5 famous Gurudwaras in Assam: साल 1824… भारत पर अंग्रेजी हुकुमत की राज था, लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी केवल भारत तक ही सीमित नहीं थी। वो अपना विस्तार करने में लगी हुई.. वहीं पंजाब पर शेर ए पंजाब महाराजा रणजीत सिंह की हुकुमत थी.. तो उत्तर का रूख करने के बजाये अंग्रेजो ने पूर्वोत्तर का रूख किया.. और 1824 से लेकर 1826 तक पहले बर्मा एंग्लो युद्ध लड़ने के बाद बर्मा के अराकान, तेनासेरिम, असम और मणिपुर कब्जा कर लिया..बर्मा अंग्रेजो की औपनिवेशिक क्षेत्र बन गया। जिसके कारण वहां भारत से भारी संख्या में व्यापारी और रोजगार करने के लिए लोग गए थे। वही दूसरी महाराजा की मृत्यु के बाद पंजाब की अस्थिरता का फायदा अंग्रेजो ने उठाया और 1849 में पंजाब पर कब्जा कर लिया.. इससे एक फायदा सिखों को भी हुआ.. वो अब ब्रिटिश औपनिवेश क्षेत्रों में भी जाकर व्यापार करने लगे.. जिसमें से एक क्षेत्र था असम.. असम में सिखों का आगमन शुरु हुआ.. लेकिन असम से सिखो का रिश्ता पहले गुरु गुरु नानक देव जी के आगमन से ही बन गया था.. सिख गुरुओ के आगमन और यहां सिखों धर्म के प्रचार प्रसार के कई सबूत मिलते है.. खासकर असम में सिखों के शान से खड़े गुरुद्वारे.. जानेंगे असम के गुरुद्वारो के बारे में।
गुरुद्वारा बरछा साहिब, धनपुर धुबरी
असम का धुबरी क्षेत्र असल में वहां का मिनी पंजाब कहलाता है, जहां सिख आबादी सबसे ज्यादा है। कहा जाता है कि पहले गुरु गुरू नानक देव जी 1505 में अपनी उदासी के दौरान असम से कामरूप आये थे.. गुरु साहिब के यहां आगमन और उनके यहां सिख धर्म के प्रचार प्रसार करने के सम्मान में गुरुद्वारा बरछा साहिब का निर्माण करवाया गया। हालांकि कामरूप में गुरुसाहिब के आने के कोई साक्ष्य नहीं बचे है लेकिन सिख धर्म ग्रंथो में लिखी वाक्यों से ये प्रमाण मिलता है, गुरुद्वारा बरछा साहिब जिस स्थान पर है वहां गुरु साहिब ने असम के महान समाज सुधारक और संत श्रीमंत शंरकदेव जी से मुलाकत भी की थी। वहीं इस स्थान पर रानी नूरशाह का शासन था जो तंत्रमंत्र और जादू टोना किये जाने वाले क्षेत्रों में जाना जाता था। गुरु साहिब पर भी रानी ने तंत्र विद्या करनी चाही लेकिन गुरु साहिब की पवित्रता औऱ दिव्य शक्तियों के सामने रानी नूरशाह का तंत्र धरा का धरा रह गया.. रानी गुरु साहिब के कदमें में गिर कर क्षमा मांगने लगी.. और गुरु साहिब की ही अनुयायी बन गई.. जब गुरुसाहिब वहां से जाने लगे तब याद के तौर पर रानी ने कुछ देने की गुहार की.. जब गुरुसाहिब ने अपना बरछा जिसे भाला भी कहा जाता है, जमीन में गाड़ दिया.. गुरु साहिब के यहां आने और बरछा के गाड़े जाने के सम्म3न में ही बरछा साहिब गुरुद्वारे का निर्माण किया गया।
गुरुद्वारा गुरु सिंह सभा मोरखाली गुवाहटी
