Punjabi historical films: वैसे तो बंटवारा कई देशों के बीच हुआ होगा, लेकिन बंटवारे का दर्द जो 1947 में पंजाब के करोड़ों लोगों ने झेला वो आज भी पंजाब के हिंदू मुसलमानों और सिखों के दिलो में ज्यों के त्यों ही जिंदा है। चंद लोगो के लालच ने एक देश को दो टुकड़ो में बांटा… लेकिन ये बंटवारा कितनी बड़ी त्रासदी लाने वाली है इसका अंदाजा शायद उन लालची लोगों को भी नहीं था.. लेकिन पंजाब का दर्द यहीं नहीं रूका.. उससे पहले भी पंजाब में ऐसी विभत्स घटनायें हुई, जिसने वहां के लोगो के हौसलो को तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन फिर भी वो फिर से खड़े हुए, और मजबूत भी..कैसे एक राज्य अर्श से फर्श पर और फिर से फर्श से अर्श पर पहुंचा उससे समझने में हमारी फिल्में अहम भूमिका निभाती है.. अपनी इस में हम आपको 5 ऐसी ही फिल्मों के बारे बतायेंगे.. जो पंजाब की उस इतिहास, त्रासदी की गाथा को बयान करते है, जिसे कभी पंजाब के लोगो ने झेला था।
जलियांवाला बाग – Jallianwala Bagh
1977- 13 अप्रैल 1919 की तारीख को भला कौन भूल सकता है, न केवल पंजाब बल्कि हर एक भारतीय के लिए वो जख्म है ये तारिख.. जिसने ब्रिटिश हुकुमत की सिख हितैषी होने का मुखौटा खींच फेंका था। अमृतसर के जलियांवाला बाग में कैसे निहत्थे हजारों लोगो पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाई गई.. उस मार्मिक दृश्य को फिल्मों के जरिये 1977 में फिल्म जलियावाला बाग में दिखाया गया है। मशहूर लेखक, निर्देशक, बलराज ताह द्वारा लिखी इस फिल्म में विनोद खन्ना, शबाना आजमी, परिक्षित साहनी, और दीप्ती नवल जैसे मंझे हुए कलाकारों ने काम किया था। वहीं पंचम दा आर डी बर्मन ने संगीत से सजाया था.. ये फिल्म केवल जलियांवाला बाग नरसंहार तक ही सिमित नही थी बल्कि नरसंहार को अपनी आंखो देखने वाले सरदार शहीद उधम सिंह की एक छोटी सी बायोपिक भी दिखाई गई, जिसमें उन्होंने इस हत्याकांड का बदला लेने की कसम खाई थी औऱ करीब 21 सालो के बाद उन्होंने 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में 1919 के तत्कालीन पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’डायर को गोली मारकर बदला लिया था, जिसके कारण उधम सिंह को फांसी दे दी गई थी। ये फिल्म पंजाब की मार्मिक स्थिति को बखूबी दर्शाती है।
माचिस 1996 – Maachis 1996
1980 का दौर पंजाब के बेहद की भयावाह औऱ क्रूर था.. राजनीतिक उथलपुथल, फैलता उग्रवाद औऱ इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पंजाब के बिगड़े हालातों को गीतकार औऱ निर्देशक गुलजार साहब ने 1996 में पर्दे पर उतारा था, फिल्म में तबू, चंद्रचूड़ सिंह, जिमी शेरगिल, ओम पुरी औऱ राज जुत्सी जैसे बेहतरीन कलाकारों ने अपनी अदाकारी से पंजाब की उस स्थिति को दुनिया के सामने लाने में सफलता हासिल की थी, जब राजनीति अस्थिरता और पुलिस की बर्बरता की चरम पर थी। और उनके अत्याचारों से तंग आकर सीधे साधे युवा भी हथियार उठाने पर मजबूर हो गए थे। फिल्म में तबू ने वीरां का रोल प्ले किया था जिनकी अदाकारी के लिए पहली बार उन्हें नेशनल अवार्ड जीता थाष। विशाल भारद्वाज का संगीत और बेहतरीन गानो ने फिल्म को एक अलग लेवल पर पहुंचा दिया था।
