BRICS summit 2026: नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के सबसे चर्चित और ताकतवर पलों में एक चेहरा लगातार कैमरे की नजरों में बना रहा। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ गर्मजोशी से मुलाकात कर रहे थे या चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ गंभीर मुद्दों पर विमर्श चल रहा था, ठीक उसी वक्त एक युवा भारतीय राजनयिक बिल्कुल साए की तरह उनके साथ खड़ा दिखाई दिया। पुतिन और पीएम मोदी के ठीक बीच में खड़े होकर हर एक शब्द को गहराई से सुनते इस शख्स की तस्वीरें जैसे ही सोशल मीडिया पर सामने आईं, हर तरफ यह चर्चा शुरू हो गई कि दुनिया के सबसे ताकतवर नेताओं के बीच खड़ा यह युवा अधिकारी आखिर कौन है।
यह शख्स हैं केरल के कोच्चि के रहने वाले सिद्धार्थ बाबू, जो 2017 बैच के बेहद होनहार भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) अधिकारी हैं। मौजूदा समय में विदेश मंत्रालय के यूरोप और यूरेशिया डिवीजन में उप सचिव (डिप्टी सेक्रेटरी) के पद पर तैनात सिद्धार्थ बाबू ने इस ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी के आधिकारिक ‘डिप्लोमैटिक इंटरप्रेटर’ (राजनयिक अनुवादक) की बेहद अहम और नाजुक जिम्मेदारी निभाई।
जब एक गलत शब्द बिगाड़ सकता है कूटनीति का खेल| BRICS summit 2026
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दुनिया में इंटरप्रेटर सिर्फ भाषा का अनुवाद करने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह दो महाशक्तियों के बीच भरोसे का सबसे मजबूत पुल माना जाता है। खासकर रूस और चीन जैसे देशों के शीर्ष नेतृत्व के साथ बंद कमरे में होने वाली मुलाकातों में बातचीत का टोन, तेवर और शब्दों का सटीक चयन सबसे बड़ा मायने रखता है। ऐसे स्तर पर एक गलत शब्द या टोन का हल्का सा हेर-फेर भी पूरे वैश्विक समीकरण को प्रभावित कर सकता है।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जैसे सख्त और मंझे हुए नेता की जटिल राजनयिक भाषा और उनके हाव-भाव को उसी मिजाज में पकड़कर तुरंत प्रधानमंत्री तक पहुंचाना बेहद दबाव भरा काम होता है। सिद्धार्थ बाबू ने इस नाजुक जिम्मेदारी को बिना किसी झिझक के बखूबी निभाया। यूरोप और यूरेशिया डेस्क का प्रभार संभालने के कारण उन्हें इस पूरे क्षेत्र के राजनीतिक दांव-पेंच और कूटनीतिक नब्ज की गहरी जमीनी समझ है, जिसका बड़ा फायदा इन द्विपक्षीय वार्ताओं के दौरान देखने को मिला।
इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ बने कूटनीति के माहिर
कोच्चि से लेकर दिल्ली के साउथ ब्लॉक तक का सिद्धार्थ बाबू का सफर बेहद दिलचस्प और प्रेरणादायक रहा है। उन्होंने अपनी पढ़ाई मैकेनिकल इंजीनियरिंग से पूरी की थी और शुरुआत में प्राइवेट सेक्टर व ई-कॉमर्स कंपनियों में काम किया। हालांकि, उनका मन कूटनीति और देश सेवा की तरफ था।
उन्होंने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2016 में शानदार प्रदर्शन करते हुए पूरे देश में 15वीं रैंक (AIR 15) हासिल की। इस शानदार रैंक के दम पर वे आसानी से भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) चुन सकते थे, लेकिन अंतरराष्ट्रीय संबंधों और विदेशी मामलों के प्रति उनके गहरे लगाव ने उन्हें भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) चुनने के लिए प्रेरित किया।
अपनी विदेश सेवा की ट्रेनिंग के दौरान उन्होंने विदेशी भाषाओं पर जबर्दस्त पकड़ बनाई, जो आज उनके राजनयिक करियर में सबसे बड़ा हथियार साबित हो रही है। सिद्धार्थ बाबू इससे पहले भी कई बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। इस साल गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान भी वे विदेशी मेहमानों के साथ प्रधानमंत्री की उच्चस्तरीय बातचीत में सहयोग करते हुए नजर आए थे। ब्रिक्स के मंच पर जब दुनिया की दिशा तय हो रही थी, तब कोच्चि के इस युवा अफसर ने अपनी सधी हुई कार्यशैली से हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।












































