Mirza Sahiban folktale: बड़े बड़े कवि हो, शायर हो.. सभी कह गए है कि प्यार न तो मजहब देखता है और न जाति की दीवार.. ये तो बस एक आग की दरिया की तरह है, जब तक प्रेमी डुबेंगे नहीं पार नही लगने वाले.. लेकिन इस प्यार का अंजाम क्या होगा.. वो तो शायद किसी को पता नहीं.. मगर सबसे हैरानी की बात है कि जो सफल हुआ .. वो भुला दिये गए और जो अपने अधूरे प्यार के साथ कुर्बान हो गए.. उनकी ही प्रेम कहानी अमर हो गई.. पंजाब की 4 फेमस दर्दभरी प्रेम कहानियों में से एक है मिर्जा साहिबान की कहानी.. जहां प्यार को पाने की जिद में हर हद पार करने की दास्तां है तो वहीं.. परिवार के प्रति लगाव के कारण अपने आंखों के आगे प्यार को खो देने का गम भी… पंजाब की गलियों में मिर्जा साहिबां की दर्दभरी दास्ता आज भी पारंपरिक गानों में आप सुन सकते है.. अपने इस लेख में हम मिर्जा साहिबां की मर कर भी अमर होने वाली प्रेम कहानी के बारे में जानेंगे..
Mirza – Sahiban की अमर प्रेम कहानी
17 वी सदी में पंजाब के एक मशहूर कवि और नाटककार, पीलू की गायकी और नाटकों में पहली बार मिर्जा साहिबान के किस्से के बारे में बताया गया था। पंजाब की चार दुखद प्रेम कहानियों में से एक मिर्जा साहिबान की कहानी उस विश्वास की कहानी है जिसे लेकर कुछ लोग क्रिटिसाइज भी करते है, कि साहिबान ने मिर्जा के साथ धोखा किया, उसके लिए मिर्जा से ज्यादा उसके भाई जरूरी थे, वरना वो ऐसा कदम नहीं उठाती जिसके कारण मिर्जा को मारना पड़ा। लेकिन बावजूद इसके इनकी प्रेम कहानी भी अमर है।
वैसे तो मिर्जा साहिबान की कहानी को पीलू ने 17 वी सदी में लिखा था, लेकिन इतिहासकारों की माने तो 16 सदी में पंजाब के झांग और दानाबाद क्षेत्र में सच में मिर्जा साहिबान के साथ ऐसी घटना घटी थी, जिससे प्रेरित होकर पीलू ने इसे एक folk के रूप में प्रदर्शित करने का फैसला किया। पीलू के कहानी के अनुसार मिर्जा दानाबाद के खराल कबीले का था जो कि एक मशहूर तीरंदाज था। उसका निशाना इतना सटीक था कि बड़े बड़े धनुर्धर उससे डरते थे, वहीं साहिबा खेवा यानी की (झांग) के सियाल कबीले से आती थी। दोनों बचपन में से एक ही मौलवी के पास पढ़ने जाते थे इस दौरान दोनों को एक दूसरे से प्यार हो गया।
जब प्यार के सामने परिवार आ गया
लेकिन दोनों समुदाय के बीच का अंतर दोनों के प्यार के बीच में भी आ गया। साहिबान उस समय वहां की सबसे खूबसूरत स्त्री कहलाती थी, जिसके लिए बड़े बड़े घरों से रिश्ते आते थे, तो फिर भला उसके परिवार वाले दुश्मन कबीले में साहिबान को कैसे भेज देते, परिवार वालों ने उसकी शादी किसी उनके ओहदे वाले लड़के से तय कर दी। लेकिन साहिबान जिद पर थी कि वो शादी करेगी तो केवल मिर्जा से। अपनी शादी से एक दिन पहले उसने एक चोरी छिपे चिट्ठी मिर्जा को भेज दिया, उस चिट्ठी में लिखा थ…कि वो केवल उसकी दुल्हन बनेगी, अगर वो मुहूर्त से पहले उसे लेने नहीं आया तो वो अपनी जान दे देगी।
भाई समीर खान मिर्जा से बेहद नफरत करता
