Guru Arjan Dev Ji: सिख के दस गुरुओं में केवल छठे गुरु हर गोविंद राय जी और दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ही ऐसे हुए जिन्होंने मुगल सल्तनत के विरुद्ध हथियार उठाएं थे, जबकि बाकी के गुरु अहिंसा, सदाचार से लोगो को धर्म के प्रति जागरूक करना चाहते थे, जिसके मुगलों की क्रूरता का सबसे पहले शिकार हुए थे पांचवें गुरु गुरु अर्जन देव जी। उन्हें जहांगीर ने यातनाएं दे कर मार दिया था वो भी उसी के बेटे शाहजहाँ को शरण देने के लिए। मगर गुरु साहिब ने तब भी क्रोध नहीं किया लेकिन गुरु साहिब के जीवन में एक ऐसी घटना हुई, जिसके कारण वो अपने एक परम भक्त पर इतना नाराज़ हो गये थे कि उन्होंने उससे मुंह मोड़ लिया था.. यहां तक कि जो लंगर हर धर्म औऱ समुदाय के लोगो के हमेशा खुला रहता था, उस लंगर को गुरु साहिब ने अपने भक्त को कभी खाने नहीं दिया था। अपने इस लेख में हम जानेंगे कि आखिर क्यों गुरु अर्जन देव हुए थे इतने क्रोधित… और कौन था वो भक्त.. और किस गुनाहो के कारण से गुरु साहिब ने ये सजा सुनाई थी।
गुरु अर्जन देव का अनुयायी
ये कहानी है पांचवे गुरु गुरु अर्जुन देव सिंह जी के समय में पंजाब के होशियारपुर जिले के एक गांव कांगमाई में रहने वाले एक राजपूत रहीस की.. जिसका नाम था भाई मंझ। वो एक राजपूत परिवार से था और खानदानी रहीश था, उसके अधीन में 72 गांव थे। लेकिन हिंदू होते हुए भी वो एक पहुंचे हुए मुसलमान पीर सखी सरवर का परम अनुयायी था। सखी सरवर 12 सदी के एक सूफी संत हुए, जिन्होंने सभी धर्मों का सम्मान किया था। भाई मंझ सखी सरवर का इतना बड़ा भक्त था कि उसने अपने ही घर को पीर कब्र बना ली थी। जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग उसके घर पर कब्र पर मत्था टेकने आते थे। इतना ही नही जो संगते पीर निगाहें जा कर दर्शन नहीं कर सकती थी, उन्हें वो अपने खर्चे पर ले जाया करता था। फिलहाल पीर निगाह पाकिस्तान में मौजूद है।
कौन है भाई मंझ
समय अपनी रफ्तार से चल रहा था, लेकिन तभी 1585 में जब भाई मंझ संगतो को पीर निगाहे से लेकर लौट रहा था, तभी रास्ते में उसने किसी को गुरु नानक देव जी की बाणी को बड़े प्यार से भक्ति में खो कर सिमरण करते हुए सुना..भाई मंझ उन बाणियों में खो गया.. जब वो सिख शिष्य रूका तो भाई मंझ ने पूछा कि ये मन को शांति देने वाली बाणी किसकी है..जिसपर शिष्य ने जवाब दिया कि सिख धर्म के पहले गुरु गुरु नानक देव जी,.. भाई मंझ ने उनके मिलने की इच्छा जाहिर की, तब शिष्य ने बताया कि अभी उनकी गद्दी पर पांचवे गुरू अर्जन देव जी विराजमान है। और भाई मंझ उनसे जाकर अमृतसर में मिल सकते है।
शिष्य की बात सुनकर भाई मंझ बिना समय गवायें ही अमृतसर पहुंच गया। लेकिन उस वक्त हरमंदिर साहिब गुरुद्वारा और पवित्र सरोवर का निर्माण चल रहा था। भाई मंझ वहां की संगतो को गौर से देखने लगा जो कि गुरु की सेवा निस्वार्थ भाव से कर रहे थे। स्नान करके जब वो गुरु साहिब के सामने पहुंचा तो उनकी आभा देखकर आनंदित हो उठा.. उसकी आंखो में आंसू आ गए और सोचने लगा कि पीर निगाहें में उसे कभी ये खुशी का अहसास क्यों नहीं हुआ.. बस फिर क्या था उसने गुरु साहिब के सामने सिक्खी का रास्ता अपनाने की अपील की। गुरु साहिब ने साफ इंकार करते हुए कहा कि सिक्खी के रास्ते पर चलता उसके बस की बात नहीं है इसलिए वो सखी सरवर की ही भक्ति करें, लेकिन भाई मंझ भी जिद पर था, जिसके बाद गुरु साहिब ने भाई मंझ को आदेश दिया कि घर में बनी दो कब्रो को तोड़ दो।
पीर सरवर के प्रकोप से भाई मंझ ने बचाया
