Dinanagar Maharaja Ranjit Singh की बारादरी को पहुंचा नुकसान, हेरिटेज संगठनों ने जताई चिंता

Shikha Mishra | Nedrick News Ghaziabad Published: 11 Jun 2026, 11:46 AM | Updated: 11 Jun 2026, 11:46 AM

Dinanagar Maharaja Ranjit Singh: साल 2020 में ‘बीबीसी वर्ल्ड हिस्ट्रीज़ मैगज़ीन की एक सर्वे की रिपोर्ट आई थी, रिपोर्ट के मुताबिक महाराजा रणजीत सिंह जी को दुनिया के ‘सर्वकालिक महानतम नेता में पहला स्थान मिला था, जरा सोचिए पंजाब के पहले महाराजा और सिख सम्राज्य की स्थापना करने वाले महाराजा रणजीत सिंह जी की प्रसिद्धि, प्रभाव और प्रतिष्ठा आज भी कितनी प्रबल और मजबूत है कि अमेरिका के सोलहवें राष्टपति अब्राहम लिंकन और दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान इंग्लैंड के प्रधानमंत्री  विंस्टन चर्चिल के नामों को भी पछाड़ दिया था। महाराजा रणजीत सिंह के जीते जी अंग्रेजी की नीतियो कभी पंजाब में काम नहीं कर पाई, जिसके कारण उनके शासन काल में सामाजिक स्थिरता, आर्थिक मजबूती और विकास के साथ साथ और सांस्कृतिक धरोहरो के पुनरुद्धार को प्राथमिकता दी गई.. जिसके कारण सिख सम्राज्य का वो स्वर्ण युग कहलाता है। महाराजा की बहादुरी के कारण उनका सम्राज्य अफगानिस्तान से लेकर कश्मीर और तिब्बत तक था.. उनकी बहादुरी की चर्चा आज भी सिखों में बहादुरी की लहर भर देती है, लेकिन दुख की बात तो ये है कि सिख इतिहास के लिए इतने अहम शख्स से जुड़ी धरोहरो को सहेजने में हम आज पूरी तरह से असफल साबित हो रहे है।

दरअसल गुरदासपुर के दीनानगर में महाराजा रणजीत सिंह का ग्रीष्मकालीन महल बारादरी मौजूद है, लेकिन इस वक्त आप इसे देखेंगे तो इसकी हालात पर और सरकार की लापरवाही पर आपको गुस्सा आ सकता है, 26 अप्रैल 2026 को बटाला की विरासती मंच समूह के सदस्यों ने एक शिकायत दर्ज कराई थी, शिकायत के अनुसार इस जर्जर हो चुके विरासत को और ज्यादा नुकसान पहुंचाने के लिए कुछ समाजिक तत्वो ने इसकी दीवारों में तोड़फोड़ की थी… महल की दीवारों के आसपास ईंटो के टुकड़े गिरे हुए थे। सिख वास्तुकला और इतिहास को समेटे बारादरी महल के साथ ऐसी घटना कोई पहली बार नहीं हुई थी, लेकिन इस घटना ने पंजाब में ऐतिहासिक धरोहरो को बचाने के लिए सरकार द्वारा उठाये जा रहे कदमों को लेकर सवालिया निशान खड़े कर दिये है।

बारादरी का इतिहास – History of Baradari

महाराजा रणजीत सिंह को गुरदासपुर जिले में स्थित दीनानगर, गर्मियों के गर्म महीनों में रहने के लिए सबसे बेहतर स्थान लगता था, इसलिए उन्होंने गर्मीयों का समय यहां बिताने के लिए बारादरी महल का निर्माण करावाया था। जिसे महाराजा की  ग्रीष्मकालीन राजधानी भी कहा जाता था। बारादरी  बारह दरवाजों और 12 ब़ड़ी खिड़कियों वाली एक पारंपरिक शैली की इमारत है, जिसे इस तरह से बनाया गया है कि इसके चारों ओर से ताजी हवा  महल के अंदर आ सकें। लाहौर की चिलचिलाती गर्मी से बचने के लिए बारादरी महाराजा का विश्राम स्थल हुआ करता था जो कि वास्तव में उनकी 200  पैदल सैनिकों का और तोपखाने का ठिकाना हुआ करता था जो कि एक अहम छावनी भी माना जाता था, महाराजा के मृत्यु के बाद लाहौर महल की प्रशासन का मुख्य दरबार बन गया, और बारादरी महल की देख रेख में कमी होले लगी।

