1997 में पेपर लीक लिए खाईं लाठियां, आज उसी मुद्दे पर Dharmendra Pradhan मौन क्यों?

Rajni | Nedrick News Ghaziabad Published: 24 जुलाई 2026, 09:19 PM Updated: 24 जुलाई 2026, 09:19 PM
Google News
Follow Us on Google News
Prefer Nedrick News
on Google

Dharmendra Pradhan: जिसने कभी खुद पेपर लीक के खिलाफ आवाज उठाई थी, आज वह मौन है। साल 1997 में जब ओडिशा में कांग्रेस सत्ता में थी, तब भी पेपर लीक हुआ था। तब 1500 छात्रों ने प्रदर्शन किया, लाठियां खाईं और जेल गए। अगर उस समय आवाज उठाना लोकतांत्रिक हक था, तो आज उसी हक पर सवाल क्यों?

आज जायज मांग कर रहे छात्रों पर ‘जेल भरो’ जैसी सख्त कार्रवाई क्यों हो रही है? क्या हमारे देश की न्याय व्यवस्था और प्रशासन के लिए छात्रों का यह गंभीर मुद्दा और उनका भविष्य अब प्राथमिकता नहीं रहा? तो चलिए इस लेख के जरिए इसी दोहरे रवैये को उजागर करते है।

और पढ़ें: Sonam Wangchuk का अनशन टूटा पर आंदोलन खत्म नहीं! शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर अड़े छात्र!

1997  में छात्रों का प्रदर्शन

साल 1997 में जब ओडिशा में कांग्रेस की सरकार थी, तब राज्य-स्तरीय प्रतियोगी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक (State-level competitive examination paper leak) होने से पूरे प्रदेश के छात्रों का गुस्सा फूट पड़ा था। यह कई परीक्षाओं की कोई सामान्य श्रृंखला नहीं थी, बल्कि मुख्य रूप से एक ही बड़ी परीक्षा में हुई भारी अनियमितता और घोटाले (Scandal) का मामला था, जिसने पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए थे।

इस एक पेपर लीक के खिलाफ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के नेतृत्व में लगभग 1,500 छात्र एकजुट होकर राजधानी भुवनेश्वर की सड़कों पर उतरे थे। छात्रों का यह विशाल हुजूम सीधे ओडिशा के राज्य सचिवालय (Secretariat) के बाहर पहुंचा और वहां तालाबंदी व घेराव कर कड़ा विरोध दर्ज कराया। इस एकल प्रदर्शन के दौरान ही तत्कालीन कांग्रेस सरकार की पुलिस ने छात्रों पर भारी लाठीचार्ज किया था, जिसमें छात्र नेता धर्मेंद्र प्रधान (Dharmendra Pradhan) को गंभीर चोटें और शरीर में कई फ्रैक्चर आए थे।

अब क्यों बदला सत्ता और प्रशासन का रवैया

इतिहास का चक्र देखिए, कल जो छात्र नेता पेपर लीक के खिलाफ लाठियां खाकर राजनीति के शिखर पर पहुंचा, आज वही धर्मेंद्र प्रधान (Dharmendra Pradhan) देश के शिक्षा मंत्री हैं। लेकिन विडंबना यह है कि आज जब देश इतिहास के सबसे बड़े परीक्षा संकटों में से एक का सामना कर रहा है, तब सत्ता और प्रशासन का रवैया बिल्कुल बदला हुआ है।

हाल के महीनों में, 3 मई 2026 को आयोजित हुई NEET-UG परीक्षा का प्रश्नपत्र बड़े पैमाने पर ‘डिजिटल गेस पेपर’ के रूप में लीक हो गया था। इसके बाद 12 मई 2026 को राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) को इस परीक्षा को आधिकारिक रूप से रद्द करना पड़ा था, जिसकी जांच अब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) कर रही है।

साल 1997 में ओडिशा में जिस छात्र आंदोलन और विरोध प्रदर्शन को लोकतंत्र का अधिकार माना गया था, आज ठीक वैसे ही प्रदर्शनों पर पाबंदियां लगाई जा रही हैं। आज अपनी जायज मांगों और ‘री-नीट’ जैसी अनिश्चितताओं के खिलाफ सड़कों पर उतरने वाले पीड़ित छात्रों को सहानुभूति मिलने के बजाय पुलिसिया कार्रवाई, हिरासत और ‘जेल भरो’ जैसे कड़े कदमों का सामना करना पड़ रहा है।

कल तक जो नेता छात्रों के साथ खड़े होकर व्यवस्था को चुनौती देते थे, आज वे प्रशासनिक मजबूरियों और तकनीकी दलीलों के पीछे मौन नजर आते हैं। सर्वोच्च न्यायालय और प्रशासन के इस मौजूदा रुख ने युवाओं के मन में यह गंभीर सवाल पैदा कर दिया है कि क्या अब देश की न्याय व्यवस्था और नीति-निर्माताओं के लिए करोड़ों छात्रों का भविष्य और उनकी मानसिक पीड़ा कोई प्राथमिकता नहीं रह गई है?

Rajni

rajni@nedricknews.com

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Recent News

Trending News

Editor's Picks

Latest News

©2026- All Right Reserved. Manage By Marketing Sheds