500 साल जीवित रहने वाले वो मुस्लिम पीर, जो गुरु नानक के सानिध्य में बन गए गुरमत के अनुयायी! Peer Budhu shah history

Shikha Mishra | Nedrick News Ghaziabad Published: 25 जुलाई 2026, 10:41 PM Updated: 25 जुलाई 2026, 10:41 PM
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Peer Budhu shah history: एक ऐसे पीर, जिनका जन्म तो इस्लामिक परिवार में हुआ था, लेकिन गुरु नानक देव जी के साथ प्रवचन देते देते वो कब गुरमत के रंग में रग गए, उन्हें खुद पता नहीं चला..एक ऐसे संत जिन्होंने पहले गुरु का सानिध्य प्राप्त किया तो वहीं छठे गुरु गुरु हरगोबिंद साहिब से गुरमत विचारधारा को अपनाया.. जी हां, एक ऐसे पीर जो धरती पर 500 सालों से भी ज्यादा समय तक जीवित रहे थे। जिन्होंने सिख धर्म की शुरूआत से लेकर उसके मीरी पीरी विचार पर चलने की यात्रा को खुद देखा था। हम बात कर रहे है पीर बुधन शाह की, जिन्हें बाबा बुधन अली शाह, पीर बाबा और सैयद शम्सुद्दीन के नाम से भी जाना जाता है। अपने इस लेख में हम बात करेंगे पीर बुधन शाह के उस इतिहास के बारे में, जब वो सिक्खी से प्रेरित हुए.. और उनकी विचारधारा सिख गुरुओ से प्रेरित हो गई।

500 साल की उम्र… और गुरु नानक देव जी की भक्ति!

पंजाब के रूपनगर जिले से करीब 30 किलोमीटर दूर एक ऐतिहासिक गुरुद्वारा है कीरतपुर साहिब..यहीं पास में एक पहाड़ी की चोटी पर एक ऐतिहासिक मकबरा बना हुआ है, जहां हर साल सैकड़ो सिख अनुयायियों के साथ इस्लाम को मानने वाले लोग भी इस मकबरे में अपना सिर झुकाने आते है.. ये मकबरा पीर बुधन शाह का है.. जिन्होंने इस्लाम धर्म में अध्यात्मिकता को नए आयाम तक पहुंचाया तो वहीं सिख धर्म की विचारधारा को भी लोगों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई.. पीर बुधन शाह का जन्म को लेकर कई तरह की भ्रांति फैली हुई है, उनका जन्म 11वी सदी में हुआ था और सिख धर्म के संस्थापक गुरु गुरु नानक देव जी के गांव तलवंडी में ही हुआ था..जिसे आज नानकाना साहिब के नाम से जाना जाता है।

वो एक सैय्यद अरबी परिवार से थे, लेकिन बचपन से ही उन्हें संसारिक वस्तुओं से मोह नहीं थी और वो आध्यात्मिकता से ज्यादा जुड़े हुए थे। वो बेहद कम बोला करते थे, जैसे जैसे वो बड़े हुए, उन्होंने सूफी रहस्यवादी संत बनने के लिए घर परिवार सब त्याग दिया। संसारिक मोहमाया को त्याग कर वो  कहलूर पर्वत पर स्थित एक काली पहाड़ी पर झोपड़ा बना कर रहते थे, उन्होंने जीवन यापन के लिए बकरियां पाली हुई थी, जिसका रक्षा एक शेर किया करता था। पीर बुद्न शान केवल बकरी की दूध ही पिया करते थे उसके अलावा वो कुछ खाते पीते नहीं थे। इस दौरान उनकी आध्यात्मकित के बारे मे जानने के बाद आदि गुरु नानक देव जी उनसे मिलने के लिए पीर शाह से मिलने पहुंचे थे।

जब पीर शाह ने उन्हें देखा तो एक अलग ही आभा का अहसास हुआ। इस शेर बकरियों को चराने के लिए जंगल ले गया था, लेकिन वो वापिस आने वाले थे, पीर शाह को डर सताने लगा था किसी अजनबी को देखकर शेर कही हमला न कर दें, लेकिन गुरु साहिब ने उनके कहा जब आपका शेर आप पर हमला नहीं करेगा तो वो मुझे परेशान क्यों करेगा। तभी पीर शाह ने देखा कि शेर बकरियों के साथ लौटा और वो सीधे गुरु साहिब के सामने झुक गया और उन्हें नतमस्तक होकर प्रणाम किया। पीर शाह को ये समझते देर न लगी की सामने बैठा इंसान कोई मामूली नहीं है।