कई बार हुए हमलो के कारण धीरे धीरे इसकी इमारत जर्जर होने लगी थी। हालांकि 2010 में इसे  आधिकारिक तौर पर एक संरक्षित संरचना घोषित की गई है, यानि की इसकी सुरक्षा की जानी अनिवार्य है। फिलहाल बारादरी की स्थिति के कारण ये पर्यटन स्थल नहीं है, लेकिन इसकी सुरक्षा को लेकर भी लापरवाही बरती जा रही है। जिसे लेकर सोशल मीडिया और स्थानीय लोगो ने इस इमारत की सुरक्षा के लिए सरकार से अपील की है। उन्होंने अपील की कि ये धरोहर सिखों के लिए बहुत अहम है, इन इमारतों को भले ही “संरक्षित” का दर्जा तो दे दिया लेकिन उसका वाकई में कोई अर्थ तो हो, इसकी सुरक्षा के लिए सुरक्षाकर्मी लगाये जाये, ताकि कोई इतिहास के साथ खिलवाड़ न करें। बाड़ लगाई जाये ताकि को यूही इसमें प्रवेश न करें,  नियमित सफाईकर्मी  यहां काम करें। ये इतिहास की वो धरोहर है जो एक बार नष्ट हो गई तो दुबारा सहेजी नहीं जा सकेंगी.. और इतिहास हमेशा के लिए खो जायेगा।

हालांकि एक समय ऐसा भी आया था जब महल और उससे लगी जमीन पर अतिक्रमण करने का प्रयास किया गया था लेकिन विरासत प्रेमियो की शिकायत के बाद गुरदासपुर पुलिस ने सख्ती दिखाई थी और काम रोक दिया गया था, जिसके बाद  2016 में सरकार ने इसके जीर्णोद्धार के लिए 1 करोड़ लाख रुपये का टेंडर जारी किया था, लेकिन दुख की बात है कि किसी बात को लेकर ठेकेदारों और अधिकारियों में मतभेद हो गया और बारादरी के जीर्णोद्धार का कार्य कभी शुरु ही नहीं हो सका।

बटाला विरासत मंच के अध्यक्ष बलदेव सिंह रंधावा ने इस बात का दुख जताया कि आज की युवा पीढ़ी को हमारी ऐतिहासिक धरोहर की पड़ी ही नहीं है.. केवल कुछ पन्नों में इतिहास पढ़ा दिया जाता है और बच्चे उसे जानने और समझने के बजाय पढ़ कर भूल जाते है। जब उन्हें हमारी संस्कृति और हमारी धरोहरो को लेकर कोई जानकारी ही नहीं होगी तो भला वो उसकी सुरक्षा के बारे में क्यों ही सोचेंगे। इसलिए जरूरी है कि हमारे महान इतिहास और महाराजा राणजीत सिंह जी के इतिहास को विस्तारपूर्वक पढ़ाया जाये, बताया जाये, ताकि खुद युवा पीढ़ी हमारी ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित करने के लिए प्रेरित हो। अगर युवा पीढ़ी चाहे तो धरोहरो के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होगी। हमारी ऐतिहासिक धरोहर .युवाओं के हाथों में है.. आने वाले भविष्य में उनकी कितनी सुरक्षा होगी.. उससे पर ही निर्भर करता है कि हमारे आज के बच्चों को हमारे इतिहास के बारे में कितना सच और कितना झूठ पता होगा। वैसे आप इस बात से कितने सहमत है और बारादरी को सुरक्षित करने के लिए क्या क्या ठोस कदम उठाने की जरूरत है। क्या वाकई में सरकार सिखो की विरासत को अनदेखी कर रही है।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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