UNESCO Endangered Languages: किसी घर की कल्पना कीजिए, जहां दादा-दादी बच्चों को उसी भाषा में लोरियां सुनाते हैं, माता-पिता उसी भाषा में रोजमर्रा की बातें करते हैं और पीढ़ियों से उसी भाषा में रिश्तों के नाम, कहानियां और लोकगीत आगे बढ़ते आए हैं। लेकिन एक समय बाद बच्चे उस भाषा में जवाब देना बंद कर देते हैं। स्कूल और दोस्तों के बीच वे दूसरी भाषा बोलते हैं और धीरे-धीरे घर की पुरानी भाषा सिर्फ बुजुर्गों की बातचीत तक सिमट जाती है। फिर एक दिन उस भाषा को बोलने वाला आखिरी व्यक्ति भी नहीं रहता।
भाषाओं के खत्म होने की कहानी अक्सर इसी तरह शुरू होती है। किसी भाषा का विलुप्त होना सिर्फ शब्दों का खत्म होना नहीं है, बल्कि उसके साथ किसी समुदाय का इतिहास, संस्कृति, परंपराएं और पीढ़ियों का ज्ञान भी खो सकता है। भाषाविदों के लिए इसलिए सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि क्या बच्चे अभी भी अपने माता-पिता से वह भाषा सीख रहे हैं।
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दुनिया में 639 भाषाएं हो चुकी हैं विलुप्त| UNESCO Endangered Languages
एक शोध परियोजना में दुनिया की 639 ऐसी भाषाओं को दर्ज किया गया है, जो पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं। इनमें 227 भाषाएं 1960 के बाद विलुप्त हुईं। वहीं, यूनेस्को के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, जिन संकटग्रस्त भाषाओं के बोलने वालों की संख्या दर्ज थी, उनमें 1,749 भाषाओं के 10 हजार से भी कम वक्ता बचे थे।
जानकारों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे भी ज्यादा हो सकती है। इतिहास में कई ऐसी भाषाएं रही होंगी, जिनका कोई लिखित रिकॉर्ड, शब्दकोश या भाषाई अध्ययन तैयार होने से पहले ही उनका इस्तेमाल बंद हो गया।
भाषा मरने की शुरुआत घर से होती है
किसी भाषा का अचानक गायब होना आम बात नहीं है। पहले बच्चे घर की भाषा को समझते हैं, लेकिन जवाब किसी दूसरी भाषा में देने लगते हैं। इसके बाद धीरे-धीरे वे उस भाषा का इस्तेमाल करना कम कर देते हैं और कुछ पीढ़ियों में भाषा सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित हो सकती है। यही कारण है कि किसी भाषा का भविष्य जानने के लिए यह देखना बेहद जरूरी माना जाता है कि बच्चे उसे अपने माता-पिता से सीख रहे हैं या नहीं। अगर एक पीढ़ी भाषा को आगे नहीं बढ़ाती, तो उसके खत्म होने का खतरा तेजी से बढ़ जाता है।
भारत में भी करीब 200 भाषाएं खतरे में
भाषाओं के संकट से भारत भी अछूता नहीं है। यूनेस्को के आंकड़ों के मुताबिक भारत में करीब 200 भाषाएं खतरे की अलग-अलग श्रेणियों में थीं। इनमें 84 संकटग्रस्त, 62 निश्चित रूप से संकटग्रस्त, 6 गंभीर रूप से संकटग्रस्त और 35 बेहद गंभीर संकट में थीं। इसके अलावा 9 भाषाएं 1950 के बाद विलुप्त हो चुकी थीं। इन 196 भाषाओं को बोलने वालों की अनुमानित संख्या करीब 2.7 करोड़ थी। यूनेस्को का भाषाई डेटाबेस समय-समय पर अपडेट किया जाता है।
स्कूल और शहर भी बदल सकते हैं भाषा की तस्वीर
सड़क, शहर और स्कूल अपने आप किसी भाषा को खत्म नहीं करते। समस्या तब शुरू होती है जब शिक्षा और रोजगार के लिए किसी बड़ी भाषा का इस्तेमाल जरूरी हो जाता है और स्थानीय भाषा को स्कूल या सार्वजनिक जीवन में जगह नहीं मिलती। करीब 7,000 भाषाओं की स्थिति पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि जब बच्चे कई साल तक प्रमुख भाषा में पढ़ते हैं और स्कूल में उनकी पारिवारिक भाषा का इस्तेमाल नहीं होता, तो स्थानीय भाषा पर दबाव बढ़ सकता है। शहरों से जुड़ाव के साथ प्रमुख भाषाओं का प्रभाव भी छोटे भाषाई समुदायों में बढ़ता है।
युद्ध और विस्थापन भी बन सकता है वजह
भाषाओं के खत्म होने के पीछे युद्ध और विस्थापन भी बड़ी वजह हो सकते हैं। सीरिया की आधुनिक पश्चिमी अरामाइक भाषा इसका उदाहरण है। युद्ध के कारण अरामाइक बोलने वाले लोग अलग-अलग जगहों पर चले गए। समुदाय बिखरा तो बच्चों के लिए अपनी पारंपरिक भाषा सुनने और बोलने के मौके भी कम होते गए। अनुमान है कि अब इस भाषा के 3,000 से भी कम वक्ता बचे हैं। मालूला के भाषण का इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड तैयार कर करीब 64,845 शब्दों के साथ ऑडियो और भाषाई सामग्री भी सुरक्षित की गई है। लेकिन रिकॉर्डिंग किसी भाषा को दस्तावेज में बचा सकती है, रोजमर्रा की जिंदगी में नहीं।
उबिख भाषा के साथ खत्म हुई एक पूरी बोलचाल की दुनिया
काला सागर के पूर्वी तट के पास बोली जाने वाली उबिख भाषा की कहानी भी विस्थापन से जुड़ी है। 1864 में बड़ी संख्या में उबिख लोगों को काकेशस छोड़ना पड़ा। नई जगह पर तुर्की और दूसरी भाषाओं की जरूरत बढ़ी और युवा पीढ़ी धीरे-धीरे अपनी पारंपरिक भाषा से दूर होती गई। तौफीक इस्नच उबिख के आखिरी धाराप्रवाह वक्ता बने। उन्होंने भाषाविदों के साथ मिलकर भाषा के शब्द और ध्वनियां रिकॉर्ड कराईं। लेकिन उनके तीनों बेटे भी उबिख में बातचीत नहीं कर पाते थे। 7 अक्टूबर 1992 को इस्नच की मृत्यु के साथ उबिख एक जीवित बोली जाने वाली भाषा के रूप में खत्म हो गई।
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