BRICS Summit 2026: वैश्विक मंच पर जारी भारी उथल-पुथल, युद्ध और आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। कई लोगों को लग रहा था कि यह बैठक महज औपचारिक मुलाकातों और फोटो खिंचवाने तक सिमट कर रह जाएगी, लेकिन कूटनीति में सबसे अहम संदेश होता है। दुनिया के बदलते हालात के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का दिल्ली आना और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का सात साल बाद भारत की धरती पर कदम रखना यह साबित करता है कि मौजूदा वक्त में भारत की भूमिका कितनी निर्णायक हो चुकी है।
भारत मंडपम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक तरफ पुतिन और दूसरी तरफ जिनपिंग का एक साथ चलना और पौधारोपण करना न सिर्फ आत्मविश्वास की बड़ी तस्वीर पेश करता है, बल्कि पश्चिमी देशों और खासकर अमेरिकी नेतृत्व की उन पुरानी धारणाओं को भी करारा जवाब देता है जो भारत की स्वतंत्र कूटनीति पर सवाल उठा रहे थे।
ग्लोबल साउथ को ‘रूल-टेकर’ से ‘रूल-शेपर’ बनाने का आह्वान| BRICS Summit 2026
सम्मेलन की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री ने दुनिया को साफ संदेश दिया कि वर्ल्ड ऑर्डर को अब उभरती अर्थव्यवस्थाओं और ग्लोबल साउथ की जरूरतों के मुताबिक बदलना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रिक्स किसी के खिलाफ कोई गुटबाजी करने वाला मंच नहीं है, बल्कि यह सबको साथ लेकर चलने की सोच रखता है। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि आज ग्लोबल साउथ संकटों की सबसे अगली कतार में है, लेकिन जब वैश्विक फैसले लेने की बारी आती है तो उसे पिछली कतार में धकेल दिया जाता है। इस व्यवस्था को बदलकर साझेदारी का मंच बनाना होगा।
इसके साथ ही, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार की मांग को मजबूती से उठाया गया। सम्मेलन के साझा घोषणापत्र में साफ कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में सुधारों को अब और टाला नहीं जा सकता। इसमें स्थायी सदस्य के रूप में भारत और ब्राजील की बड़ी भूमिका का खुलकर समर्थन किया गया। साथ ही अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में विकासशील देशों की वोटिंग पावर और नेतृत्व के पदों को आज की आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप ढालने की बात कही गई।
बिना नाम लिए अमेरिकी टैरिफ और प्रतिबंधों पर प्रहार
नई दिल्ली घोषणापत्र में किसी देश का सीधा नाम लिए बिना एकतरफा टैरिफ और व्यापारिक बाधाओं पर गहरी चिंता जताई गई। घोषणापत्र में साफ कहा गया कि ऐसी नीतियां वैश्विक व्यापार को विकृत करती हैं और अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों के अनुकूल नहीं हैं। इसके अलावा, एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों को अंतरराष्ट्रीय चार्टर के खिलाफ बताते हुए खारिज किया गया।
डॉलर के दबदबे के बीच ब्रिक्स देशों ने आपसी व्यापार में स्थानीय मुद्राओं (Local Currencies) के इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर बड़ा कदम उठाया है। इसके लिए एक विशेष ‘पेमेंट टास्क फोर्स’ बनाने पर सहमति बनी है, ताकि सदस्य देशों के बीच सीमा पार भुगतान तेज, सुरक्षित और कम लागत में संभव हो सके।
