वो गुरुद्वारा जहाँ चूल्हा रोज जलता है पर लंगर कोई नहीं पाता, क्या आपने सुनी है यह हैरान करने वाली बात? – Gurudwara siddh sarai Ji

Shikha Mishra | Nedrick News Ghaziabad Published: 03 May 2026, 09:10 AM | Updated: 03 May 2026, 09:10 AM

Gurudwara siddh sarai Ji: सिखो के पहले गुरु गुरु नानक देव जी ने जब सिख धर्म की शुरुआत की थी, तब उनकी पहला मकसद था कि वो एक ऐसे समाज की नींव रखे, जहां कोई जातपात न हो… जहां सब बराबर हो..कोई वर्ण व्यवस्था न हो.. कोई छुआछूत न हो.. और उसलिए उन्होंने ही सार्वजनिक लंगर की शुरुआत की थी, इसलिए जरिए उन्होने सभी धर्मों और जाति के लोगो को एक साथ एक लाइन मं बैठकर खाने के लिए प्रेरित किया था।

ऐसा गुरुद्वारा जहाँ कोई नहीं खाता लंगर

जो भाईचारे और आपसी सौहार्द का प्रतीक बना.. तब से लेकर ये परंपरा हर गुरु ने निभाई। तय हुआ कि जहां भी गुरुद्वारा होगा वहां लंगर जरूर होगा..लंगर…ताकि कोई भी संगत जो गुरुद्वारा आ वो कभी भूखा न जायें, और सबका पेट भरा रहे। लेकिन क्या आप ऐसा सोच सकते है कि कोई ऐसा भी गुरुद्वारा हो सकता है जहां लंगर बनाया जाता है लेकिन उसे कोई खा नहीं सकता है।

.जी हां… ये रोक लगाने वाले थे सिखों के पांचवे गुरु गुरु अर्जन देव जी.. लेकिन इसी के साथ गुरु साहिब ने एक ऐसा वरदान दिया था जो आज भी लाखों करोड़ो लोगो के जीवन में प्रकाश भर रहा है.. जो उन्हें ऐसी लाइलाज बीमारी से बचा रहा है.. ठीक कर रहा है जिसके लिए संगतें हजारो रूपय खर्च कर देती है। अपने इस लेख में हम बात करेंगे कि गुरुद्वारा बाबा सिद्ध सराय के बारे में।

गुरुद्वारा बाबा सिद्ध सराय का इतिहास

ये बात करीब 1595 के आसपास की है, सिखो के पांचवे गुरु के रूप ने गुरु अर्जन देव जी सिखो को धर्म और मानवता के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित कर रहे थे। उस दौरान उन्होंने चौथे गुरु द्वारा शुरू किया गया स्वर्ण मंदिर का सरोवर निर्माण का कार्य भी अपनी देखरेख में करवा रहे थे। ऐसे समय में काफी लंबे समय के बाद 1595 में गुरु साहिब के बेटे और छठे गुरू हरगोबिंद सिंह जी का जन्म हुआ। गुरु अर्जनदेव जी स्वर्ण मंदिर के सरोवर के कार्य को काफी तेजी से करवा रहे थे। निर्माण कार्य करने वाले मजदूरो में एक मजदूर सिद्ध सर साई जिनकी गुरुसाहिब में काफी श्रद्धा थी, वो करीब 10 किलोमीटर दूर अपने गांव चंबल से रोजाना पैदल चल कर तरणतारण साहिब में सरोवर निर्माण के काम के लिए आता था।

सिदध सरसाई कभी वो लंगर नहीं खाता

हैरानी की बात थी कि गुरु साहिब अपने सभी अनुयायियों के लिए लंगर बनवाते थे, लेकिन सिदध सरसाई कभी वो लंगर खाता ही नहीं था, क्योकिं इतनी लंबी यात्रा करने के लिए वो पहले ही घर से भर पेट खाना खा कर आता था, साथ ही वो लंगर के लिए रास्ते भर में जमा लकड़ियों को इकट्टठा करता हुआ आता, ताकि लंगर बनाने में मुश्किल न हो। ये सिलसिला काफी लंबे समय तक चलता रहा था। उस श्रद्धालु को लगता था कि शायद गुरु साहिब को उसके बारे में कुछ पता नहीं थी.. लेकिन वो परमज्ञानी गुरुसाहिब थे.. वो सब जानते थे.. लेकिन उन्होंने फिर भी ऐसा होने दिया क्योंकि उसके पीछे मानवता की कल्याण ही छिपा था.. दरअसल एक बार गुरु साहिब के पास दरबार में एक कोढ़ी ने अपनी काया ठीक करने के लिए गुहार लगाई थी।

