Global oil storage system: दुनिया की अर्थव्यवस्था का पहिया काफी हद तक तेल पर टिका हुआ है। परिवहन, उद्योग, बिजली उत्पादन, कृषि और विमानन जैसे कई अहम क्षेत्र तेल पर निर्भर हैं। ऐसे में जब भी वैश्विक स्तर पर तेल आपूर्ति को लेकर कोई संकट पैदा होता है, दुनिया भर के देशों की चिंता बढ़ जाती है। इन दिनों अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी अनिश्चितताओं ने एक बार फिर रणनीतिक तेल भंडारों की अहमियत को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
पिछले दो महीनों से अधिक समय से होर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुई बाधाओं के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है। यह वही समुद्री मार्ग है जहां से दुनिया के बड़े हिस्से में तेल की सप्लाई होती है। ऐसे में विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि अगर स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका असर विमानन, परिवहन, कृषि और उत्पादन क्षेत्र सहित लगभग हर उद्योग पर पड़ सकता है।
दुनिया के पास कितना रणनीतिक तेल भंडार है?
वैश्विक स्तर पर रणनीतिक तेल भंडारों को किसी भी आपात स्थिति में ऊर्जा सुरक्षा की गारंटी माना जाता है। वर्ष 2025 के अंत तक दुनिया भर में रणनीतिक तेल भंडारों का अनुमान लगभग 2.5 अरब बैरल बताया गया था। इनमें चीन का हिस्सा सबसे अधिक माना जाता है, जबकि अमेरिका भी इस मामले में दुनिया के सबसे बड़े देशों में शामिल है।
मार्च 2026 में तेल की कीमतों में अचानक उछाल को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के सदस्य देशों ने समन्वित कदम उठाते हुए अपने भंडार से तेल जारी करने का फैसला किया था। इसी योजना के तहत अमेरिका ने अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार से 172 मिलियन बैरल तेल बाजार में उतारना शुरू किया था।
अमेरिका जमीन के नीचे नमक की गुफाओं में रखता है तेल| Global oil storage system
दुनिया में सबसे अनोखी तेल भंडारण व्यवस्था अमेरिका के पास है। वहां तेल को सामान्य टैंकों में नहीं बल्कि जमीन के काफी नीचे स्थित विशाल नमक की गुफाओं में संग्रहित किया जाता है। अमेरिका के खाड़ी तट पर लुइसियाना और टेक्सास के आसपास ऐसे कई भूमिगत नमक गुंबद मौजूद हैं।
पूर्व पेट्रोलियम भूविज्ञानी और वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के प्रोफेसर स्कॉट मोंटगोमरी के अनुसार नमक तेल भंडारण के लिए आदर्श माना जाता है क्योंकि यह पूरी तरह अभेद्य होता है। यानी इसके भीतर रखा गया तेल बाहर नहीं निकल सकता। हालांकि ये प्राकृतिक गुफाएं नहीं हैं बल्कि इन्हें विशेष तकनीक से विकसित किया गया है।
इन भंडारण स्थलों में करीब 60 अलग-अलग गुफाएं हैं, जिनका व्यास लगभग 200 फीट और गहराई 2,000 फीट तक है। वर्तमान में अमेरिका के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार में लगभग 374 मिलियन बैरल तेल मौजूद है, जबकि इसकी कुल क्षमता 714 मिलियन बैरल तक है।
आखिर कैसे बनाई जाती हैं नमक की गुफाएं?
नमक की गुफाओं का निर्माण “सॉल्यूशन माइनिंग” तकनीक से किया जाता है। इसमें जमीन के भीतर मौजूद बड़े नमक भंडारों में पानी डाला जाता है। पानी नमक को घोल देता है और धीरे-धीरे विशाल खाली जगह बन जाती है। बाद में इन्हीं गुफाओं का इस्तेमाल तेल और प्राकृतिक गैस के भंडारण के लिए किया जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि नमक आधारित गुफाएं प्राकृतिक रूप से सीलबंद होती हैं। इनमें तेल को तेजी से भरा और निकाला भी जा सकता है। यही कारण है कि अमेरिका ने अपने लगभग पूरे रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को इसी तकनीक पर आधारित किया है।
भारत में चट्टानी गुफाओं में रखा जाता है तेल
अमेरिका के विपरीत भारत में अभी तक तेल भंडारण के लिए नमक की गुफाओं का इस्तेमाल नहीं किया जाता। यहां तेल को विशाल भूमिगत चट्टानी गुफाओं में सुरक्षित रखा जाता है। ये गुफाएं मानव निर्मित हैं और इन्हें दुनिया की सबसे सुरक्षित हाइड्रोकार्बन भंडारण प्रणालियों में गिना जाता है।
भारत के तीन प्रमुख रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार कर्नाटक के मंगलूरु और पादुर तथा आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में स्थित हैं। इन तीनों सुविधाओं में करीब 53.30 लाख मीट्रिक टन कच्चा तेल संग्रहित किया जा सकता है। यह देश की कई दिनों की तेल जरूरतों को पूरा करने में सक्षम माना जाता है।
इसके अलावा ओडिशा के चांदीखोल और कर्नाटक के पादुर में नई भंडारण परियोजनाएं भी विकसित की जा रही हैं। इन परियोजनाओं के पूरा होने के बाद भारत की रणनीतिक तेल भंडारण क्षमता और मजबूत होगी।
राजस्थान बन सकता है भारत का पहला नमक गुफा केंद्र
भारत अब नमक की गुफाओं पर आधारित तेल भंडारण की दिशा में भी कदम बढ़ा रहा है। वर्ष 2023 में सरकारी इंजीनियरिंग परामर्श कंपनी इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड (EIL) ने राजस्थान में नमक की गुफाओं पर आधारित रणनीतिक तेल भंडार विकसित करने की संभावनाओं का अध्ययन शुरू किया था।
राजस्थान इस परियोजना के लिए सबसे उपयुक्त माना जा रहा है क्योंकि यहां देश के बड़े नमक भंडार मौजूद हैं। इसके अलावा बाड़मेर में रिफाइनरी निर्माणाधीन है और कच्चे तेल की पाइपलाइन का नेटवर्क भी उपलब्ध है। हालांकि भारत के पास इस तकनीक का सीमित अनुभव था, लेकिन अब EIL ने जर्मनी की विशेषज्ञ कंपनी डीप.केबीबी जीएमबीएच के साथ साझेदारी की है, जो गुफा भंडारण और सॉल्यूशन माइनिंग तकनीक में विशेषज्ञ मानी जाती है।
खाड़ी युद्ध से मिला था सबक
भारत में रणनीतिक तेल भंडारण की अवधारणा 1990 के खाड़ी युद्ध के बाद गंभीरता से सामने आई थी। युद्ध के दौरान तेल आपूर्ति प्रभावित होने से कई देशों को ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ा था। इसी अनुभव से सीख लेते हुए प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में 1998 के आसपास भूमिगत रणनीतिक भंडारण परियोजनाओं को आकार दिया गया।





























