Gurudwara Baoli Sahib: जहां आध्यात्म है वहां धर्म खुद ही मजबूत होता है, जहां श्रद्धा है, वहां चमत्कार भी होती ही है, केवल अपने आराध्य का सिमरन करने से ही सूखी धरती पर हरियाली छा जाती है, बारिश होती है तो वहीं जहां सालो से अन्न न उगा हो वहां अन्न लहलहा जाते है। कुछ ऐसी ही आध्यत्मिकता की शक्ति से पूरे संसार को जगमगाने वाले है सिख धर्म की स्थापना करने वाले पहले आदिगुरु गुरु नानक देव जी। उनके बचपन से लेकर उनकी अंतिम समय तक में कई ऐसी कहानियां सुनी और पढ़ी गई होंगी जो इस बात का साक्ष्य है कि केवल उनके दर्शन मात्र से ही शैतान तक उनका अनुयायी हो जाता था।
गुरुद्वारा बाओली साहिब की कहानी
यहां तक कि भगवान स्वयं उनके भजनो और बाणियो को सुनने के लिए ललायित रहते थे। गुरु साहिब की उदासियों की यात्रा के दौरान उन्होंने जो ज्ञान संसार को दिया, उसकी लौ आज भी जगमग कर रही है.. उनकी निशानियां आज भी मौजूद है, और हर एक सिख के लिए बेहद पवित्र और मान्य है…गुरु साहिब के चमत्कारों की कहानी का जीवंत उदाहरण है गुरुद्वारा बाओली साहिब.. जहां करीब 500 साल बीतने के बाद भी गुरु साहिब द्वारा खोदे गए बाओली से पीने पानी की धारा बहती है। जानते है क्या है गुरुद्वारा बाओली साहिब की कहानी।
जब मंदिर में भाई मरदाना की प्रवेश नहीं करने दिया
दरअसल ये बात 1509 की है, गुरुनानक देव जी अपने परम दोस्त भाई मरदाना के साथ पूरे संसार की यात्रा पर थे। इस दौरान वो अपनी दूसरी उदासी में उड़ीसा के प्रसिद्ध पुरी जगन्नाथ मंदिर में भी भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने गए थे। भाई मरदाना भी उनके साथ थे, गुरु साहिब ने जब मंदिर में जाने की इच्छा की तो मंदिर के पंडितो ने भाई मरदाना का धर्म जानने के बाद उन्हें मंदिर में प्रवेश देने से इंकार कर दिया। गुरु साहिब भी हटी थे, उन्होंने अकेले मंदिर में जाने की इच्छा त्याग दी औऱ मंदिर के पिछले हिस्से में करीब 1.5 किलोमीटर दूर जा कर बैठ गए। भाई मरदाना भी उनके साथ थे, गुरु साहिब वहां बैठकर भजन कीर्तन करने लगे, लेकिन भाई मरदाना को बहुत तेज प्यास लगने लगी।
समुद्र किनारे मीठे पानी का कुआं
जहां वो लोग ठहरे थे वो समुद्र किनारा था, जहां केवल खारा पानी ही मिल रहा था, ऐसे में भाई मरदाना ने गुरु साहिब से कहा कि वैसे तो दूर तक नजर फेरो तो पानी ही पानी है लेकि जो पानी प्यास बुझाये.. उसकी एक बूंद भी नहीं.. जिस पर गुरु साहिब ने समुद्र किनारे एक स्थान पर इशारा कर दिया.. और कहा कि यहां खोदो पानी यही मिलेगा। ये वो वक्त था जब इस स्थान पर मीठा पानी लेने के लिए लोगो को मीलो का सफर करना पड़ता था। भाई मरदाना ने जैसे ही वो स्थान खोदा, वहां से मीठे पानी की कुआं फूट पड़ा..जिसे पंजाबी भाषा में बाओली कहा जाता है।
गुरु साहिब के सम्मान में गुरूद्वारा बाओली मठ
बाओली साहिब को स्थानीय लोग गुरूद्वारा बाओली मठ कहते है, गुरु साहिब ने वहां के लोगो के लिए मीठे पानी का न केवल श्रोत दिया था बल्कि उन्होंने जगन्नाथ मंदिर में ही प्रसिद्ध पंजाबी थाल गगन में थाल की उत्पत्ति की थी। समय के साथ यहां लोगो ने गुरु साहिब के सम्मान में एक मंदिर और एक गुरुद्वारा बनवा दिया। गुरुद्वारा बाओली साहिब के अंदर ही मीठे पानी की बाओली मौजूद है। जो यहां आने वाले आगंतुको का प्यास बुझाती है। बाओली साहिब एक छोटा सा लेकिन भव्य गुरुद्वारा है, जिसकी बनावट पारंपरिक सिख गुरुद्वारे जैसी है। जो कि सफेद पत्थरों से बनाया गया है। यहां रोजाना आने वाले भक्तों के लिए लंगर का आयोजन किआ जाता है। गुरुद्वारे के चार कोनों पर चार मिनारें बनाई गई..चुंकि पुरी में सिखों की आबादी काफी कम है, बावजूद उसके गुरुद्वारा बाओली साहिब 500 साल पुरानी धरोहर को संभालने वाला पहला सिख गुरुद्वारा है।
आपको जानकर होगी कि गुरुद्वारा बाओली साहिब के बनाने के बाद करीब 500 सालों तक इस स्थान पर कोई दूसरा गुरुद्वारा नहीं बनाया था.. यहां रहने वाले सिख समुदाय और शिरोमणी अकाली गुरुद्वारा समिति इस गुरुद्वारे की देखरेख करते है। यहां आने वाले हर एक श्रद्धालु के लिए बाओली साहिब का पवित्र जल अमृत के समान है। अगर आप जगन्नाथ पुरी मंदिर के दर्शन को जाते है तो आपको बाओली साहिब गुरुद्वारे के भी दर्शन करने चाहिए, जो यहां हिंदू और सिख धर्म के सौहार्द का कहानी कहता है। इसका पवित्र जल किसी को भी एक अलग आत्म शांति देता है..500 सालो से इसकी पवित्रता बरकरार है.. और इसलिए इस गुरूद्वारे में पूरे सम्मान से सभी मत्था टेकते है।






