18वी सदी में शुरु हुए सिंह सभा आंदोलन का असम में भी व्यापाक प्रभाव रहा है उसके सबूत के रूप में खड़ा है गुवाहटी के मोरखाली में स्थित गुरुद्वारा गुरु सिंह सभा। 19 वी सदी की शुरुआत में असम में सिखों की संख्या काफी कम थी, लेकिन वहां रहने वाले स्टेशन मास्टर सरदार आला सिंह ने वहां कुछ अमीरो के साथ मिलकर सिख गुरुद्वारा बनाने की बात की, और 1914 में गुरुद्वारा श्री सिंह सभा का नींव रखी थी। तब ये गुरुद्वारा एक छोटा सा हुआ करता था लेकिन आजादी के बाद 1950 में इसका विस्तार किया गया..तब से ये गुरुद्वारा सिखों के लिए सबसे अहम है। नहीं1976 में उसका फिर से जीर्णोधार शुरु हुआ और ये 5 फ्लोर की बनाई गई। जिसमें पहले फ्लोर पर दरबार साहिब है, वहीं ग्राउंड फ्लोर पर गुरुद्वारा कमीटी का ऑफिस है। दूसरे फ्लोर पर लंगर हाउस है, फिर गुरुद्लारे का किचन है.. पिछले 100 सालों में इस गुरुद्वारे में जो बदलाव आये उसे आप यहां आसानी से देख सकते है।
गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर साहिब
सिखों के नौवे गुरु गुरू तेग बहादुर ने पहले पातशाह के भ्रमण किये गए हर उस स्थान के दर्शन किये थे, जहां वो गए थे, इसी दौरान वो 17 सदी में 1670 में असम की यात्रा कर धुबरी क्षेत्र में उस स्थान पर आये थे, जहां ब्राह्मपुत्र नदी के किनारे गुरु साहिब ने विश्राम किया था। नौवे गुरुसाहिब यहां काफी समय तक रूके और उन्होंने यहां गुरुद्वारे का भी निर्माण करवाया. जिसे गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर साहिब कहा गया। इस गुरुद्वारे को दमदमा साहिब भी कहा जाता है। गुरु साहिब ने अपने निवास के दौरान अंबर के राजा राम सिंह और औरंगज़ेब ने अहोम सरदार चक्रध्वज के बीच के टकराव को संधि से रोक दिया था। शांति की याद के तौर पर, एक ऊंचा टीला बनाया गया, जिसमें हर सैनिक ने पांच ढाल भर मिट्टी डाली। गुरु साहिब ने इसे पवित्र माना और यहां गुरुद्वारे का निर्माण कराया था। जो 18वी सदी के अंत में भूकंप से तबाह हो गया था लेकिन इसे फिर से बना लिया गया। आज भी ये गुरुद्वारा यहां रहने वाले सिखो के लिए काफी अहम है।
शिवासागर गुरुद्वारा साहिब, रोंगपुर नगर शिवासागर
असम एक ऐसा राज्य है जो तीन तरफ से पहाड़ी घाटी से घिरा हुआ है, ऐसे में वहां बाढ़ आने का खतरा सबसे ज्यादा है। जिसे देखते हुए सिखों ने हमेशा की तरह पीड़ितो की मदद करने और सिख धर्म की मूल सिद्धांतो को कायम करने के लिए रोंगपुर नगर के शिवासागर में एक गुरुद्वारे का निर्माण कराया जिसे शिवासागर गुरुद्वारा साहिब कहा जाता है। यहां बाकि सभी गुरुद्लारों की तरह रोजाना प्रार्थन भजन कीर्तन किये जाते है लेकिन इसकी विशेषता है। आपदा के समय में डट कर खड़े रहना। इस क्षेत्र में करीब 50 सिख परिवार रहते है, जो गुरुद्वारे का प्रबंधन करते है। ये गुरुद्वारा रोज सुबर 4 बजे खुलता है और रात को 10 बजे तक खुला रहता है। जहां रोजाना जरूरतमंद लोगो के लिए लंगर की व्यवस्था है। ये स्थान सिख और हिंदू धर्म के भाईचारे का प्रतीक है। असम में अनगिनत गुरुद्वारे है, जो वहां सिख धर्म के फलने फूलने की कहानी कहते है, जो साक्षी है कि सिख जहां भी रहेंगे वहां वो मानवता की सेवा को हमेशा सबसे ऊपर रखेंगे।
































