हिंदू देवी देवताओं पर क्या थी पेरियार की सोच?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 10 अप्रैल 2023, 05:30 AM Updated: 10 अप्रैल 2023, 05:30 AM
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ई. वी. रामास्वामी! पेरियार के नाम से पूरे देश में मशहूर जिनका तमिलनाडु के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्यों पर इतना गहरा असर पड़ा है कि कम्युनिस्ट से लेकर दलित आंदोलन विचारधारा, तमिल राष्ट्रभक्त से लेकर तर्कवादियों और नारीवाद की ओर झुकाव रखने वाले सभी उनका सम्मान करते हैं, जातिवादी मामलों पर उनका हवाला देते हैं और अपने एक उन्हें मार्गदर्शक के रूप में देखते हैं.

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तर्कवादी, नास्तिक और गरीब पिछड़े वर्ग के समर्थक होने की वजह से उनकी सामाजिक और राजनीतिक ज़िंदगी में कई बार उतार चढ़ाव आये।

साल 1919 में अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत ई. वी. रामास्वामी ने कट्टर गांधीवादी और कांग्रेसी के रूप में की. वो गांधी की नीतियों जैसे शराब विरोधी, खादी और छुआछूत मिटाने की ओर आकर्षित हुए.

और इतना ही नहीं उन्होंने मात्र खुद को ही नहीं बल्कि उन्होंने अपनी पत्नी नागमणि और बहन बालाम्बल को भी राजनीति से जुड़ने के लिए काफी प्रोत्साहित किया. ये दो महिलाएं ताड़ी (नारियल का पानी) के दुकानों के विरोध में सबसे आगे थीं. ताड़ी विरोध आंदोलन के साथ एकजुटता में उन्होंने अपनी मर्ज़ी से खुद के ही नारियल बागान नष्ट कर दिए. उन्होंने सक्रीय रूप से महात्मा गांधी के में भाग लिया और जेल भी गए.और कांग्रेस मद्रास प्रेसीडेंसी के अध्यक्ष भी बने।

वायकोम सत्याग्रह

बात आजादी के पहले की है जब साल 1924 में केरल में त्रावणकोर के एक राजा ने मंदिर की ओर जाने वाले रस्ते पर दलितों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने का विरोध हुआ था. लेकिन राजा को ये बात पता लगने के बाद इसका विरोध करने वाले सारे नेताओं को राजा के आदेश से गिरफ़्तार कर लिया गया और इस लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए कोई नेतृत्व नहीं था. तब, आंदोलन के नेताओं ने इस विरोध का नेतृत्व करने के लिए पेरियार को आमंत्रित किया.

और इसी विरोध प्रदर्शन के चलते पेरियार ने मद्रास राज्य काँग्रेस अध्यक्ष के पद से इस्तीफ़ा दिया. गांधी के आदेश का उल्लंघन करते हुए केरल चले गए.

हिंदू देवी देवताओं पर क्या थी पेरियार की सोच? — NEDRICK NEWS

त्रावणकोर पहुंचने पर तो उनका राजकीय स्वागत हुआ आखिर राजा के खास दोस्त जो ठहरे. मगर वो वहां राजा का स्वागत स्वीकार करने नहीं बल्कि उनके आदेश का विरोध करने पहुंचे थे और इसी वजह से वहां उन्होंने राजा के स्वागत से भी इनकार कर दिया.

उन्होंने राजा की इच्छा के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन में भाग लिया, जिसके चलते वो भी बाकी नेताओं की तरह गिरफ़्तार किए गए और महीनों तक जेल में बंद कर दिए गए. केरल के नेताओं के साथ भेदभाव के ख़िलाफ़ उनकी पत्नी नागमणि ने भी महिला विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया.

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काँग्रेस सम्मेलन में जातीय आरक्षण के प्रस्ताव को पास करने के उनके लगातार प्रयास नाकाम हुए. इस बीच एक रिपोर्ट सामने आई थी चेरनमादेवी शहर में काँग्रेस पार्टी के अनुदान से चलाए जा रहे सुब्रह्मण्यम अय्यर के स्कूल में ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण छात्रों के साथ खाना परोसते समय अलग व्यवहार किया जाता है.

पेरियार ने ब्राह्मण अय्यर से सभी छात्रों से एक समान व्यवहार करने का आग्रह किया. लेकिन न ही वो स्कूल के मालिक अय्यर और नहीं ही कांग्रेस के अनुदान किसी को भी रोकने में सफल नहीं हो सके और इन्ही वजहों के चलते उन्होंने कांग्रेस को छोड़ने का फैसला ले लिया.

काँग्रेस छोड़ने के बाद ही उन्होंने आत्म-सम्मान आंदोलन शुरू किया जिसका लक्ष्य था गैर-ब्राह्मणों (जिन्हें वो द्रविड़ कहते थे) में आत्म-सम्मान पैदा करना. बाद में वो 1916 में शुरू हुई एक गैर-ब्राह्मण संगठन दक्षिण भारतीय लिबरल फेडरेशन (जस्टिस पार्टी के रूप में विख्यात) के अध्यक्ष बने.

कट्टर नास्तिक थे ई. वी. रामास्वामी?

पेरियार के अनुयायियों ने वैवाहिक अनुष्ठानों को चुनौती दी, शादी के निशान के रूप में थली (मंगलसूत्र) पहनने का भी विरोध किया.

पेरियार का मानना था कि समाज में निहित अंधविश्वास और भेदभाव की वैदिक हिंदू धर्म में अपनी जड़ें हैं, जो समाज को जाति के आधार पर विभिन्न वर्गों में बांटता है जिसमें ब्राह्मणों का स्थान सबसे ऊपर है. और इन्हीं सब के चलते पेरियार वैदिक धर्म के आदेश और ब्राह्मण वर्चस्व को तोड़ना चाहते थे. एक कट्टर नास्तिक के रूप में उन्होंने भगवान के अस्तित्व की धारणा के विरोध में प्रचार किया.

अलग देश ‘द्रविड़नाडु’ की मांग क्यों?

जातीय कुप्रथाओं ने पेरियार को अन्दर से इतना झकझोर दिया था कि वो दक्षिण भारतीय राज्यों के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के ख़िलाफ़ हो गए थे.और इतना ही नहीं उन्होंने दक्षिण भारत राज्यों की एक अलग द्रविड़नाडू (द्रविड़ देश) की मांग भी की थी. लेकिन दक्षिण के अन्य राज्य उनके विचारों से सहमत नहीं हुए. वो वंचित वर्गों के आरक्षण के अगुवा थे और 1937 में उन्होंने तमिल भाषी लोगों पर हिंदी थोपने का विरोध किया था.

अपने अधिकांश भाषणों में वो बोला करते थे, “कुछ भी सिर्फ़ इसलिए स्वीकार नहीं करो कि मैंने कहा है. इस पर विचार करो. अगर तुम समझते हो कि इसे तुम स्वीकार सकते हो तभी इसे स्वीकार करो, अन्यथा इसे छोड़ दो.”

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