विदेश में ब्रांड की क्वालिटी बढ़िया लेकिन भारतीयों के साथ धोखा क्यों! | Brand Fraud

Rajni | Nedrick News India Published: 25 अगस्त 2026, 11:29 PM Updated: 25 अगस्त 2026, 11:29 PM
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Brand Fraud: क्या आप जानते हैं कि जिस इंटरनेशनल ब्रांड की चॉकलेट, नूडल्स या कोल्ड ड्रिंक आप बड़े चाव से खा रहे हैं, वह भारत में सेहत के लिए नुकसानदेह और विदेशों में बहुत बेहतर क्वालिटी की है? जी हाँ! वही ब्रांड, वही पैकेट, लेकिन भारत में घटिया क्वालिटी और विदेश में प्रीमियम! आखिर ये मल्टीनेशनल कंपनियाँ हमारे स्वास्थ्य के साथ ऐसा दोहरा खेल क्यों खेल रही हैं? तो चलिए इस लेख के जरिए इसके पीछे का पूरा सच जानते हैं।

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मल्टीनेशनल कंपनियाँ (MNCs) भारत को एक तरह से डंपिंग ग्राउंड समझ रही हैं। हालिया रिपोर्ट्स ने साफ खुलासा किया है कि भारत में बिकने वाले लोकप्रिय पैकेज्ड फूड्स में बेहद घटिया और सस्ते इंग्रिडिएंट्स का इस्तेमाल हो रहा है, जबकि उन्हीं ब्रांड्स के यूरोपीय वर्जन्स काफी हेल्दी और प्रीमियम हैं।

इस पूरे खेल को हम कोल्ड ड्रिंक के एक आसान उदाहरण से समझ सकते हैं। इसमें मुख्य रूप से दो बड़े खेल चल रहे हैं: पहला—चीनी की भारी मात्रा, और दूसरा—हानिकारक केमिकल्स का इस्तेमाल।

चीनी का मीठा खेल और छुपा हुआ लेबल

लंदन में बिकने वाली Fanta के एक कैन में करीब 63 कैलोरी होती है। लेकिन वही ब्रांड अगर आप भारत में खरीदेंगे, तो उसमें आपको करीब तीन गुना ज्यादा चीनी मिलेगी! सिर्फ चीनी ही नहीं, भारत वाली फैंटा में एक आर्टिफिशियल रंग भी होता है। यूरोप में इस रंग के इस्तेमाल पर पैकेट के सामने साफ चेतावनी लिखनी पड़ती है। मगर भारत में यही बात कैन के पीछे इतने छोटे अक्षरों में दर्ज रहती है, जहां आम खरीदार की नजर कभी जाती ही नहीं।

दिलचस्प बात यह है कि जो कंपनियां भारत में ऐसे हेल्थ लेबल का विरोध करती रही हैं, वही यूरोप के करीब दो दर्जन बाजारों में अपनी ड्रिंक्स पर ‘ट्रैफिक लाइट’ (कलर-कोडेड) जैसे लेबल खुद लगाती हैं और वहां इसे अपनी पारदर्शिता बताती हैं! ऐसा इसलिए, क्योंकि यूके और यूरोप में सख्त नियम और ‘शुगर टैक्स’ हैं, जिनसे बचने के लिए उन्हें वहां चीनी कम करनी पड़ी। लेकिन भारत में ऐसा कोई कड़ा कानून नहीं है, इसलिए यहां धड़ल्ले से ज्यादा चीनी और केमिकल घोला जा रहा है।

कैंसर पैदा करने वाला केमिकल (Brand Fraud)

चीनी के बाद अब बात करते हैं उस गहरे काले या ब्राउन रंग की, जो आपको Coca-Cola या थम्स-अप जैसी कोल्ड ड्रिंक्स में दिखता है। कोल्ड ड्रिंक को यह गहरा रंग देने के लिए ‘कैरामेल कलर’ का इस्तेमाल होता है। इसे बनाने की प्रक्रिया में 4-MEI (4-Methylimidazole) नाम का एक बाय-प्रोडक्ट (केमिकल) बनता है, जिसे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा कैंसरकारी (Carcinogenic) माना गया है।

अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया राज्य में नियम बेहद कड़ा है। अगर किसी ड्रिंक में 4-MEI एक तय सीमा (29 माइक्रोग्राम) से ज्यादा होगा, तो कंपनी को बोतल पर बड़े अक्षरों में ‘कैंसर की चेतावनी’ लिखनी पड़ेगी। इस बदनामी से बचने के लिए कोका-कोला ने तुरंत अमेरिका में अपना फॉर्मूला बदल दिया और केमिकल की मात्रा को सुरक्षित स्तर पर ले आए।

भारत में ऐसा कोई कड़ा कानून या सीमा तय नहीं है। नतीजा? रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में बेची जाने वाली कोका-कोला में इस खतरनाक केमिकल (4-MEI) की मात्रा अमेरिका के मुकाबले कई गुना ज्यादा पाई गई है। यानी अमेरिकी नागरिकों को जिस खतरे से बचाया जा रहा है, वही खतरा भारतीय ग्राहकों को धड़ल्ले से परोसा जा रहा है।

असली फल का रस गायब (Real Fruit Juice)

यूरोप और यूके में बिकने वाली Fanta में लगभग 8% से 12% तक असली संतरे का रस मिलाया जाता है। वहीं भारत में बिकने वाली फैंटा में असली फल का रस नाममात्र (1% से भी कम) या बिल्कुल नहीं होता। यहाँ आपको सिर्फ पानी, चीनी, सिंथेटिक कलर और आर्टिफिशियल फ्लेवर का कॉकटेल थमा दिया जाता है।

चॉकलेट का सच (Brand Fraud)

कोल्ड ड्रिंक के बाद अब बात करते हैं बच्चों और बड़ों की सबसे पसंदीदा चीज़ यानी चॉकलेट की। जिस चॉकलेट को हम बड़े चाव से खाते हैं, उसके भारतीय और विदेशी वर्जन में ज़मीन-आसमान का अंतर है। भारत में बिकने वाले आम KitKat में कोको सॉलिड (असली कोको) करीब साढ़े चार फीसदी (4.5%) ही होता है।

वहीं ऑस्ट्रेलिया में बिकने वाले किटकैट की मिल्क चॉकलेट में कम से कम 22 फीसदी (22%) कोको होता है! यानी जिस मुख्य चीज़ (कोको) के लिए लोग चॉकलेट खरीदते हैं, भारतीय वर्जन में वही सबसे कम है। बाकी का पूरा हिस्सा चीनी, दूध का पाउडर और सस्ते वेजिटेबल फैट (जैसे पाम ऑयल) से भर दिया जाता है।

मैगी (Maggi) का खेल-फैक्ट्री एक, नियम दो!

सबसे ज्यादा उलझा हुआ और हैरान करने वाला मामला तो मैगी का है, जो भारत के लगभग हर घर में खाई जाती है। भारत में बिकने वाली मैगी के सभी वेरिएंट सस्ते पाम ऑयल (Palm Oil) से बनते हैं, जो दिल की सेहत के लिए अच्छा नहीं माना जाता। वहीं, ब्रिटेन (UK) में बिकने वाले कई वर्जन में उससे महंगा और बेहतर सनफ्लावर ऑयल (Sunflower Oil) इस्तेमाल होता है।

सबसे बड़ी बात यह है कि ब्रिटेन में बिकने वाले कई मैगी पैकेट बनते भारत की ही फैक्ट्रियों में हैं! लेकिन ब्रिटेन जाने वाले उन पैकेटों पर सामने की तरफ लाल निशान (Red Warning Label) लगा होता है, जो वहां के ग्राहकों को बताता है कि इसमें नमक ज्यादा है। वही पैकेट भारत के बाजारों में बिना किसी लाल निशान या चेतावनी के बिकता है। यानी फैक्ट्री एक, प्रोडक्ट लगभग एक, फर्क सिर्फ देश के कड़े नियमों का है!

बच्चों के स्वास्थ्य में 50 साल का फर्क!