मिर्जा साहिबान की चिट्ठी पाकर तुरंत वहां से निकल गया और शादी से ठीक पहले वो साहिबान के घर पहुंच गया। उसके हाथों में तीर धनुष था, उसके हुनर से सभी वाकिफ थे, अगर किसी ने रोकने की कोशिश की तो शादी वाले घर में मौत का मातम छा सकता है। इसलिए उस वक्त उन लोगों ने दोनों को जाने दिया और मिर्जा साहिबान को लेकर भाग गया। साहिबान के पांच भाई थे, जिसमें उसका एक भाई समीर खान मिर्जा से बेहद नफरत करता था.. .वो लोग सियाल जाट कबीले के रसूखदार और ताकतवर लोग थे। उनकी सालो की इज्जत मिट्टी में मिल गई थी मिर्जा के साहिबान को ऐसे ले जाने के बाद तो उसके बाकि भाई भी उसके खून के प्यासे हो गए. वो भी दोनो के पीछे तेजी से घोड़े से निकले। लेकिन जब मिर्जा साहिबान पंजाब के दानाबाद पहुंचे तो मिर्जा लगातार सफर से थक गया था, उसने एक जंद का पेड़ देखा, जो बहुत हरा भरा था। मिर्जा ने साहिबान से कहा कि वो कुछ देर आराम करना चाहता है। मिर्जा अपने तीर धनुष को पेड़ की टहनी से टांग दिया औऱ वहीं सो गया।
निहत्थे मिर्जा पर पर हमला
इसी बीच साहिबान को लगा कि अगर उसके भाई उसके पीछे आये तो खूनखराबे के अलावा कुछ नहीं होगा.. और मिर्जा किसी को नहीं छोड़ेगा.. बस फिर क्या था उसने खुद भाईयो को मनाने के फैसला किया.. लेकिन यहां साहिबान ने सबसे बड़ी भूल की.. उसने मिर्जा को खून खराबा करने से रोकने के लिए उसके सारे तीर तोड़ दिये औऱ धनुष को भी फेंक दिया.. इसी बीच उसके भाई वहां पहुंचे तो साहिबान ने उन्हें मनाने की कोशिश की, लेकिन नफरत और इज्जत पर लगे दाग के कारण उन लोगो ने मिर्जा पर हमला कर दिया.. मिर्जा ने जब अपना तीर धनुष देखा तो हैरान रह गया। तरकश के तीर टूटे थे और धनुष कहीं दूर गिरा था। साहिबान के भाईयो ने एक न सुनी और निहत्थे मिर्जा पर हमला कर उसे मार दिया। साहिबान बुत्त सी अपने प्यार को दम तोड़ते देखती रही.. और अंत में अपने भाईयो के साथ जाने के बजाये तरकश के एक टूटे हुए तीर से खुद को मार लिया.. मिर्जा साहिबान की प्रेम कहानी वहीं खत्म हो गई.. लेकिन मिर्जा जिसने साहिबान को कोई दोष नहीं दिया वही साहिबान, भाईयो के साथ जाने के बजाये मिर्जा के साथ ही मौत को गले लगा लेती है.. जिसके कारण उनका प्रेम भी हमेशा के लिए अमर बन गया।
पंजाब के हर हिस्से में मिर्जा साहिब की लोककथायें इस लिए प्रचलित है क्योंकि, वर्तमान में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में फैसलाबाद के पास दानाबाद के जरांवाला में मिर्जा और साहिबा की कब्रें मौजूद हैं.. जिससे इसके असली और ऐतिहासिक होने के प्रमाण मिलते है। बाकि की प्रेम कहानियों में जहां समाज और परिवार दुश्मन था वहीं इस कहानी में साहिबान के एक मासूम कदम ने उन्हें कुर्बान कर दिया। वो तो केवल मिर्जा के तीरों के अपने भाईयों को बचाना चाहती थी.. वो अपने भाईयो को समझाना चाहती थी कि मिर्जा उसके लिए सही है.. लेकिन सही मायने में सबकुछ खोने वाली जो यहां साहिबान ही थी.. इसलिए ये कहानी बाकियों से थोड़ी अलग है।














































