Nari Shakti Vandan Adhiniyam: नारी शक्ति वंदन अधिनियम और उत्तर प्रदेश की सड़कों पर उतरा ‘जन आक्रोश’। एक तरफ महिलाओं के सम्मान और हक के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद सड़क पर हैं, तो दूसरी तरफ विपक्ष के अपने तीखे तर्क और आरोप हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वाकई महिलाओं को सत्ता में उनका उचित दर्जा दिलाने की निर्णायक लड़ाई है? या फिर यह सिर्फ आगामी चुनावों की सियासी बिसात पर बिछी एक ऐसी चाल है,
जिसमें महिलाएं केवल एक मोहरा बनकर रह गई हैं? सवाल कई हैं, लेकिन जवाब शायद ही कोई दे पाए। क्योंकि आज हम न चाहते हुए भी एक ऐसी वैचारिक जंग का हिस्सा बन गए हैं, जहाँ अनुचित बातों के पक्ष में भी ऐसे ‘उचित’ तर्क गढ़े जाते हैं कि एक आम इंसान खुद को ही कटघरे में खड़ा पाता है।
और पढ़ें: Top 5 Ghaziabad News: कैब राइड का खौफनाक सच और 8 ट्रेनों का बदला रूट, जानें क्या है जमीनी हकीकत
ब्रजेश पाठक ने ये क्या कह दिया
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बताया जा रहा है कि इस समय पूरे देश में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (Nari Shakti Vandan Adhiniyam) को लेकर राजनीतिक हलचल तेज है। जहाँ एक तरफ विपक्ष इस बिल के क्रियान्वयन की शर्तों और देरी को लेकर कड़ा विरोध जता रहा है, तो वहीं दूसरी ओर भाजपा ने इसे महिलाओं के अधिकार की लड़ाई बताते हुए मोर्चा खोल दिया है।
आज लखनऊ की सड़कों पर इसकी गूँज साफ सुनाई दी, जहाँ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में हजारों महिलाओं ने ‘जन आक्रोश महिला पद यात्रा’ निकाली। मुख्यमंत्री आवास से विधान भवन तक निकली इस यात्रा ने साफ कर दिया कि आने वाले चुनावों में ‘आधी आबादी’ का मुद्दा सबसे ऊपर रहने वाला है।
पदयात्रा के दौरान उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने विपक्ष पर तीखा हमला बोला। उन्होंने महिलाओं की भीड़ की ओर इशारा करते हुए कहा कि आज विपक्ष के अड़ियल रवैये की वजह से ही ये महिलाएं सड़कों पर हैं, और उनके लिए ‘देख सपाई बिटिया घबराई’ वाली कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है।
लेकिन यहाँ एक बड़ा सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या राजनीति के शीर्ष पदों पर बैठे नेतृत्वकर्ताओं के लिए ऐसी भाषा और शब्दों का चुनाव शोभा देता है? जिस गरिमापूर्ण पद से वे जनता का नेतृत्व करते हैं, क्या वहां से ऐसी कहावतें गढ़ना स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सही संकेत है?
क्या 33% आरक्षण बदल पाएगा महिलाओं की जमीनी हकीकत?
वहीं, दूसरे उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने दावा किया कि महिलाओं में सपा और कांग्रेस के खिलाफ भारी आक्रोश है। उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा कि यदि महिलाओं को आरक्षण (Nari Shakti Vandan Adhiniyam) नहीं मिला, तो वे आने वाले चुनावों में विपक्ष को वोट की चोट से जवाब देंगी। लेकिन अगर हम राजनीति से इतर देखें, तो 21वीं सदी की महिलाओं ने अपने दम पर एक लंबा सफर तय किया है उस दौर से जहाँ उनके पास पढ़ने और अपनी बात रखने का अधिकार नहीं था, आज के उस मुकाम तक जहाँ वे खुद अपने फैसले ले रही हैं।
आज की महिला जानती है कि उसके लिए क्या सही है और क्या गलत। महिलाओं में गुस्सा जरूर है, लेकिन क्या उसकी एकमात्र वजह सिर्फ इस बिल का अटकना है? शायद नहीं। क्योंकि आज भी एक महिला न जाने कितनी जद्दोजहद के साथ अपनी दिनचर्या पूरी करती है, और आज भी समाज का एक हिस्सा उसके चरित्र पर उंगली उठाने का कोई मौका नहीं चूकता। ऐसे में सवाल यह है कि क्या सिर्फ संसद में 33% आरक्षण मिल जाने से सड़क और समाज की ये मानसिकता बदल जाएगी?
