Sawan में झूला क्यों झूलते है लोग, जानें इसके पिछे का रहस्य

Rajni | Nedrick News Ghaziabad Published: 01 अगस्त 2026, 09:21 PM Updated: 01 अगस्त 2026, 09:59 PM
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Sawan 2026: रिमझिम फुहारों के बीच सावन में झूला झूलने की परंपरा तो सदियों से चली आ रही है, लेकिन क्या आप इसके पीछे छिपे धार्मिक रहस्य को जानते हैं? माना जाता है कि सावन के महीने में सुहागिन महिलाएं अपने शादीशुदा जीवन में मधुरता और अखंड सौभाग्य के लिए झूला झूलती हैं। तो चलिए इस लेख के जरिए जानते हैं इससे जुड़ी खास पौराणिक मान्यताएं

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माता पार्वती की तपस्या

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। सावन के महीने में ही शिवजी ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। इस दिव्य मिलन की खुशी में माता पार्वती ने अपनी सखियों के साथ झूला झूला था। यही कारण है कि सावन (Sawan) में महिलाओं के झूला झूलने की परंपरा है, जिससे उन्हें अखंड सौभाग्य का वरदान मिलता है।

राधा-कृष्ण का दिव्य झूलन उत्सव

वैष्णव परंपरा में सावन और भाद्रपद के महीने के बीच ‘झूलन उत्सव’ का विशेष महत्व है, जहाँ राधा-कृष्ण की लीलाओं और उनके अनन्य प्रेम को याद करते हुए मंदिरों और घरों में भव्य झूले सजाए जाते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने राधा रानी के विरह को दूर करने और उनके चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए कदम के पेड़ पर झूला डाला था। तब से यह परंपरा प्रेम और आनंद का प्रतीक बन गई है।

झूला झूलने की परंपरा के पीछे छिपे रहस्य

  • अहंकार की मुक्ति और समर्पण का भाव: जब हम स्वयं झूला झूलते हैं या भगवान को झूला झुलाते हैं, तो यह हमारे भीतर के अहंकार को छोड़ने का संदेश देता है। झूले की गति हमें यह सिखाती है कि जीवन के उतार-चढ़ाव के बीच भी दिव्य प्रेम और समर्पण में कैसे डूबे रहना है।
  • प्रकृति के साथ एकात्मता का प्रतीक: झूला झूलना प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करने का एक माध्यम है। पुराने समय में लोग प्रकृति के करीब रहने और हरियाली के बीच अधिक समय बिताने के लिए पेड़ों की डालियों पर झूले डाला करते थे। यह मनुष्य और प्रकृति के गहरे जुड़ाव को दर्शाता है।
  • कजरी और लोकगीतों से बढ़ता आपसी प्रेम: सावन में झूला झूलते समय कजरी और पारंपरिक झूला गीत गाए जाते हैं। इन लोकगीतों में राधा-कृष्ण की मधुर लीलाओं और शिव-पार्वती की पावन कथाओं का वर्णन होता है। सामूहिक रूप से गाए जाने वाले ये गीत समाज में आपसी प्रेम, भाईचारे और सौहार्द को बढ़ावा देते हैं।

Rajni

rajni@nedricknews.com

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