आध्यात्मिक चर्चा के दौरान पीर शाह ने गुरु साहिब एक कटोरी भर बकरी का दूध पीने को दिया, जिसपर केवल आधा कटोरी दूध ही उन्होंने पिया और बोले आधा दूध आने वाले समय के छठवे पातशाह के लिए रखें.. जो कुछ सालों के बाद खुद आयेंगे। पीर शाह ने उनके इस बात को स्वीकार कर लिया लेकिन तब उन्हें ये नहीं पता था कि इस एक जिन्मेदारी को निभाने के लिए उन्हें कई सौ सालों तक जीवित रहना पड़े। कहते है कि गुरु साहिब और पीर शाह के बीच काफी घनिष्ट मित्रता हो गई थी, वो अक्सर ऐसी आध्यात्मिक चर्चायें करते थे जो संसार को प्रकाश की तरफ ले जाने वाली थी।

समय बीतता गया.. एक एक करके 5 सिख गुरु सचखंड जा चुके थे और छठे गुरू गुरु हरगोविंद साहिब ने सिखों के लिए मीरी पीरी का नियम चलाया, और मुगलो के खिलाफ पहली बार सिखों ने हथियार उठाया था.. गुरु साहिब तो अंतर्यामी थे.. उन्हें उस अमानत के बारे में पता था, क्योंकि पीर शाह अब काफी बूढ़े हो चुके थे, मगर उनके प्राण इसिलए नहीं निकल रहे थे, क्योंकि वो आदि गुरु की अमानत को उनके सही उत्तराधिकारी तक पहुंचा सकें। छठे गुरु साहिब ने अपने बेटे बाबा गुरदित्ता को ये जिम्मेदारी पूरी करने के लिए पीर शाह के पास भेजा.. पीर शाह बाबा गुरदित्ता को देखकर भावविभोग हो उछें.. बाबा गुरदित्ता ने अपनी अमानत के बारे में पूछा तो पीर शाह ने उन्हें तुरंत दूख की कटोरी पकड़ा दी। बाबा गुरदित्ता ने दूध पिया तो उन्हें लगा कि जैसे वो आध्यात्म और अपने ईश्वर के बेहद करीब पहुमच गए है। पीर शाह ने बाबा गुरदित्ता ने आग्रह किया कि वो उनके निवास स्थान पर कोई बस्ती बसायें, जिसके कारण हां का नाम कीरतपुर पड़ा , जो एक पवित्र और ऐतिहासिक नगरी है।

कहा जाता है कि अपनी जिम्मेदारी निभा कर वो अंत्म बार आदि गुरु के दर्शन करवा चाहते थे, लेकिन उनके स्थान पर स्वयं छठे गुरु हरगोबिंद साहिब प्रकट हुए। जिन्हें देखने के बाद उन्होंने गुरु नानक देव की ही छवि नजर आई। उन्होंने गुरु साहिब का सत्कार किया.. और अपने जीवन में गुरु साहिब के काम आने की कृतज्ञता व्यक्त की। और फिर 1643 में किरतपुर में अपनी अंतिम सांस ली.,कहते है कि गुरु नानक देव जी ने ये आशिर्वाद दिया था कि जो भी नानकाना साहिब आयेगा वो कीरतपुर साहिब भी जायेगा.. तभी उसकी प्रार्थना पूरी होगी। जिस स्थान पर गुरु साहिब औऱ पीर शाह की मुलाकात हुई थी उस स्थान पर ही आज गुरु द्वारा चरण कमल मौजूद है।

कीरत पुर में दरगाह पीर बुधन अली शाह की दरगाह में हर साल अक्टूबर में मेला लगता है। लोग उनकी अरदास करने के लिए उनकी  समाधि पर नमक, सरसों का तेल और झाड़ू चढ़ाते हैं।  कहते है कि वो करीब 500 सालों से भी ज्यादा जिसे थे। और जब उनकी मुलाकात गुरु साहिब से हुई थी तो वो कई सौ सालों के थे। उन्होंने बताया कि जीवन चाहे कितना कठिन क्यों न हो, आपको ईश्वर पर भरोसा करके निरंतर अपना कार्म करते रहते है।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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