जनता इस अपमान को नहीं भूलेगी
बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह ने भी विपक्ष को कटघरे में खड़ा करते हुए आरोप लगाया कि विपक्षी दलों ने न केवल इस कानून (Nari Shakti Vandan Adhiniyam) को रोकने की कोशिश की, बल्कि संसद में विरोध जताकर अपनी खुशी भी जाहिर की। उनका कहना है कि जनता इस अपमान को कभी नहीं भूलेगी।
लेकिन यहाँ एक कड़वा सवाल यह भी है कि क्या ‘न भूलने’ की यह बात वाकई सच साबित होती है? क्या हम वैसे ही नहीं भूले जैसे कोलकाता डॉक्टर हत्याकांड या अंकिता भंडारी केस के जख्म आज राजनीति की फाइलों में दब गए हैं?
आज की इस कमरतोड़ महंगाई में आम इंसान अपने बच्चों के भरण-पोषण की जद्दोजहद में इतना उलझा है कि वह रोज सड़कों पर धरना नहीं दे सकता। पेट की भूख उसे मजबूर होकर वापस घर लौटने पर विवश कर देती है। अक्सर बड़े-बड़े आंदोलन भी इसी व्यवस्था की मार से टूट जाते हैं। ऐसे में क्या ये राजनीतिक वादे और विरोध आम महिला की असल जिंदगी की मुश्किलों को कभी छू भी पाएंगे?
क्या यह अधिनियम महिलाओं की बदलेगा किस्मत
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी सपा, कांग्रेस, टीएमसी और डीएमके जैसे दलों को ‘महिला विरोधी’ करार देते हुए कहा कि लखनऊ की इस पदयात्रा में उमड़ा जनसैलाब विपक्ष के प्रति देशभर के गुस्से का प्रतीक है। लेकिन यहाँ एक बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या इस स्थिति का जिम्मेदार सिर्फ विपक्ष है?
बात सिर्फ संसद में एक बिल (Nari Shakti Vandan Adhiniyam) पास होने की नहीं है, असली चुनौती महिलाओं के सम्मान की रक्षा और उनके साथ रोज होने वाले दुर्व्यवहार को जड़ से खत्म करने की है। रोज नए कानून और बिल बनते हैं, लेकिन क्या महज़ कागजी बदलावों से ‘आधी आबादी’ की जमीनी हकीकत बदल जाएगी? क्या आरक्षण के साथ-साथ हमें उस सामाजिक सोच को बदलने की ज़रूरत नहीं है, जो आज भी महिलाओं को बराबरी का हक देने से कतराती है?
कार्यक्रम के अंत में सीएम योगी ने कहा कि प्रदेश का हर वर्ग, यहां तक कि बच्चे भी, महिलाओं के अधिकारों के समर्थन में खड़े हैं। उन्होंने सपा और कांग्रेस को अलोकतांत्रिक बताते हुए कहा कि इन पार्टियों को अपनी छवि सुधारने का मौका मिला था, लेकिन उन्होंने उसे भी गंवा दिया।
जब तक सोच नहीं बदलेगी, क्या बिल बदलेंगे तकदीर?
‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (Nari Shakti Vandan Adhiniyam) और लखनऊ की सड़कों पर उमड़ा यह ‘जन आक्रोश’ यह तो साफ कर देता है कि महिलाएं अब राजनीति के केंद्र में हैं। लेकिन सवाल वहीं का वहीं खड़ा है क्या यह 33% आरक्षण महिलाओं की सुरक्षा, महंगाई से उनकी जंग और समाज में उनके चरित्र पर उठाए जाने वाले सवालों का स्थायी समाधान है?
राजनीति अपनी बिसात बिछाती रहेगी, आरोप-प्रत्यारोप के दौर भी चलते रहेंगे, लेकिन असली ‘वंदन’ तब होगा जब देश की किसी ‘बिटिया’ को इंसाफ के लिए किसी आंदोलन के टूटने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। कानून अपनी जगह हैं, पर जब तक समाज की सोच और व्यवस्था की संवेदनशीलता नहीं बदलेगी, तब तक हर बिल और हर पदयात्रा महज एक राजनीतिक रस्म बनकर रह जाएगी। अब देखना यह है कि क्या यह अधिनियम महिलाओं की किस्मत बदलेगा, या फिर यह भी चुनावी इतिहास का एक और पन्ना बनकर रह जाएगा।



