पश्चिमी देशों के मंचों से कहीं भारी पड़े ब्रिक्स के आंकड़े
रूसी राष्ट्रपति ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में ब्रिक्स की 40 प्रतिशत से अधिक भागीदारी का हवाला देते हुए पश्चिमी विकसित देशों के घटते आर्थिक दबदबे की ओर इशारा किया, जबकि शी जिनपिंग ने भी इसे उभरते बाजारों का सबसे ताकतवर मंच बताया। अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो ब्रिक्स समूह दुनिया की कुल आबादी के 400 करोड़ लोगों, वैश्विक विनिर्माण के 40 प्रतिशत, तेल-गैस उत्पादन के 43 प्रतिशत और कोयले के 78 प्रतिशत हिस्से पर नियंत्रण रखता है। इसके अलावा दुनिया के 90 प्रतिशत से ज्यादा रेयर अर्थ मैटेरियल्स पर ब्रिक्स देशों की पकड़ है, जिससे यह मंच वैश्विक सप्लाई चेन की रीढ़ बन चुका है।
रात 4 बजे तक चली मैराथन बैठक और भारत की मध्यस्थता
जब ब्रिक्स की शुरुआत हुई थी तब इसमें सिर्फ 4-5 देश थे, लेकिन आज 11 पूर्ण सदस्यों और पार्टनर देशों को मिलाकर इसका दायरा 21 देशों तक पहुंच चुका है। पश्चिम एशिया में जारी भारी तनाव के बीच ईरान, यूएई और सऊदी अरब जैसे देशों को एक मेज पर लाना बेहद जटिल चुनौती थी। घोषणापत्र पर सहमति बनाने के लिए रात 4 बजे तक राजनयिक स्तर पर मैराथन बैठकें चलीं।
भारत की संतुलित मध्यस्थता का ही नतीजा था कि यूएई के शीर्ष नेतृत्व और ईरानी राष्ट्रपति के बीच दिल्ली में द्विपक्षीय बातचीत हुई और दोनों ने क्षेत्र में तनाव कम करने पर सहमति जताई। तमाम विवादों और अलग-अलग विचारों के बावजूद बिना किसी आपत्ति के साझा घोषणापत्र जारी होना भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक कामयाबी मानी जा रही है।
आतंकवाद पर चीन के सामने पाकिस्तान को झटका
नई दिल्ली घोषणापत्र में सीमा पार आतंकवाद, आतंकियों की फंडिंग और उनको सुरक्षित पनाहगाह देने के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया गया। घोषणापत्र में पहलगाम आतंकी हमले और उसमें मारे गए 26 लोगों का स्पष्ट उल्लेख करते हुए आतंकवाद की कड़े शब्दों में निंदा की गई। आतंक के मुद्दे पर किसी भी तरह के दोहरे मापदंड को पूरी तरह खारिज कर दिया गया, जिससे चीन की मौजूदगी के बावजूद पाकिस्तान को कड़ा संदेश गया। गौरतलब है कि पाकिस्तान ने ब्रिक्स की सदस्यता के लिए आवेदन किया था, लेकिन भारत के कड़े विरोध के चलते उसे इस प्रभावशाली मंच में एंट्री नहीं मिल सकी है।
मोदी-जिनपिंग बैठक: रिश्तों के लिए दिया ‘3-M’ फॉर्मूला
सम्मेलन के पहले दिन के सत्र के बाद प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच करीब 45 मिनट तक द्विपक्षीय वार्ता हुई। प्रधानमंत्री ने ब्रिक्स की भारतीय अध्यक्षता के दौरान मिले सहयोग के लिए धन्यवाद देते हुए रिश्तों को सुधारने के लिए ‘3-M’ का फॉर्मूला दिया—आपसी सम्मान (Mutual Respect), आपसी संवेदनशीलता (Mutual Sensitivity) और आपसी हित (Mutual Interest)। दोनों नेताओं ने सीमा पर शांति बनाए रखने, मतभेदों को विवाद न बनने देने और व्यापार असंतुलन को दूर करने के लिए निष्पक्ष व तर्कसंगत समाधान निकालने पर सहमति जताई। शी जिनपिंग ने भी दोनों देशों के दीर्घकालिक रणनीतिक संबंधों और बहुध्रुवीय विश्व में एक-दूसरे के सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया।












































