गुवाहाटी के Fancy Bazaar में छुपा है सिंह सभा आंदोलन का यह जीवंत गवाह, हैरान कर देगा इतिहास!

Shikha Mishra | Nedrick News Ghaziabad Published: 17 जुलाई 2026, 11:21 PM Updated: 17 जुलाई 2026, 11:21 PM
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गुवाहाटी गुरुद्वारा Fancy Bazaar की कहानी: भारत के पूर्वोतर में बसा एक राज्य असम, जो कि सिख धर्म के अनुयायियों के लिए बेहद खास है। आदि गुरु गुरु नानक देव जी ने सिख धर्म के प्रचार प्रसार के लिए असम की यात्रा की थी, जिसके बाद उनके सम्मान में नौंवे गुरु गुरु तेग बहादुर ने असम की धरती पर कदम रखे थे और सिख धर्म भाई चारे, बाहरी आडंबरो, भेदभाव से मुक्त समाज की स्थापना के लिए लोगो को ज्ञान दिया था.. नतीजा वहां के लोग गुरु साहिब के ज्ञान के प्रभावित हो कर जुड़ने लगे और असम के धुबरी में आज भी सिखो की आबादी के कारण उसे असम का मिनी पंजाब कहा जाता है.. लेकिन जब सिख अपनी मूल ज्ञान से भटकने लगे थे तब सिंह सभा आंदोलन ने उन्हें फिर से सिक्खी के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित किया था, जिसकी तरह असम की पावन धरती पर भी पहुंची थी, और उस आंदोलन के जीवंत उदाहरण के रूप में स्थापित है फैंसी बाजार में गुरुद्वाका श्री गुरु सिंह सभा। अपने इस लेख में हम गुवाहाटी में मौजूद फैंसी बाजार और उसके इतिहास को जानेंगे।

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चमक दमक के बीच स्थित गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा

असम की राजधानी गुवाहाटी में ब्राह्मपुत्र नदी के किनारे पूर्वोतर का सबसे बड़ा होलसेल और रिटेल कपड़ो का बाजार है.. जिसे असल में गुवाहाटी का चांदनी चौक कहा जाता है। इस बाजार को स्थानीय लोग फैंसी बाजार कहते है. रोजाना सुबह 9 बजे खुलने वाला ये बाजार रात को 10 बजे तक चलता है। फैंसी बाजार असल में पारंपरिक आसमिया परिधानों जिसमें मूगा, पाट, एरी सिल्क का साड़ियों के साथ साथ मेखला चादर का सब बड़ा बाजार है। जो यहां काफी मुख्य माने जाते है.. इनके अलावा ट्रेंडी कपड़ो, फुटवियर, ज्वेलरी बेहतरी दामों पर मिलते है, साथ पारंपरिक बांस से बने सजावटी चीजों के लिए फैंसी बाजार कापी प्रचलित है, और उन्ही चमक दमक के बीच स्थित है गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा.. जिसे फैंसी बाजार में होने के कारण गुरुद्वारा फैंसी बाजार भी कहा जाता है।

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19वी सदी में हुई गुरुद्वारे का स्थापना

उस गुरुद्वारे का स्थापना 19वी सदी की शुरुआत में असम में आये उन सिखों ने की थी जो असल में रोजगार और व्यापार करने के लिए पंजाब से या उत्तर भारत के दूसरे इलाके से आये थे, बर्मा के पास होने के कारण सिखों के लिए बर्मा एक बेहतर क्षेत्र था, वहीं ब्रिटिश औपनिवेश होने के कारण व्यापार के लिए असम काफी सही स्थान था। सिखो की आबादी विशेषकर गुवाहाटी और डिब्रूगढ़ जैसे स्थानों पर आकर बसने लगी। इस दौरान  फैंसी बाजार उनका प्रमुख व्यापारिक केंद्र बनने लगा, इसलिए वहां पर सिखों ने आपस में मिलकर एक गुरुद्वारे की स्थापना करने का फैसला किया, जिसके बाद ही साल 1914 में फैंसी बाजार के बीचो बीच गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा को स्थापित किया गया।

100 सालों से भी ज्याद समय से खड़ा ये गुरुद्वारा

इसके आसपास पूरा का पूरा बाजार स्थापित है..ये इस शहर का सबसे पुराना गुरुद्वारा है। ये गुरुद्वारा सुबह 9 बजे संगतो के लिए खोला जाता है और रात को 9 बजे तक खुला रहता है। ये गुरुद्वारा इस वक्त करीब 5 मंजिला बना हुआ है.. जिसके बहुत बड़ा परिसर है। यहां आने वाले सभी श्रद्धालुओ के लिए लंगर की सुविधा मौजूद है। लिख धर्म से जुड़े सांस्कृति औप पारंपरिक कार्यों, सम्मेलन के दौरान यहां भारी संख्या में सिख समुदाय के लोग इकट्टा होते है। फैंसी बाजार में ये गुरुद्वारा केवल सबसे पुराना गुरुद्वारा ही नहीं है बल्कि सिख धर्म के फलने फूलने की कहानी की निशानी के तौर पर करीब 100 सालों से भी ज्याद समय से खड़ा है और अपना ऐतिहासिक गरिमा को बनाये हुए है।

फैंसी बाजार में रहने वाले सिख समुदाय के लोग इस गुरुद्वारे की देखभाव और यहां होने वाले सभी धार्मिक कार्यक्रमों का प्रबंधन देखते है, औऱ इसके रखरखाव में मिलकर खर्च करते है। ये गुरुद्वारा असम में सिख धर्म के आने, गुरुओ के यहां आने से लोगो की सोच   और विचारधारा में जो बदलाव आया.. उसकी ऐतिहासिक निशानी है। अगर आप गुवाहटी आते है और असम की असली पारंपरिक चीजे देखना है तो फैंसी बाजार जरूर जायें और फैंसी बाजार के बीचो बीच बसा ये ऐतिहासिक गुरुद्वारा कैसे सिख धरोहरो को सहेजे हुए है वो भी जरूर देखें।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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