Delhi Bus Gangrape Case: क्या देश की राजधानी अब वाकई ‘रेप कैपिटल’ बन चुकी है? क्या इन दरिंदों के मन से कानून का खौफ पूरी तरह खत्म हो चुका है? आखिर धरातल पर कहां हैं महिला सुरक्षा के वो बड़े-बड़े दावे? आखिर उस युवती की गलती क्या थी? क्या किसी से सिर्फ समय पूछना इतना बड़ा गुनाह है कि उसकी आबरू को सरेआम रौंद दिया जाए?
दिल्ली के रानी बाग इलाके में चलती बस में हुई इस हैवानियत ने साल 2012 के जख्मों को फिर हरा कर दिया है। वही चलती बस, वही दरिंदगी और वही लाचार कानून-व्यवस्था। सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर तब से लेकर अब तक दिल्ली में क्या बदला है? क्या दिल्ली की सड़कें महिलाओं के लिए कभी सुरक्षित होंगी।
मीडिया द्वारा मिली जानकारी के अनुसार बताया जा रहा है कि राजधानी दिल्ली के रानी बाग में एक 30 साल की महिला जो फैक्ट्री में काम कर घर लौट रही थी, उसने सड़क किनारे खड़े एक युवक से सिर्फ ‘समय’ पूछा था। लेकिन चंद सेकंड में उसकी जिंदगी नर्क बन गई, आरोपीयों ने महिला को बस के अंदर खींचा, 2 घंटे तक बस दिल्ली की सड़कों पर बस दौड़ती रही और उस महिला के साथ गैंगरेप की वारदात को अंजाम दिया गया, विरोध करने पर उसके साथ बेरहमी से मारपीट की गई और रात 2 बजे उसे सड़क पर फेंक दिया गया।
मदद के लिए चीखती-चिल्लाती रही महिला
पीड़िता से मिली जानकारी के मुताबिक बताया जा रहा है कि वारदात के दौरान आरोपी बस को अलग-अलग इलाकों में घुमाते रहे और नांगलोई तक ले गए। इस बीच पीड़िता मदद के लिए लगातार चीखती-चिल्लाती रही, लेकिन दरिंदों ने न सिर्फ उसकी आवाज़ को अनसुना किया, बल्कि उसके साथ बेरहमी से मारपीट भी की। आरोपियों की इस हैवानियत के आगे आखिरकार पीड़िता की चीखें सिसकियों में बदल गईं।
पुलिस को दी जानकारी (Delhi Bus Gangrape Case)
करीब दो घंटे तक हैवानियत को अंजाम देने के बाद, आरोपी पीड़िता को घायल अवस्था में सड़क पर फेंककर फरार हो गए। इसके बाद पीड़िता ने किसी तरह खुद को संभाला और पुलिस को अपनी आपबीती बताई। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और महिला को तुरंत अस्पताल ले गई, जहां उसका इलाज और मेडिकल कराया गया।
अस्पताल में भर्ती होने से किया इनकार
पीड़िता 3 बच्चों की मां है और घर की इकलौती कमाने वाली है, उसका पति बीमार रहता हैं, मेडिकल जांच में रेप की पुष्टि हुई है, लेकिन अपनी गरीबी और बच्चों की जिम्मेदारी के कारण उसने अस्पताल में भर्ती होने से भी इनकार कर दिया, ताकि वो काम पर जा सके और घर का चूल्हा जल सके।
कानून बदल गए, धाराएं बदल गईं, लेकिन क्या मानसिकता बदली, हालात बदले, आखिर कब महिलाएं सुरक्षित महसूस करेंगी, दिल्ली आज भी मेट्रो शहरों में महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित मानी जाती है। देश की राजधानी में इस तरह की घटना का दोबारा होना यह याद दिलाता है कि हमें ‘स्मार्ट सिटी’ नहीं, ‘सेंसिटिव सिटी’ बनने की जरूरत है, जब तक एक कामकाजी महिला रात 2 बजे बेखौफ होकर घर नहीं लौट सकती, तब तक हर दावा अधूरा है।





























