Gurdwara in Singapore: शून्य से शिखर तक, कैसे सिंगापुर में सिखों ने फिर से जीवित किए अपने पावन गुरुद्वारे

Shikha Mishra | Nedrick News Singapore Published: 11 फ़रवरी 2026, 12:30 PM Updated: 11 फ़रवरी 2026, 12:30 PM
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Gurdwara in Singapore:  पूरी दुनिया में सिंगपुर एक ऐसा एशियाई देश है, जिसने सबसे ज्यादा जल्दी से आर्थिक रूप से तरक्की की है जो वैश्विक तौर पर सिंगापुर को काफी मजबूत और संपन्न बनता है> सिंगापुर के ज्यादातर आबादी यहाँ मुख्य रूप से चीनी 76.2%, मलय 15.0%, और भारतीय 7.4% की है । इन भारतीय आबादी में सबसे अहम आबादी मानी जाती है सिखो की। जो वैसे तो संख्या में केवल 15000 के आसपास ही है लेकिन इनकी बनाई गई सिख फाउंडेशन और पंजाबी फाउंडेशन प्रमुख संगठन हैं जो वहां सिख विरासत और पंजाबी भाषा को बढ़ावा दे रहे हैं। साथ ही गुरुद्वारों की देखभाल की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। तो चलिए आपको इस लेख में हम सिंगापुर में मौजूद 5 प्रमुख गुरुद्वारों के बारे में जानेंगे। कैसे सिंगापुर के गुरुद्वारे कभी पूरी तरह से खत्म कर दिए गए थे लेकिन सिखो के निरंतर प्रयास ने आज यह करीब 8 गुरुद्वारे संचालित हुए है। जानते है  खास गुरुद्वारों के बारे में।

सेंट्रल सिख गुरूद्वारा – Central Sikh Gurdwara

सिखो का इतिहास वैसे तो सिंगापुर से 18वी सदी से ही जुड़ गया था, लेकिन तब वो ब्रिटिश फौज के अधिकारियों के रूप में कार्यरत थे, लेकिन कुछ भारत लौट आये कुछ वहीं रह गए, जो रह गए उनके लिए पहली बार 1912 में सिंगापुर का पहला सिख गुरुद्वारा सेंट्रल सिख गुरुद्वारे का निर्माण कराया गया था। हालांकि इसकी नींव 1986 में बून केंग MRT स्टेशन के पास कलंग में सेरंगून रोड के जंक्शन पर टाउनर रोड पर रखी गई थी, जो कि श्री गुरु नानक देव जी की जयंती के मौके पर बनाया गया था। लेकिन इसे आधिकारिक रूप से 1912 में वर्तमान स्थान पर स्थानांतरित किया गया था। क्वीन स्ट्रीट, सिंगापुर में मौजूद इस गुरुद्वारे को स्थापित करने के लिए सिखों समुदाय ने एक सिंधी व्यापारी वासियामुल से मदद लेकर बंग्ला खरीदा और वहां गुरु ग्रंथ साहिब को स्थापित कर आधिकारिक गुरुद्वारा बनवाया। जिसे केंद्रीय सिख मंदिर यानि की सेंट्रल सिख गुरुद्वारा या फिर वड्डा गुरुद्वारा कहा गया, यहां श्री गुरु ग्रंथ साहिब के लिए 13 फीट ऊंचा गुंबद तैयार किया गया है।  ये आज भी संचालित होता है।

गुरुद्वारा साहिब सिलट रोड –  Gurdwara Sahib Silat Road

सिंगापुर में मौजूद ये गुरुद्वारा सिख संत और क्रांतिकारी भाई महाराजा सिंह को समर्पित करके बनाया गया है। अंग्रेजी हुकुमत खिलाफ पहली बार आजादी की आवाज उठाने के लिए 1857 की क्रांति को याद किया जाता है, लेकिन इस क्रांति पहले संत-क्रांतिकारी भाई महाराज सिंह ने अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ शंखनाद फूंक दिया था। लुधियाना जिले के रब्बन गांव में निहाल सिंह के रूप में जाना जाता था, लेकिन भाई बीर सिंह के प्रभाव में आ कर वो नौरंगाबाद रहने लगे, जिसे अभी तरणतारण कहा जाता है। 1844 में भाई बीर सिंह के देहांत के बाद वे नौरंगाबाद डेरे के प्रमुख बने।

