Sikhism in Kerala: केरल परशुराम की भूमि, धर्मों का युद्ध और सिखों का अटूट साहस

Shikha Mishra | Nedrick News Published: 01 जनवरी 2026, 12:44 PM Updated: 01 जनवरी 2026, 12:49 PM
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Sikhism in Kerala: कहते है कि केरला असल में हिंदुओ के परम ज्ञानी योद्धा भगवान परशुराम के परशु के प्रहार के कारण बना था। केरल एक ऐसा राज्य है जहां कभी केवल हिंदू धर्म का ही बोलबाला था, लेकिन मौजूदा कुछ सालों में इस्लामिक कट्टरपंथियों और ईसाई मिशनरियों की चाल के कारण यहां पर हिंदुत्व की कमी होती जा रही है, लेकिन इस धर्मों के वॉर के बीच एक धर्म अभी भी वहां मौजूद है, जो सुरक्षित है, जिनपर किसी को भी आंख उठा कर देखने की हिम्मत नहीं होती है।

जी हां, वो धर्मं है सिख धर्म। केरला से सिख धर्म का नाता काफी पुराना है, औऱ यहां रहने वाले सिख भी उन परंपरा को बनाये रखते है जो सिख धर्म को यहां पर काफी खास स्थान देता है। तो चलिए आपको इस लेख में हम केरला में सिख धर्म की कहानी के बारे में बताते हैं, साथ ही कैसे केरला में सिख धर्म का विस्तार हुआ और आज के समय में कैसे हाल में है यहां रहने वाले सिख समुदाय।

जाने केरल का गठन कब हुआ था?

केरल का गठन 1 नवंबर 1956 को हुआ था, जो कि भारत के दक्षिणी छोर पर स्थित है। इसकी राजधानी तिरुवनन्तपुरम (त्रिवेन्द्रम) है। वहीं केरल में बोली जाने वाली मलयालम भाषा दुनिया के 10 सबसे कठिन भाषाओं में से एक है। कोच्ची केरल का सबसे बड़ा शहर है, केरल का क्षेत्रफल 38,863 वर्ग किलोमीटर है, जो कि 21 वें स्थान पर है तो वहीं 2018 की जनसंख्या गणना के अनुसार 3,51,56,007 है। जनसंख्या के मामले में केरल भारत में 13वें स्थान पर आता है। केरल भारत का पहला राज्य है जहां लिंग अनुपात में महिलाओं की संख्या प्रति 1000 पुरुष पर 1084 महिलाये है। यहां पुरुष प्रधान नहीं बल्कि महिला प्रधान समाज चलता है। वहीं साक्षरता के मामले में भी केरल पहले स्थान पर है, यहां करीब 96.2 प्रतिशत लोग साक्षर है। वहीं केरल की व्यवस्था ऐसी है कि मानव विकास सूचकांक में भी वो पहले स्थान पर है। केरल पर्यटन के मामले में भी काफी आगे है, केरल को लोग ‘God’s Own Country’ यानि की ‘ईश्वर का अपना घर’ नाम से बुलाते है।

केरल में सिख धर्म शुरुआत 

वैसे तो केरल एक हिंदू बहुल राज्य है लेकिन  इस्लामिक कट्टपपंथियों और ईसाई मिशनरियों के कारण केरल में बीते कुछ सालों में ईसाइयो औऱ मुसलमानों का संख्या बढ़ी है। बावजूद इसके केरल में सिखो का इतिहास कई सदियों दशको पुराना है। दरअसल इतिहासकारों की माने तो 19वी सदी के शुरुआती दौर में हिंदू ब्राह्मणों ने केरल में कट्टरपंथी सोच जो कि शूद्रो पर थोपी गई थी, उससे मानने से इंकार करते हुए या तो ईसाई धार्म अपनाया या इस्लाम…लेकिन उस दौरान भी निचली जाति के कुछ सामाजिक-राजनीतिक नेताओं ने शूद्रो को ईसाई या इस्लाम अपनाने के बजाय सिख, बौद्ध या फिर जैन धर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया था और 1936 के आसपास कुछ शूद्रो ने सिख धर्म के बारे में जाना और समझा..जिससे प्रभावित होकर कोच्चि के कुछ लोगो ने सिख धर्म अपना लिया।

