Mp Devendra Singh Dispute: “मुझसे बड़ा गुंडा कोई नहीं”… हाथापाई पर उतरे BJP सांसद और पूर्व सांसद; जानें अंदरूनी जंग की पूरी कहानी

👤 vickynedrick@gmail.com | Nedrick News 🕒 Published: 05 नवम्बर 2025, 12:00 AM 🔄 Updated: 05 नवम्बर 2025, 12:00 AM
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Mp Devendra Singh Dispute: उत्तर प्रदेश का कानपुर देहात जिला इन दिनों किसी राजनीतिक रैली से नहीं, बल्कि सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के दो नेताओं की भिड़ंत से सुर्खियों में है। मौजूदा सांसद देवेंद्र सिंह भोले और पूर्व सांसद अनिल शुक्ला वारसी के बीच दिशा (जिला विकास समन्वय एवं निगरानी समिति) बैठक के दौरान ऐसा बवाल मचा कि मामला हाथापाई तक पहुंच गया। अफसरों के सामने दोनों नेताओं ने एक-दूसरे पर आरोपों की बौछार कर दी। किसी तरह डीएम कपिल सिंह और एसपी श्रद्धा नरेंद्र पांडेय ने बीच-बचाव कर माहौल शांत कराया।

जानकारी के मुताबिक, झगड़े की शुरुआत अवैध खनन और फैक्ट्री जांच से जुड़ी बहस से हुई, लेकिन बात जल्द ही निजी आरोपों तक जा पहुंची। भाजपा के इन दोनों बड़े नेताओं के बीच टकराव नया नहीं है — यह विवाद महीनों से धीरे-धीरे सुलग रहा था।

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जुलाई की घटना से शुरू हुआ था तनाव- Mp Devendra Singh Dispute

दरअसल, पूर्व सांसद अनिल शुक्ला वारसी की पत्नी प्रतिभा शुक्ला प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री हैं। 24 जुलाई को अकबरपुर नगर पंचायत के एक सभासद ने प्रतिभा शुक्ला के समर्थक पर मारपीट का आरोप लगाया था। इस पर कार्रवाई न होने के विरोध में प्रतिभा शुक्ला खुद धरने पर बैठ गईं। उस समय भी अनिल वारसी ने नगर पंचायत अध्यक्ष और सांसद भोले पर पक्षपात का आरोप लगाया था। तभी से दोनों के रिश्ते बिगड़ गए थे और मंगलवार की बैठक में यह टकराव खुलकर सामने आ गया।

बैठक में वारसी और भोले अपने-अपने समर्थकों के साथ पहुंचे थे। देवेंद्र भोले ने वारसी से कहा कि जुलाई की घटना पर उन्होंने जो फोन किया था, वह अब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व— अमित शाह और जेपी नड्डा— के सामने रखा जाएगा। इस पर वारसी ने पलटकर कहा कि फोन उन्होंने विवाद सुलझाने के लिए किया था, न कि बढ़ाने के लिए। बस फिर क्या था, दोनों के बीच तीखी बहस शुरू हो गई।

“मुझसे बड़ा गुंडा कोई नहीं” – सांसद भोले

मामला तब और बिगड़ गया जब वारसी ने खुद को “गुंडा” कहे जाने पर विरोध जताया। इस पर सांसद देवेंद्र भोले भड़क गए और बोले,

“मुझसे बड़ा गुंडा कोई नहीं है। मैं कानपुर देहात का सबसे बड़ा हिस्ट्रीशीटर हूं। पुलिस ने मेरे खिलाफ कई मुकदमे लिखे, पर सारे गलत निकले, इसलिए खत्म हो गए।”

इस बयान ने वहां मौजूद लोगों को हैरान कर दिया। भोले के समर्थक भी आक्रामक हो गए और माहौल तनावपूर्ण बन गया। वारसी लगातार कहते रहे — “मुझे मारोगे क्या? मार डालोगे क्या?” अंततः अफसरों के दखल के बाद मामला किसी तरह शांत हुआ, लेकिन बैठक स्थगित करनी पड़ी।

अखिलेश यादव का तंज — “पूर्व के हाथ में कटोरा, वर्तमान के हिस्से मलाई”

इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही विपक्ष को बड़ा मुद्दा मिल गया। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अपने X (पूर्व ट्विटर) अकाउंट पर वीडियो शेयर करते हुए लिखा —

“पूर्व के हाथ में कटोरा, वर्तमान के हिस्से मलाई है। ये झगड़ा और कुछ नहीं, बस बंटवारे की लड़ाई है। भाजपा जाए तो विकास आए।”

सपा मीडिया सेल ने भी भाजपा पर निशाना साधते हुए लिखा कि “यही है भाजपा का असली चरित्र — लात-घूंसे, गालियां और मंच पर जूतम-पैजार।”

भोले और वारसी — अलग रास्ते, एक मंच पर टकराव

देवेंद्र सिंह भोले अकबरपुर लोकसभा सीट से लगातार तीसरी बार बीजेपी सांसद हैं। 2014 में पहली बार टिकट मिलने के बाद उन्होंने 2019 और 2024 में भी जीत दर्ज की। पार्टी के पुराने चेहरों में गिने जाने वाले भोले की इलाके में मजबूत पकड़ मानी जाती है।

वहीं, अनिल शुक्ला वारसी की राजनीतिक यात्रा काफी दिलचस्प रही है। वे 2007 में बसपा के टिकट पर बिल्हौर उपचुनाव से सांसद बने थे। 2014 में उन्होंने अकबरपुर से बसपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा, लेकिन भोले से हार गए। बाद में 2015 में वारसी बीजेपी में शामिल हो गए। इससे पहले वे सपा से भी जुड़े रहे थे। उनकी पत्नी प्रतिभा शुक्ला दो बार से बीजेपी विधायक हैं और योगी सरकार में राज्य मंत्री हैं।

जातिगत राजनीति की गर्मी और प्रशासन की खामोशी

इस विवाद ने न केवल पार्टी में खींचतान को उजागर किया है, बल्कि जिले में जातिगत राजनीति को भी फिर से हवा दी है। सत्तारूढ़ दल के दो बड़े चेहरों के आमने-सामने आने से प्रशासन पूरी तरह असहज दिखा। अधिकारी पूरे घटनाक्रम में मूकदर्शक बने रहे क्योंकि मामला सीधे सत्ता से जुड़ा था।

कानपुर देहात की यह “बीजेपी बनाम बीजेपी” लड़ाई अब केवल जिले तक सीमित नहीं रही। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि यह विवाद अब लखनऊ से लेकर दिल्ली तक पहुंचेगा।

फिलहाल, दिशा बैठक तो रद्द कर दी गई, लेकिन इस टकराव ने यह साफ कर दिया है कि बीजेपी के भीतर भी सबकुछ उतना शांत नहीं है जितना दिखाया जाता है। पार्टी नेतृत्व के लिए यह घटना केवल शर्मिंदगी नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों से पहले एक बड़ी चेतावनी भी है।

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