US Iran War: करीब साढ़े तीन महीने तक चले तनाव, हवाई हमलों और कूटनीतिक खींचतान के बाद आखिरकार अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम की दिशा में बड़ा कदम उठ गया है। दोनों देशों के बीच एक शुरुआती समझौता हो चुका है और उम्मीद जताई जा रही है कि शुक्रवार तक जिनेवा में इसे अंतिम रूप दे दिया जाएगा। इस समझौते को पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता का नतीजा माना जा रहा है।
जब यह संघर्ष शुरू हुआ था, तब अमेरिका और इजरायल का दावा था कि उनका लक्ष्य ईरान की सैन्य ताकत को कमजोर करना, उसके परमाणु कार्यक्रम को रोकना, क्षेत्रीय प्रभाव खत्म करना और जरूरत पड़ने पर इस्लामिक रिपब्लिक की सत्ता को भी बदलना है। लेकिन अब जब युद्ध रुकने की कगार पर है, तो सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका अपने घोषित उद्देश्यों को हासिल कर पाया? कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि युद्ध के अंत में तस्वीर वैसी नहीं दिख रही, जैसी शुरुआत में वॉशिंगटन ने कल्पना की थी।
सत्ता परिवर्तन का सपना अधूरा रह गया| US Iran War
युद्ध के शुरुआती दौर में अमेरिका और इजरायल ने तेहरान समेत कई अहम ठिकानों पर बड़े हमले किए। माना जा रहा था कि शीर्ष नेतृत्व पर दबाव बढ़ने से ईरान की सत्ता व्यवस्था कमजोर पड़ जाएगी। हालांकि घटनाक्रम इसके उलट रहा। भारी सैन्य दबाव के बावजूद ईरान की राजनीतिक व्यवस्था पूरी तरह नहीं टूटी। संवैधानिक प्रक्रियाओं के तहत नेतृत्व व्यवस्था आगे बढ़ती रही और शासन संरचना कायम रही। कई विश्लेषकों का मानना है कि युद्ध के बाद सत्ता का नियंत्रण पहले से अधिक केंद्रीकृत और मजबूत हो गया। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि जिस सरकार को कमजोर करने के लिए अभियान शुरू हुआ था, अंत में अमेरिका को उसी व्यवस्था के साथ बातचीत की मेज पर बैठना पड़ा।
जनता सरकार के खिलाफ नहीं, बाहरी हमलों के खिलाफ खड़ी हुई
युद्ध से पहले ईरान आर्थिक चुनौतियों, महंगाई और बेरोजगारी जैसी समस्याओं से जूझ रहा था। कई शहरों में सरकार विरोधी प्रदर्शन भी देखे जा रहे थे। अमेरिका को उम्मीद थी कि सैन्य दबाव बढ़ने पर जनता सरकार के खिलाफ खड़ी होगी। लेकिन युद्ध के दौरान नागरिक इलाकों में हुए कुछ हमलों ने माहौल बदल दिया। एक मिसाइल हमले में नागरिकों की मौत के बाद लोगों में बाहरी हस्तक्षेप को लेकर गुस्सा बढ़ गया। नतीजा यह हुआ कि सरकार विरोधी आवाजें पीछे चली गईं और राष्ट्रीय एकता की भावना मजबूत होती दिखाई दी। जो लोग पहले सरकार की आलोचना कर रहे थे, उनमें से कई विदेशी हमलों के खिलाफ एकजुट हो गए।
मिसाइल कार्यक्रम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ
अमेरिका और इजरायल की एक बड़ी प्राथमिकता ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को खत्म करना थी। युद्ध के दौरान सैकड़ों हवाई हमले किए गए, लेकिन ईरान के कई भूमिगत मिसाइल ठिकाने सुरक्षित बने रहे। युद्ध के दौरान ईरान ने विभिन्न क्षेत्रों में जवाबी कार्रवाई भी की। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शांति समझौते की शुरुआती रूपरेखा में ईरान को अपना मिसाइल कार्यक्रम खत्म करने की कोई स्पष्ट शर्त स्वीकार नहीं करनी पड़ी। यानी जिस सैन्य क्षमता को खत्म करने के लिए युद्ध शुरू हुआ था, उसका बड़ा हिस्सा अभी भी कायम है।
