US debt crisis: ‘ऊंची दुकान और फीका पकवान’… यह कहावत इस समय दुनिया की सबसे बड़ी और विकसित अर्थव्यवस्था अमेरिका पर बिल्कुल सटीक बैठ रही है। सुपरपॉवर माने जाने वाले अमेरिका की चकाचौंध के पीछे का कड़वा सच यह है कि वह इस वक्त इतिहास के सबसे बड़े कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है। $40 ट्रिलियन (करीब 40 लाख करोड़ डॉलर) का यह कर्ज भारतीय अर्थव्यवस्था के कुल आकार से लगभग 10 गुना ज्यादा है। अब हालात ऐसे हो चुके हैं कि इस कर्ज को संभालना खुद अमेरिका के लिए सिरदर्द बन गया है और इसका सीधा असर दुनियाभर के शेयर बाजारों और अर्थव्यवस्थाओं पर मंडरा रहा है।
ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट का बड़ा फैसला: बॉन्ड बायबैक होगा दोगुना| US debt crisis
अमेरिकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ उसका बॉन्ड मार्केट है। सरकार अपने ज्यादातर खर्चों और वित्तीय जरूरतों को बॉन्ड जारी करके ही पूरा करती है। लेकिन भारी कर्ज और बढ़ते राजकोषीय घाटे की वजह से बॉन्ड बाजार में भारी उथल-पुथल मची हुई है। बॉन्ड की कीमतें गिर रही हैं और लॉन्ग टर्म यील्ड 20 साल के रिकॉर्ड स्तर को पार कर चुकी है। इस वित्तीय संकट को थामने के लिए अमेरिकी वित्त मंत्री (ट्रेजरी सेक्रेटरी) स्कॉट बेसेंट ने 19 अगस्त को बड़ा ऐलान किया। सरकार 9 सितंबर से अपने ‘डेट बायबैक प्रोग्राम’ को दोगुना करने जा रही है, जिसके तहत प्रति सेशन 4 अरब डॉलर ($4 Billion) के बॉन्ड वापस खरीदे जाएंगे। यह कदम खासतौर पर 10 से 20 साल और 20 से 30 साल की मैच्योरिटी वाले बॉन्ड पर लागू होगा, ताकि सरकार पर कर्ज की बढ़ती लागत को घटाया जा सके।
क्यों हिल गया अमेरिकी बॉन्ड बाजार?
अमेरिकी खजाने पर इस वक्त करीब $2.1 ट्रिलियन का राजकोषीय घाटा है, जो उसकी कुल जीडीपी का लगभग 6.4 फीसदी बैठता है। स्थिति यह है कि अमेरिका को अपने पूरे रक्षा बजट (डिफेंस बजट) से भी ज्यादा रकम सिर्फ कर्ज का ब्याज चुकाने पर खर्च करनी पड़ रही है।
- 30 साल की अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड बढ़कर 3% पर पहुंच गई है।
- 10 साल की बॉन्ड यील्ड उछलकर 7% तक आ चुकी है।
- 24 जून के बाद से 2 साल और 10 साल की यील्ड के बीच 29 बेसिस प्वाइंट्स का बड़ा अंतर दर्ज किया गया है।
AI में अंधाधुंध निवेश और मिडिल ईस्ट तनाव ने बढ़ाई मुश्किल
इस संकट की आग में घी डालने का काम एआई (AI) बूम और भू-राजनीतिक तनाव ने किया है। चिप मेकर Nvidia के 500 अरब डॉलर के निवेश प्लान और कंपनियों द्वारा 200 अरब डॉलर के कॉरपोरेट बॉन्ड जारी करने से ट्रेजरी पर दबाव बढ़ा। वहीं Meta के 420 अरब डॉलर के निवेश प्लान से देनदारियां बढ़कर $1.65 ट्रिलियन तक पहुंच गईं। इसके साथ ही, ईरान से जुड़े तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड के दाम $118 प्रति बैरल तक उछल गए, जिससे अमेरिका में महंगाई दर बढ़कर 4.2% हो गई और पेट्रोल $4 प्रति गैलन पहुंच गया। बढ़ती महंगाई के बीच फेडरल रिजर्व के चेयरमैन केविन वॉर्श द्वारा ब्याज दरों पर कोई सख्त फैसला न लेने से बाजार की अनिश्चितता और बढ़ गई।
आम जनता और ग्लोबल मार्केट्स पर क्या होगा असर?
ट्रेजरी यील्ड में इस रिकॉर्ड उछाल का खामियाजा सिर्फ सरकार ही नहीं, बल्कि आम जनता को भी भुगतना पड़ेगा:
- महंगी EMI और रियल एस्टेट पर चोट: अमेरिका में औसतन होम लोन ब्याज दरें 75% तक जा सकती हैं, जिससे मासिक किस्तें बढ़ेंगी और हाउसिंग मार्केट सुस्त पड़ेगा।
- धीमी इकनॉमिक ग्रोथ: कर्ज महंगा होने से कंज्यूमर स्पेंडिंग घटेगी, जिससे अमेरिकी जीडीपी की रफ्तार धीमी हो सकती है।
- दुनियाभर के शेयर बाजारों में गिरावट का डर: ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस और जापान में भी बॉन्ड यील्ड बढ़ रही है। जब अमेरिकी ट्रेजरी से दबाव बढ़ता है, तो विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) उभरते बाजारों (जैसे भारत) से पैसा निकालना शुरू कर देते हैं, जिससे घरेलू शेयर बाजारों पर तेज बिकवाली का खतरा मंडराने लगता है।













