अंग्रेजी हुकुमत के अत्याचार

लेकिन अंग्रेजी हुकुमत के अत्याचार को देखते हुए उन्होंने बिगुल बजा दिया..उन्होंने उसके लिए कई जगहों पर यात्रा की थी, लेकिन एक मुखबिर के कारण 28 दिसंबर 1849 को आदमपुर में गिरफ्तार कर लिया गया, और उन्हें जानबूझ कर सिंगापुर की जेल भेज दिया गया। जहां वो एक ही कमरे में बंद रहते थे, तमाम यातनाओ के बाद 5 जुलाई 1856 को उनकी स्वर्गवास हो गया… सिंगापुर की जेल भेजे जाने वाले पहले क्रांतिकारी थे भाई महाराजा सिंह..जिनकी याद में ही ये गुरुद्वारा बनाया गया है।

सफेद पत्थरों से बना ये गुरुद्वारा 7 मंजिला और काफी भव्य है। उसके गुंबद पर सोना जड़ा हुआ है। इस गुरुद्वारे की शुरुआत साल 2000 में हुई है। इसके 7 मंजिला इमारत मेंजिम, संगीत एकेडमी, ऑडिटोरियम, लाइब्रेरी के साथ साथ बुजुर्गों के लिए भी कमरे बनाये गए है। सिख धर्म की परंपरा और संस्कृति को बढ़ावा देने और उसके इतिहास को समझने के लिए यहां सप्ताहिक क्लासेस दी जाती है। कहा जाता है कि इस गुरूद्वारे में आने वालें और यहां मत्था टेकने से आपकी अधूरी इच्छा पूरी होती है।

गुरुद्वारा साहिब यिशुन – Gurdwara Sahib Yishun

सिंगापुर के यिशुन में करीब 150 से 200 सिख परिवार रहते है, और यहीं स्थित है सिंगापुर के सबसे पुराने गुरुद्वारों में गिना जाने वाला गुरुद्वारा, गुरुद्वारा साहिब यिशुन। दरअसल 1980 से पहले सिंगापुर के दो प्रमुख गुरुद्वारों, गुरुद्वारा साहिब गुरु खालसा सभा सेंबावांग और गुरुद्वारा साहिब जालान कायू को को रिडेवलेपमेंट के नाम पर खाली करने का नोटिस दिया गया, जिससे दोनो को बंद करना पड़ा और फिर 1991 में सरकार ने खुद एक जमीन को लीज पर देने की पेशकश की, जिसके बाद 17 अक्टूबर 1993 को गुरुद्वारा साहिब यिशुन की नींव रखी, 27 अगस्त 1995 को सरदार करतार सिंह ठकराल ने गुरुद्वारे का उद्घाटन किया। ये एक दो मंजिला इमारत है।

पहली मंज़िल पर दरबार साहिब

जिसमें ग्राउंड फ़्लोर पर गुरु का लंगर हॉल और किचन और ग्रंथियों के रहने की जगह है। पहली मंज़िल पर दरबार साहिब, सच खंड, एक लाइब्रेरी कम मीटिंग रूम और एक ऑफिस है। इस गुरुद्वारे की देखरेख यहां रहने वाले सिख परिवार ही करते है। जो सिख धर्म के नैतिक मूल्यों के आधार पर आसा दी वार कीर्तन करते है, हर रविवार सुबह नॉर्मल प्रार्थना होती है। हर गुरुवार को सूरज प्रकाश की कथा और प्रार्थना होती है, हर महीने संगरांद और पूर्णिमा (पूर्णिमा का दिन) प्रोग्राम होते हैं। जो ये बताते है कि क्यों केवल सिखों के लिए ही नहीं बल्कि यहां रहने वाले अन्य कम्युनिटी के लोगो के लिए भी बेहद अनूठा नजारा होता है।

मौजूदा समय में ये तीन गुरुद्वारे एक्टिव रूप से काम कर रहे है, इसके अलावा पर्ल्स हिल गुरुद्वारा, तंजोंग पगार डॉक सिख पुलिस गुरुद्वारा 1912 में ध्वस्त कर दिया गया था, नौसेना बेस सिख मंदिर जो कि 1925 में शुरु हुआ था और 1971 में बंद कर दिया गया, सेम्बवांग सिख मंदिर जो कि 1936 में शुरु होकर 1995 में बंद कर दिया गया, वहीं जालान कायू सिख मंदिर जो कि 1930 के दशक में शुरु हुआ था और 1995 में बंद कर दिया गया था। सिंगापुर में सिख अल्पसंख्क के रूप में पहुंचाने जाते है,, उनकी पहचान अहम और खास है। सिख धर्म की महानता की कहानी कहते हुए ये गुरुद्वारे शान से खड़े है।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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