Who were Satta and Balwand: खालसा को मानने वाले हर एक सिख के लिए उनके गुरुओ की कही गई एक एक वाणी पत्थर की वो लकीर है जिसे कोई बदल नहीं सकता है, लेकिन दसवें गुरु गोबिंद सिंह के सचखंड जाने के से पहले उन्होंने पवित्र ग्रंथ श्री गुरु ग्रंथ साहिब को ही 11 वां गुरु घोषित किया था और साथ ही ये भी ऐलान किया था.. कि अनंत काल तक गुरू ग्रंथ साहिब ही सिखों के अंतिम गुरु होंगे.. लेकिन क्या आप ये जानते है कि 11वें गुरु के रूप में माने जाने वाले श्री गुरु ग्रंथ साहिब में 6 गुरुओं समेत अनगिनत संतो की वाणी सम्मिलित की गई है.. लेकिन इसे ग्रंथ का रूप किसने दिया.. जी हां पांचवे गुरु अर्जन देव दी ने.. लेकिन जब आप इनकी वाणियों को सुनेंगे तो ये अलग अलग संगीत बद्ध की गई है.. इन्हें किसने किया.. तो इसका जवाब है दो कलाकार भाई सत्ता और राय बलवंड ने.. जिन्हें कहीं कहीं सगे भाई माना गया है तो कहीं कहीं सह कलाकार कहा जाता है। लेकिन पहले गुरु गुरु नानक देव जी से लेकर पांचवे गुरु अर्जन देव जी तक की महिमा को संगीतबद्ध कर शब्दों में पिरोने का काम इन दोनो परम आत्माओं ने ही किया था.. अपने इस लेख में भाई सत्ता और राय बलवंड के बारे में जानेंगे।
गुरु अर्जन देव जी के काल के वो दो संगीतकार
सिख इतिहासकारो की माने तो भाई सत्ता और राय बलवंड जी की जन्म तभी हुई जब सिख धर्म की स्थापना करने वाले पहले गुरु गुरु नानक देव जी सिख धर्म की प्रचार प्रसार कर रहे थे। दोनों को ऋषि भाई माना जाता है। भाई सत्ता जिन्हें सत्ता डूम भी कहा जाता है वो जन्म से दम या मिरासी थे, तो वहीं भाई बलवंड जिन्हें राय बलवंड भी कहा जाता है वो एक रबाबी थे। दोनों की काफी अध्यत्मिक थे, और सदैव अपने ईश्वर की भक्ति करते थे, लेकिन सिख धर्म और गुरु अंगद देव से प्रभावित होकर उन्होंने गुरु साहिब के रास्ते पर चलना शुरु कर दिया। उन्होंने गुरु अंगद देव जी से लेकर पांचवे गुरु अर्जन देव जी तक के समय में सेवा दी थी.. लेकिन जब पांचवे पातशाह ने पवित्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब का संग्रहण शुरू किया तब उनकी भूमिका काफी अहम रही। भाई सत्ता और भाई बलवंड को उनके समर्पण और संगीत के लिए गुरु अर्जन देव जी के दरबार में आधिकारिक रागी बनाया गया। राय बलवंड एक रबाबी थे जो रबाब बजाया करते थे तो वहीं भाई सत्ता एक मिरासी थे, यानि की मुस्लिम गायक थे, जो कि भाई बलवंड के द्वारा बजाय गए रबाब की संगत में अपनी मधुर आवाज से पवित्र भजनो को गाया करते थे। ये बिल्कुल ऐसा था जैसे आदि गुरु के भजनो के गाते वक्त भाई मरदाना का संगीत बजाना। दोनो ने मिलकर पवित्र श्री गुरु ग्रंथ में सम्मिलित किये गए रामकली राग में शामिल एक ‘वार’ की रचना की थी.. वार जो सिख धर्म के साथ हुरु रामदास की प्रशसां करता है।
जब पांचवे गुरु ने दोनो का अहंकार तोड़ा
कहा जाता है कि जब भाई सत्ता और भाई बलवंड गुरु अर्जन देव जी के दरबार में सुबह और शाम गुरबानी का पाठ करते थे। उनका संगीत और मधुर गायन संगतो को पूरी तरह से मंत्रमुग्ध कर देती थी, धीरे धीरे गुरु साहिब की प्रसिद्धि बढ़ी तो भाई सत्ता और भाई बलवंड को अंहकार हो गया कि उनके गायन और वादन के कारण ही गुरु साहिब की प्रसिद्धि बढ़ी है, और अपने अंहकार में उन्होंने एक दिन जब दरबार में आये पूजनीय बाबा बुड्ढा जी ने उनसे एक शबद गाने के लिए कहा, तो दोनो ने गुरु साहिब के न आने का कारण देकर बड़ी बदतमीजी से गाने से इंकार कर दिया। इसकी खबर गुरु साहिब को भी लगी और उन्हें बहुत दुख हुआ.. उनके दो परम अनुयायी अहंकार की चपेट में आ गए थे। गुरु साहिब दरबार पहुंचे लेकिन उन्होंने भाई सत्ता और भाई बलवंड का अभिवादन स्वीकार नहीं किया औऱ पीठ करके उनकी तरफ बैठ गए। उन दोनो ने बहुत कोशिश की कि गुरु साहिब का ध्यान अपनी तरफ खींचो लेकिन ऐसा हो न सका.. तब दोनो गुरु साहिब के सामने हाथ जोड़ कर ऐसे व्यावहार का कारण पूछने लगे। जिसके बाद गुरु साहिब ने जवाब कि अगर तुम मेरे किसी एक सिख के लिए नहीं गा सकते तो तुम्हें मेरे लिए गाने का कोई हक नहीं है.. क्योंकि मैं तो सबका हूं, औऱ सब मेरे अपने.. किसी के साथ तिरस्कार कैसे कर सकते है। दोनो को अपनी गलती का अहसास हुआ औऱ उन्होंने माफी मांग ली।