23 मार्च 1931- शहीद 2002- हर साल 23 मार्च केवल एक ही घटना के लिए याद रखा जाता है.. 24 साल के एक युवा भगत सिंह और उनके दोस्तो राजगुरु, और सुखदेव ने कैसे ब्रिटिश हुकुमत की गुलामी सहने के बजाय उनके खिलाफ लड़ाई लड़ी और हंसते हंसते देश के लिए कुर्बान हो गए। शहीद भगत सिंह, शहीद सुखदेव औऱ शहीद राजगुरु के जीवनी पर बनी फिल्म 23 मार्च 1931- शहीद साल 2002 में रिलीज हुई थी। फिल्म में बॉबी देओल भगत सिंह के रोल में, सनी देओल चंद्र शेखर आजाद, ताशू कौशिक सुखदेव और राहुल देव राजगुरु के रोल में थे.. ये फिल्म देओल परिवार के विजेता फिल्मस के बैनर तले ही बनी थी, जिसें गुड्डु धनोआ ने निर्देशित किया था.. इस फिल्म के गाने काफी प्रचलित हुए थे।
पिंजर 2003 – Pinjar 2003
पंजाब की मशहूर लेखिका औऱ कवियत्री अमृता प्रीतम की फेमस नॉवल पिंजर पर बेस्ड फिल्म पिंजर साल 2003 में रिलिज हुई थी, जिसमें उर्मिला मारतोंडकर, मनोज बाजपेई, संजय सूरी, प्रियांशु चटर्जी जैसे बेहतरीन कलाकार थे.. ये फिल्म असल में भारत पाकिस्तान के बंटवारे से पहले की कैसे पंजाब में सब खुशी खुशी जी रहे होते है लेकिन बंटवारे के बाद कैसे उनकी जिंदगी त्रासदी में बदल गई.. बंटवारे के दौरान पंजाब में महिलाओ की स्थिति कितनी दयनीय थी.. वो कैसे कैसे दर्द से गुजर रही थी, पिंजर में उनकी व्यथा को दिखाने की बेहतरीन कोशिश की गई है। फिल्म को डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने डायेरेक्ट किया था तो वहीं उत्तम सिंह ने संगीत दिया था। पिंजर महिलाओ की उस वास्तविक स्थिति को दर्शाता है, जब महिलाओं को पिंजड़े से आजादी तो मिलती है लेकिन उनके पंख काट लिये जाते है।
चार साहिबजादे-द राइज ऑफ बंदा सिंह बहादुर- 2016
सिखो के दसवें गुरु गोबिंद सिंह के चारों बेटें, जिन्हें साहिबजादें कहा जाता है, उनके शहीद होने के बाद किस तरह से एक सन्यासी के योद्धा बने माधवदास, जो गुरु साहिब की शरण में आये और बंदा सिंह बहादुर कहलाये.. उन्होंने कैसे चारों साहिबजादों की शहादत का बदला सरहिंद के गर्वनर वजीर खान से लिया था। वजीर खान ने दोनो छोटे साहिबजादों को दीवार में जिंदा ही चुनवा दिया था। ये फिल्म 11 नवंबर 2016 को रीलिज हुई थी जो कि 3D कंप्यूटर-एनिमेटेड ऐतिहासिक फिल्म है… जिसका निर्देशन हैरी बवेजा ने किया था। फिल्म को ओमपुरी ने अपनी दमदार आवाज में नरेट किया है, वहीं रब्बी शेरगिल और भाई निर्मल सिंग खालसा ने संगीत दिया है। फिल्म बंदा सिंह बहादुर के उदय और उनके द्वारा किये गए क्रांतिकारी कार्यो को दर्शाती है। इसके अलावा आपको बता दें, ये वो फिल्में है जो हमेशा सदाबहार ही रहेगी.. जिन्होंने पंजाब की स्थिति को देखा है, जब पंजाब अपने सबसे बुरे दौर में था।














