उन्होंने भी यहीं किया.. और उनके घर आने वालों को भी मना कर दिया ..जिससे सखी सरवर के अनुयायियो ने उसे चेतावनी की दी कि वो अपना सबकुछ खो देगा। लेकिन भाई मंझ सिक्खी की राह पर चलने के लिए तैयार थे। उन्होंने किसी की परवाह नहीं की.. मगर कुछ दिनों बाद ही त्रासदी शुरु हो गई। उसके सारे पशु मर गए.. गांव के लोगो ने पीर सरवर के प्रकोप से बचने के लिए भाई मंझ से रिश्ता तोड़ दिया.. जिसके बाद भाई मंझ को काफी नुकसान झेलना पड़ा। पूरे गांव ने गांव से बाहर निकाल दिया था, तो वहीं जब वो गुरु अर्जुन देव जी के पास पहुंचा तो गुरु जी ने उसे आज्ञा दी कि जब तक संदेश न दिया जाये तब तक वहां न आये। भाई मंझ अपनी पत्नी और बेटी के साथ दर दर की ठोकरे खाने लगा। किसी तरह एक सेठ के घर नौकरी शुरु की.. समय बीतता रहा.. मगर भाई मंझ की उम्मीद नहीं टूटी..मगर एक दिन एक सिख गुरु साहिब की चिट्ठी ले कर आया.. भाई मंझ को लगा कि शायद बुलावा आया होगा मगर उसमें लंगर के लिए 100 रूपय की मांग की गई थी।
संगतो को झूठा प्रसाद खाना शुरु कर दिया
भाई मंझ के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल था तो वो 100 रूपय कहां से लाते..बस वो अपनी पत्नी और बेटी के साथ चल पड़े पैसों का जुगाड़ लगाते..लेकिन किसी ने मदद नहीं की, जिसेक बाद थक हार कर खुद को ही बेचने का फैसला किया.. और बीच बाजार खुद को बेचने की पेशकश करने लगा। कभी एक सेठ ने कहा कि उसे नौकर की जरूरत है, वो अपनी पत्नी और बेटे को सेठ को देदें, बदले में पैसे ले जाये। भाई मंझ ने ऐसा ही किया। पैसे लेकर उन्होंने सिख शिष्यों को दे दिया। कुछ समय के बाद गुरू साहिब ने उसे बुलाया.. वो जब गुरूसाहिब के पास पहुंचा तो गुरू साहिब ने उसकी तरफ देखा भी नहीं। भाई मंझ संगत सेवा में लग गया.. वो सेवा करता और फिर लंगर प्रसाद खा कर जीवन जी रहा था, लेकिन गुरु साहिब ने उन्हें बुलाकर कहा कि सेवा के बदले जब वो लंगर खा ही लेता है तो फिर उसके हिस्से में सेवा का फल कैसे आयेगा.. बस तब से भाई मंझ ने संगतो को झूठा प्रसाद खाना शुरु कर दिया।
गुरु साहिब से सतनामरूपी धन मिला
मगर गुरू साहिब ने ये कह कर झूठा प्रसाद खाने के लिए रोका कि वो तो जानवरो के लिए होता है, उनका हिस्सा खा जाओगे तो वो क्य़ा खायेंगे। बस भाई मंझ सारा दिन सेवा में लगा रहता औऱ फिर जंगल से फल तोड़ कर खाने लगा, लेकिन इससे वो कमजोर हो गया। कठिन परिक्षा के बाद गुरु साहिब ने उसे बुलाया और कहा कि वो सखी सरवर की भक्ति करें, क्योंकि उनकी नाराजगी से उसकी ऐसी हालात है, मगर भाई मंझ ने हाथ जोड़ते हुए कहा कि उसे कोई पछतावा नहीं है। गुरु साहिब से मुझे सतनामरूपी धन मिला है जिसे उनके कोई छीन नहीं सकता.. और मुझे भौतिक चीजे गंवाने का कोई दुख नहीं है। इसी तरह एक रात जंगल से लौटते समय भाई मंझ लड़कियो का गट्ठर लेकर कुयें में गिर गए.. लेकिन उन्हेंने लड़कियो के गट्ठर को सिर पर रखे रखा ताकि वो भीग न जाये।
रातभर न लौटने के बाद गुरु साहिब ने खुद जंगल जाने का फैसला किया और वो कुएं के पास पहुंचे, तो देखा कि सूखी लकडियों का गट्ठर अब भी उनके सिर पर है। भाई मंझ ने कहा कि पहले गट्ठर निकालों क्योंकि गुरु का लंगर उसी से बनना है, उसके बाद भी मंझ को निकाला गया। ऐसी भक्ति देखकर गुरु साहिब ने उसकी परिक्षा को और न बढ़ाने का फैसला किया और गले से लगा लिया। जिसके बाद भी मंझ के कहने पर वरदान दिया कि वो आगे से ऐसी कठिन परिक्षा अपनी संगतो की नहीं लेंगे। वो वापिस अपने घर लौटे, उनका खोया हुआ सबकुछ उन्हें मिलेगा.. भाई मंझ को सबकुछ वापिस से मिल गया। सिख धर्म में गुरु साहिब के साथ साथ भाई मंझ जी का नाम भी बड़े सम्मान से लिया जाता है। उनकी भक्ति गवाह है कि आपकी सच्ची भक्ति और सेवा कभी जाया नहीं जाती है। देर से ही सही आपको फल जरूर मिलता है।




