गुरु साहिब से की बदतमिजी
मगर दोनो का पतन अभी भी शेष था.. गुरु अर्जन देव जी के बड़े भाई पृथ्वी चंद ने दोनो को भड़काया और गुरु साहिब की सेवा से इंकार कर देने को लिए कहा.. कुछ समय के बाद भाई सत्ता की बेटी की शादी थी, दोनो ने गुरु साहिब से पैसे की मांग की तो गुरु साहिब ने कहा कि वो 2 महीने और रूके, बैशाखी में वो सारा हिसाब किताब करके दें देंगे। लेकिन भाई सत्ता को बेटी की शादी जल्द से जल्द करनी थी। बस वो दोनो ही गुरु साहिब से बदतमिजी करने लगे। गुरु साहिब ने कहा कि ठीक है अगले दिन दरबार में आना, हर सच्चे सिख के लिए एक सिक्का दिया जायेगा। अगले दिन जब दोनो ने दरबार में कीर्तन खत्म होने के बाद, गुरु अर्जन देव जी ने भाई सत्ता और बलवंड को साढ़े चार सिक्के दिए। ये सिक्के देखकर वो दोनो गुस्सायें गए.. और पूछा कि इसका क्या मतलब है।
भाई सत्ता और बलवंड को मिला श्राप
जिसपर गुरु साहिब ने कहा कि उनसे पहले केवल 4 सच्चे सिख हुए, गुरु नानक, गुरु अंगद, गुरु अमर दास और गुरु राम दास, वो खुद को भी आधा सच्चा सिख मानते है, इसलिए वो साढ़े 4 सिक्के दे रहे है। लेकिन भाई सत्ता और बलवंड को ये अपमान जैसा लगा औऱ वो गुरु साहिब पर भड़क कर बदतमीजी से बात करने लगे। उन्होंने कहा कि आपकी तारीफ़ में गीत गाकर ही हमने आपको मशहूर बनाया है। अगर हम गुरु के भजन न गाते, तो क्या सिख आपको कभी चढ़ावा चढ़ाते? अगर आप हमे पैसे नहीं देंगे तो हम भजन करना बंद कर देंगे। उन्होंने कहां कि गुरु नानक देव के भजनो को फेमस होने के लिए भी भाई मरदाना के संगीत की की जरूरत थी। हमारे बिना गुरु साहिब के दरबार की कोई वैल्यू नही है। गुरु साहिब ने कई बार कोशिश की दोनो मान जायें.. लेकिन वो अपनी जिद पर अड़े रहे.. गुरु साहिब ने अपने साथ हुए व्यावहार को सह लिया लेकिन गुरु नानक देव जी के दरबार का अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकें औक श्राप दे दिया कि कोई सिख उनसे नहीं मिलेगा।
उसके बाद गुरु साहिब जो खुद गुरु सारंदा बजाने में माहिर थे वो सारंदा बजाते और खुद गाते थे। उन्होंनें सगंतो को भी कहा कि उनमें से जो चाहे पवित्र मन से गा बजा सकता है। गुरु साहिब के पास पहले से भी ज्यदा लोगों की भीड़ जमा होने लगी। वहीं दूसरी तरफ भाई सत्ता और बलवंड को कुष्ठ रोग हो गया, उनका सब कुछ खत्म हो गया.. तब उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ कि अंहकार वश उन्होंने खुद को गुरु साहिब से भी ऊपर समझ लिया था। उन्होंने कुछ सिखों से गुरु दरबार में फिर से शामिल होने की अपील की, लेकिन गुरु साहिब ने साफ कहा कि उन दोनो ने नानक दरबार का अपमान किया है उन्हें कभी माफी नहीं मिलेगी.. और जो सिख उनका साथ देगा वो भी सेवा का हक खो देगा। साथ ही उसके चेहरे पर कालिख लगा कर गधे पर बिठा कर घुमाया जायेगी..ये जानने के बाद दोनो दर दर भटकने लगे.. औऱ लाहौर के भाई लाधा के पास पहुंचे.. वो गुरु साहिब के बेहद करीब थे।
उन्होंने भाई लाधा से बार बार मिन्नते की कि वो उनकी मदद करें.. जिस पर भाई लाधा तैयार हो गए और चेहरे पर कालिख लगा कर वे गधे पर उल्टे बैठे और गले में जूतों की माला पहनी और गुरु साहिब के घर चल दिया.. रास्ते में लोगो को लगा कि वो कोई चोर है तो लोग भला बुरा बोलने लगे, लकिन जैसे ही वो गुरू साहिब के पास पहुंचे तो उनके चरणों में गिर कर माफी मांगने लगे। जिसके बाद उन दोनो को गुरु साहिब ने कहा कि माफी तभी मिलेगी जब वो गुरु नानक दरबार की तारीफ करेंगे, जिसके बाद दोनो ने ‘रामकली की वार’ का पाठ किया, जिसे ‘सत्ता और बलवंड की वार’ के नाम से भी जाना जाता है, यह वार भक्तों को पवित्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के अंग 966 से लेकर 968 तक में मिलते है। जैसे ही दोनो ने इस वार के पाठ का किया, उनकी सारी बीमारी खुद ही ठीक हो गई और गुरु जी ने उन दोनों को माफ़ कर दिया। कहा जाता है कि जो भी संगत सच्चे मन से इस वार का पाठ करती है उनकी सारी बिमारियां दूर हो जाती है। ऐसे थे गुरु अर्जनदेव जी.. जिन्होंने किसी की बुराई को भी मानवता कल्याण के लिए इस्तेमाल किया।































