से ही कोई नौवा गुरु चुना जायेगा। ऐसे में नौवे गुरु को खोजने की जिम्मेदारी निभाई माखन शाह लबाना ने.. गुरू लाधो राय … ये किसी शख्स का नाम नहीं बल्कि नौवे गुरु की खोज के बाद माखन शाह लबाना के बोले गए शब्द थे.. अपने इस लेख में हम इन पवित्र शब्द के बारे में जानेंगे साथ ही कैसे ये नौवे गुरु से जुड़ा है। कौन थे माखन शाह लबाना.. जिन्होंने सिखों के नौवे गुरु को खोजा था.. और कैसे नौवे गुरु की पहचान की गई थी।
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कौन थे माखन शाह लबाना?
नौवे गुरु की खोज- सिख इतिहासकारों की माने तो बाबा माखन शाह छठे गुरु हरगोविंद साहिब के समय से ही सिख धर्म के अनुयायी थे। 7 जुलाई, 1619 को टांडा जिले में बहोर्हु वंश में हुआ था, उनके पिता का नाम भाई दास और माता का नाम विजय देवी था। वे लोबाना जनजाति के पेलिया गोत्र के एक अमीर और संपन्न व्यापारी थे। उनकी संपन्नता उनके परदादा भाई बन्ना सिंह के समय से ही काफी थी। उनके जन्म और समुदाय को लेकर काफी अलग अलग कहानिया प्रचलित है लेकिन सुखा सिंह, मैकलिफ़ और जी.एस. छाबड़ा नामी इतिहासकारों का मानना है कि बाबा मखाना शाह असल में गुजरात राज्य के काठियावाड़ के निवासी थे.. क्योंकि भारत में यहीं वहा स्थान है जहां आज भी कई लबाना समुदाय के लोग रहते हैं। जिन्हें आज लोग लोहाना समुदाय कहते है। चुंकि वो एक बेहद पारखी व्यापारी थे, इसलिए उन्होंने अपनी व्यापारिक यात्रा के दौरान कई भाषायें सिखी।
चुंकि न तो पंजाब से और न ही सिख धर्म से उनका कोई नाता था, इसलिए उन्हें पंजाबी भाषा का ज्ञान नहीं था, लेकिन वो व्यापार के सिलसिले में देश विदेश की पानी के रास्ते से यात्रा किया करते थे। एक बार जब वो जहाज से वापिस लौट रहे थे तभी उनका जहाज चक्रवात तूफान फंस गया.. उन्होंने वाहेगुरु का सिमरण करते हुए अपनी कमर पर बंधी धन-कमरबंद की सामग्री देने का वादा किया, जिसमें 500 सोने सिक्के थे। कहा जाता है कि जब छठे गुरु जम्मू कश्मीर की यात्रा पर गए थे, तब वो व्यापार के सिलसिले में आये बाबा माखन शाह से मिले थे। गुरु साहिब के चेहरे की चमक देखकर भाई माखन उनके आगे नतमस्तर हो गए और गुरु साहिब के सच्चे सिख बन गए।
गुरु साहिब ने भी अपने सच्चे भक्त को निराश नहीं किया और मटन मार्तंड की तीर्थयात्रा पूरी करने के बाद वे मोटा टांडा स्थित भाई माखन शाह के निवास स्थान पर पहुँचे। सातवे गुरु माने जाने वाले गुरु हर राय करीब 4 महीनों तक बाबा माखन के पास रहे थे। लेकिन 6 अक्टूबर 1661 में उनके सचखंड जाने के बाद जब उनके 6 साल के बेटे गुरु हर कृष्ण राय को गुरु चुना गया तो दोनो गुरुओ से लगाव और सिख धर्म के सच्चे अनुयायी होने के कारण बाबा माखन शाह पूरे परिवार के साथ उनसे मिलने दिल्ली गए थे। लेकिन वहां आठवे गुरू की स्थिति बिगड़ गई और वो सचखंड चले गए। लेकिन जाने से पहले बाबा माखन खान के कंधों पर नौवे गुरु को खोजने की जिम्मेदारी दे गए, साथ ही ये भी इशारा कर गए कि जो वादा बाबा मखाना ने सतगुरु से किया है, वो वादा ही उनकी सच्चा गुरु खोजने में मदद करेगा।
गुरुओ ने दिया धोखा
छठे गुरु हरगोविंद जी के पांचवे बेटे का नाम था त्यागमल.. वो अपने पिता को बेहद प्रिय थे, लेकिन उनके लगातार युद्ध के कारण 14 साल की उम्र में त्यागमल की वीरता को देखते हुए गुरु साहिब ने उनका नाम तेग बहादुर तलवार का धनी रख दिया था, लेकिन युद्ध के रक्तपात से वो विचलित हो गए औऱ संसारिक मोह माया के विरक्त होकर वैरागी जीवन जीने लगे। उन्होंने करीब 20 सालों तक बाबा बकाला नाम की जगह पर वैरागी रहते हुए साधना की थी। आठवे गुरु ने जब उनके नाम को नौवे गुरु के लिए बताया को बाबा माखन शाह करीब 500 लोगो के साथ बाबा बकाला की तरफ चल निकले।
बाबा बकाला पहुंचने के बाद जब वहां के अन्य साधको को नौवे गुरु के बारे में पता चला तो वो लोग ढोंग करने लगे और खुद को बाबा बकाले कहने लगे। लेकिन जब बाबा माखन शाह उन्हें 2-4 सोने के सिक्के देते तो वो आराम से ले लेते.. बिना कुछ कहें जिससे उन्हे यकीन हो जाता कि वो नौवे गुरु नही है। इस तरह से करीब 22 संतों ने उनके सामने खुद को नौवा गुरु होने का दावा किया है। लेकिन बाबा माखन शाह ने देखा कि ये 22 संत जो भजन की रचना कर रहे थे वो अन्य गुरुओ की रचना के बराबर नहीं थे, लेकिन तभी भीड़ से गुरु तेग बहादुर जी निकले और उन्होंने भी एक रचना की, जिससे बाबा माखन शाह और उनके साथ के सिखों को समझने में देर न लगी।
उसके बाद बाबा माखन शाह गुरु साहिब के पास पहुंचे और उन्हें भी 2 सोने की मोहरे दी थी.. लेकिन तभी गुरु साहिब ने जोर से कहा कि ये क्या 500 का वादा किया था और केवल 2 देकर बहला रहा है। वादा को पूरा करने का इरादा नहीं है क्या है..बाबा मखाना शाह तुरंत गुरु साहिब के चरणों में गिर गए और उन्हें साथ चलने को कहा… लेकिन गुरु साहिब ने कहा कि अगर उनका सच किसी को कहा कि तो उसका मुंह काला हो जायेगा..लेकिन बाबा माखन शाह ने तुरंत चेहरे पर काजल लगाया और छत पर चढ़ कर जोर जोर से चिल्लाने लगे गुरु लाधो राय..गुरू लाधो राय.. ये शब्द असल लुंबाकी भाषा के थे, जिसका अर्थ होता है गुरु मिल गए.. बाबा मखाना शाह को पंजाबी नहीं आती थी, इसलिए उन्होंने लुंबाकी में ही जोर जोर से ये शब्द कहें..जो कि उनकी मातृभाषा थी यानि की ये शब्द नौवें गुरु को पाने की खुशी में बोले गए थे।





