सेवा तो दी लेकिन कभी गुरु का लंगर नहीं खाया

गुरु साहिब ने कोढ़ी की बात सुनी और संगतों में बैठे लोगो से पूछा कि क्या कोई ऐसा है जिसने यहां गुरुघर की सेवा तो दी लेकिन कभी गुरु का लंगर नहीं खाया।  लेकिन कोई नहीं उठा.. यहां तक कि सिद्ध सरसाई भी नहीं उठा.. क्योंकि उन्हें तब ये अंदाजा नहीं था कि गुरु साहिब उनके बारे में बात कर रहे थे, लेकिन तीसरी बार गुरु साहिब ने उनका नाम लेकर उन्हें बुलाया.. सिद्ध सरसाई बड़ी हैरानी से गुरु साहिब के सामने गए और हाथ जोड़ कर खड़े हो गए..और गुरु साहिब का आदेश पूछा.. गुरु साहिब ने सिदध सरसाई से कहा कि वो अपने शरीर पर ओढे जाने वाले कपड़े को कोढ़ी से छूआ दें।

पहले तो वो हैरान रहे गए, लेकिन गुरु का आदेश मानकर उन्होंने ऐसा ही किया.. लेकिन उनकी हैरानी की कोई सीमा नहीं रही जब कोढ़ी कुछ ही समय में ठीक हो गया। गुरु साहिब ने खुश होकर सिद्ध सरसाई को वरदान दिय कि उनके परिवार से जुड़े हर व्यक्ति के पास ये काबिलियत होगी कि जो भी अपना पल्ला किसी त्वाचा रोगी के शरीर पर लगायेगा उसका रोक पूरी तरह से ठीक हो जायेगा।

गुरु अर्जन देव की श्राप

भाई सिद्ध सरसाई को आशिर्वाद तो मिल गया था, लेकिन उनकी विडंबना ये थी कि वो काफी गरीब थे, ऐसे में उनके पास अपना ईलाज कराने आने वालो के लिए वो लंगर पानी का बंदोबस्त नहीं कर सकते थे, उन्होंने अपनी विवशता गुरु साहिब को भी बताई,, जिसपर गुरु साहिब ने सिद्ध सरसाई को कहा कि याद रहे जो भी संगत उनके पास इलाज कराने आयेगी वो किसी भी हाल में उनके यहां लंगर पानी नहीं चखेगी.. वर्ना उनकी बीमारी ठीक नहीं होगी। पल्ला छुआने के बाद रोगी को गांव की मिट्ठी अपने शरीर में लगानी होगी.. तभी इलाज पूरा होगा। इस मिट्टी को राख कहा जाता है और सिद्ध सरसाई जी के सम्मान में उनके निवास स्थान पर ही गुरुद्वारा सिद्ध सरसाई स्थित है।

आज भी इस गुरुद्वारे के पास राख मौजूद है जहां पहले सिद्ध सरसाई के वंशजो द्वारा रोगियों को पहले पल्ला छुआया जाता है औऱ फिर ये पवित्र राख लगाई जाती है। मौजूदा समय में ये गुरुद्वारा तरणतारण साहिब में मौजूद एक छोटा सा गांव चंबल में मौजूद है।

गुरुसाहिब के वरदान के काऱण यहां संगतो को लेकिन लंगर बनाया जाता है लेकिन जो रोगी है वो लंगर नहीं खा सकते है। इसके लिए वहां साफ शब्दो में निर्देश लिखे है। ये गुरूद्वारा सिद्ध सरसाई के त्याग और धैर्य का प्रतीक है, जो बताता है कि अगर सच्चे मन से भक्ति की जाये तो आपको बोलने की जरूरत नहीं है, गुरु साहिब खुद सब देख लेत है।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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