जातिवाद के जाल से उबरने का आह्वान

कहा जाता है कि सिख संगठनो ने केरल के मुद्दो पर 1924 में ही पहली बार चर्चा की थी, जब वायकोम में शिव मंदिर के पास की सड़कों पर निचली जाति के आने जाने पर रोक लगा दी गई थी, जिसे लेकर दलित समाज ने आंदोलन शुरु कर दिया था, इस दौरान जब इस आंदोलन की जानकारी पंजाब पहुंची तो पटियाला के सिख महाराजा के मंत्री सरदार के.एम. पणिकर ने सरदार मंगल सिंह और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के साथ वाइकोम आंदोलन पर चर्चा करके अकाली वैकोम आए और वैकोम आंदोलन के आंदोलनकारियों को मुफ्त भोजन प्रदान किया। अकालियों ने लोगों से जातिवाद के जाल से उबरने का आह्वान किया था। जिसका प्रभाव धीरे धीरे उन लोगो पर दिखने लगा।

मास्टर तारा सिंह ने खुद हिंदू धर्म छोड़ कर सिख धर्म अपनाया

हालांकि तब अकालियों को गांधी जी के दबाव में इस आंदोलन से हटना पड़ा लेकिन तब कि केरल के दलितो से बेहतर रिश्ते स्थापित हो चुके थे। और 1936 में शिरोमणि अकाली दल से जुड़े मास्टर तारा सिंह केरल आए और उन्होंने जनता को सिख धर्म के महत्व के बारे में संबोधित किया, मास्टर तारा सिंह ने खुद हिंदू धर्म छोड़ कर सिख धर्म अपनाया था, इसलिए उनके लिए केरल के लोगो को संबोधित करना ज्यादा आसान रहा था। उन्होंने वहां के लोगो को सिख धर्म की सेवा भाव की विशेषता से अवगत कराया, सिख संकट की घड़ी में आपके साथ खड़े रहेंगे। उन्होंने कहा कि अगर सिख धर्म अपना लेते है तो वो भी उनके आंदोलन का हिस्सा बनेंगे और अगर नहीं भी अपनाते तो भी सिख संगठन सदैव उनके लिए खड़ा रहेगा। सिख धर्म असल में सेवाल की भावना लिए एक आंदोलन है।

के. सी. कुट्टन( जो कि बाद में सरदार जया सिंह कहलायें) चेरतला नगर पालिका के पूर्व चेयरमैन – स्वर्गीय के. पी. कुट्टन के पिता – ई. राघवन, कृष्णन, कन्नथु केशवन माधवन, ऑल इंडिया सिख मिशनरी वॉलंटियर्स के साथ अमृतसर गए और सिख धर्म अपनाने वाले पहले केरल के सिख बने। करल में सिख धर्म अपनाने वाले लोगो को एझवा सिख कहा गया। 2011 की जनगणना के अनुसार केरल में करीब 3,814 सिख रहा करते है, वहीं पहला सिख गुरुद्वारा कोच्ची में 1976 में स्थापित किया गया था। हालांकि अभी केरल में करीब 5 गुरूद्वारे मौजूद है। जहां सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देने का काम होता है। ‘गुरु का लंगर’ की परंपरा  को निभाते हुए सभी जाति, धर्म और पंथ के लोगों को नि:शुल्क भोजन दिया जाता है। केरल में सिखो की संख्या सीमित है, लेकिन मानता की सेवा, परोपकार, जातिगत भेदभाव को खत्न करके सबको एक साथ लाने की उनकी कोशिशों के कारण सिख काफी सम्मानिक समुदाय है।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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