होर्मुज स्ट्रेट को लेकर भी सैन्य समाधान नहीं मिला
दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य युद्ध के दौरान वैश्विक चिंता का केंद्र बना रहा। तनाव बढ़ने के साथ यहां तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कीमतें तेजी से बढ़ने लगीं। अमेरिका चाहता था कि यह मार्ग पूरी तरह सुरक्षित और खुला रहे। लेकिन आखिरकार इस मुद्दे का समाधान सैन्य कार्रवाई से नहीं बल्कि बातचीत और समझौते के जरिए निकलता दिखाई दे रहा है। इससे यह संकेत मिला कि कई बार रणनीतिक संकटों का स्थायी समाधान कूटनीति से ही संभव होता है।
खाड़ी देशों की चिंताएं भी बढ़ीं
युद्ध के दौरान सऊदी अरब, यूएई, कतर और कुवैत जैसे अमेरिकी सहयोगी देशों को भी सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने ऊर्जा ढांचे और रणनीतिक ठिकानों को लेकर चिंता पैदा कर दी। इसी वजह से कई खाड़ी देशों ने युद्ध को लंबा खिंचने से रोकने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाई। कतर और पाकिस्तान की सक्रिय भागीदारी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
आर्थिक कीमत भी कम नहीं रही
शुरुआत में माना जा रहा था कि यह सीमित अवधि का अभियान होगा, लेकिन समय बीतने के साथ इसकी आर्थिक लागत बढ़ती गई। तेल की कीमतों में उछाल आया, वैश्विक बाजार प्रभावित हुए और क्षेत्रीय अस्थिरता का असर कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ा। इसी बीच ईरान के पुनर्निर्माण और निवेश से जुड़े बड़े आर्थिक पैकेज की चर्चाएं भी सामने आईं। इससे यह संकेत मिला कि युद्ध का आर्थिक बोझ केवल एक पक्ष तक सीमित नहीं रहा।
परमाणु मुद्दा अब भी पूरी तरह सुलझा नहीं
युद्ध की सबसे बड़ी वजह ईरान के परमाणु कार्यक्रम को बताया गया था। लेकिन संघर्ष समाप्ति की दिशा में बढ़ने के बावजूद यह मुद्दा पूरी तरह हल नहीं हो सका है। सूत्रों के अनुसार परमाणु कार्यक्रम से जुड़े सवालों को अलग बातचीत के लिए रखा गया है और आने वाले हफ्तों में इस पर नई वार्ता हो सकती है। इसका मतलब यह है कि जिस विषय को लेकर संघर्ष शुरू हुआ था, उसका अंतिम समाधान अभी बाकी है।
आखिर किसकी जीत हुई?
युद्ध के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि जीत किसकी हुई। सैन्य दृष्टि से देखें तो अमेरिका और इजरायल ने ईरान को काफी नुकसान पहुंचाया। कई ठिकाने प्रभावित हुए और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा। लेकिन दूसरी तरफ ईरान अपनी राजनीतिक व्यवस्था को बचाने, मिसाइल क्षमता बनाए रखने और अंतरराष्ट्रीय वार्ता की मेज पर बने रहने में सफल रहा।
यही वजह है कि कई विशेषज्ञ इस पूरे घटनाक्रम को किसी एक पक्ष की स्पष्ट जीत या हार की बजाय “थकान के बाद आई शांति” के रूप में देख रहे हैं। इतना जरूर कहा जा सकता है कि जब यह युद्ध शुरू हुआ था और अब जब समझौते की दिशा में बढ़ रहा है, दोनों तस्वीरों में काफी अंतर दिखाई देता है। यही कारण है कि इस संघर्ष को कई विश्लेषक उन सात बड़े झटकों की कहानी बता रहे हैं, जिन्होंने अमेरिका की रणनीति को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया।






