कंपनियों का यह दोहरा रवैया सिर्फ बड़ों तक सीमित नहीं है, यह हमारे मासूम बच्चों के खाने तक पहुंच चुका है। नेस्ले (Nestle) कंपनी ने साल 2024 में जाकर यह ऐलान किया कि वह भारत में बिना चीनी वाला सेरेलैक बेबी फूड बेचना शुरू करेगी। इससे पहले करीब पचास साल तक भारत में सिर्फ एडेड शुगर (अतिरिक्त चीनी) वाला वर्जन ही बिकता रहा,

जबकि ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस जैसे कई दूसरे देशों में बिना चीनी वाला हेल्दी वर्जन सालों पहले से मौजूद था। यह बदलाव कंपनी ने खुद से नहीं किया। यह तब हुआ जब स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, इंटरनेशनल रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों ने लगातार इस पर सवाल उठाए और कंपनी की ग्लोबल बेइज्जती हुई।

कंपनियाँ का तर्क (Brand Fraud)

जब इन मल्टीनेशनल कंपनियों से इस दोहरे रवैये पर सवाल पूछा जाता है, तो उनका तर्क बेहद सीधा होता है, कंपनियों का कहना है कि हर देश में लोगों का स्वाद अलग है और उनकी खर्च करने की क्षमता (Purchasing Power) अलग है, इसलिए रेसिपी बदलनी पड़ती है। इंडस्ट्री के एक्सपर्ट्स भी मानते हैं कि रेसिपी में इतने बड़े अंतर की सबसे बड़ी वजह कीमत है।

भारत में 5, 10 या 20 का सस्ता प्रोडक्ट बेचने के लिए कंपनियों को पाम ऑयल जैसी सस्ती कच्ची सामग्री (Raw Material) का इस्तेमाल करना ही पड़ता है। लेकिन सवाल यहीं से शुरू होता है— सस्ता बनाना एक बात है, मगर सेहत से जुड़ी जानकारी छिपाना दूसरी बात है! अगर वही कंपनी ब्रिटेन के पैकेट पर सामने की तरफ ‘लाल निशान’ लगा सकती है, तो भारत के पैकेट पर वही चेतावनी देने में उन्हें क्या तकलीफ है?

भारत में खेल कहाँ अटका है?

दुनिया के करीब 20 देशों में पैकेट के बिल्कुल सामने ही ‘लाल और हरे निशान’ (Front-of-Pack Labeling) लगते हैं, ताकि ग्राहक एक नजर में समझ जाए कि इस फूड में चीनी, नमक या फैट ज्यादा है। भारत में भी यह बहस साल 2017 से चल रही है, जब पैकेट के आगे रंगीन चेतावनी और स्टार रेटिंग देने का प्रस्ताव आया था। लेकिन जमीनी हकीकत आज भी वही है—कंपनियों को सिर्फ पीछे बारीक अक्षरों में ही जानकारी देनी होती है।

हैरानी की बात यह है कि पिछले साल अगस्त में भारत के फूड रेगुलेटर FSSAI ने पैकेट के सामने रंगीन (कलर-कोडेड) चेतावनी लगाने का इरादा पूरी तरह छोड़ दिया। FSSAI का तर्क था कि ऐसे रंगीन लेबल इस बात का ध्यान नहीं रखते कि भारतीय खाने का स्वाद पश्चिमी देशों से ज्यादा तेज (मसालेदार/नमकीन) होता है। इसकी जगह रेगुलेटर ने एक साधारण ‘काले और सफेद टेबल’ (Black & White Table) का सुझाव दिया, जिसमें चीनी, फैट और नमक की मात्रा लिखी होगी।

अदालत की सख्त फटकार

इस पूरे खेल के खिलाफ देश के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (Health Activists) ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसके बाद यह मामला देश की सबसे बड़ी अदालत के सामने पहुंचा। सुनवाई के दौरान अदालत ने रेगुलेटर (FSSAI) से कहा था कि वह पैकेट के सामने दी जाने वाली चेतावनी वाले लेबल पर गंभीरता से विचार करे। कोर्ट ने FSSAI को इजरायल जैसे देशों में चल रहे ‘लाल और हरे निशान’ वाले सख्त सिस्टम का अध्ययन करने की सलाह भी दी थी।

जब अगस्त में रेगुलेटर ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि भारतीय पैकेजिंग को अंतरराष्ट्रीय मानकों (International Standards) जैसा बनाना मुश्किल है, तो जजों ने इस पर कड़ी नाराजगी जताई। माननीय जजों ने साफ शब्दों में कहा कि पूरी दुनिया को यह संदेश जाना चाहिए कि भारत अपने नागरिकों की सेहत को लेकर बेहद गंभीर है।

Rajni

rajni@nedricknews.com

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