Guru Nanak Dev Ji: एक मामूली सा दिखने वाला लाल पत्थर और पटना के सबसे बड़े जौहरी की हार! क्या आप जानते हैं कि बिहार की धरती पर एक ऐसा लाल पत्थर आया था, जिसकी कीमत पटना का सबसे अमीर व्यापारी भी नहीं चुका पाया? जब गुरु नानक देव जी पटना साहिब पहुंचे, तो उन्होंने एक अनोखे पत्थर के ज़रिए भाई मरदाना जी और संसार को मानव जीवन की असली कीमत समझाई।
आखिर क्या था उस लाल पत्थर का रहस्य? और कैसे सालीस राय जौहरी की हवेली आज ‘तख्त श्री पटना साहिब’ बन गई? तो चलिए इस लेख के जरिए जानते हैं कि गुरु नानक देव जी की पटना यात्रा और ‘लाल पत्थर’ के उस रहस्यमयी आध्यात्मिक संदेश की पूरी कहानी।
श्री Guru Nanak Dev Ji की उदासी
कहानी की शुरुआत होती है सिखों के पहले गुरु, श्री गुरु नानक देव जी की पटना यात्रा से। आज जहाँ भव्य तख्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब सुशोभित है, और जहाँ सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म हुआ था – वह असल में सालीस राय जौहरी की ही हवेली थी। आगे चलकर यही पवित्र स्थान दसवें गुरु का जन्मस्थान बना। पर इस भव्य इतिहास की नींव कैसे पड़ी? आइए चलते हैं 1500 ईस्वी में जब गुरु नानक देव जी अपने साथी भाई मरदाना जी के साथ पटना पहुंचे।
गुरु नानक देव जी अपनी पहली ‘उदासी’ यानी धार्मिक यात्रा के दौरान यहाँ पधारे थे और उन्होंने यहाँ लगभग चार महीने का समय बिताया। इस दौरान वे रोज़ गंगा नदी के किनारे बैठकर संगतों को उपदेश दिया करते थे।
इंसानी जीवन की असली कीमत
एक दिन, भाई मरदाना जी को इंसानी जीवन की असली कीमत और आत्मिक ज्ञान का महत्व समझाने के लिए, गुरु जी (Guru Nanak Dev Ji) ने एक कौतुक रचा। उन्होंने ज़मीन से एक चमकीला लाल पत्थर उठाया और भाई मरदाना जी को देते हुए कहा—’मरदाना, बाज़ार जाओ और इस पत्थर का मूल्य पता करो, लेकिन याद रखना, इसे बेचना नहीं है।’
गुरु जी की आज्ञा मानकर भाई मरदाना जी बाज़ार की तरफ चल पड़े। सबसे पहले वे एक कुंजड़े यानी सब्ज़ी बेचने वाले के पास गए। उस सब्ज़ी वाले ने पत्थर को एक साधारण कांच का टुकड़ा समझा और उसके बदले सिर्फ एक मूली देने की बात कही। इसके बाद भाई मरदाना जी एक बजाज यानी कपड़े के व्यापारी के पास गए। उसने उसकी चमक देखकर एक या दो टके लगाने की पेशकश की।
भटकते-भटकते आखिर में भाई मरदाना जी पटना के सबसे बड़े और प्रसिद्ध जौहरी, सालीस राय की दुकान पर पहुंचे। सालीस राय ही वह असली पारखी था जिसे रत्नों की सच्ची पहचान थी। जैसे ही सालीस राय ने उस लाल पत्थर को देखा, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं! वह हैरान होकर मरदाना जी से बोला—’यह कोई साधारण पत्थर नहीं है, यह तो एक अमूल्य महा-रत्न है! अगर मैं अपनी पूरी संपत्ति भी बेच दूँ, तब भी इसका मूल्य नहीं चुका पाऊँगा।’
सालीस राय एक सच्चा पारखी
सालीस राय ने सिर्फ उस दिव्य रत्न के दर्शन करने के बदले में, सम्मान स्वरूप 100 रुपए की भेंट मरदाना जी के आगे रख दी और कहा—’इसे वापस ले जाओ, इस संसार में इसे खरीदने की औकात किसी की नहीं है।’ जब भाई मरदाना जी ने वापस लौटकर यह पूरी बात गुरु नानक देव जी को बताई, तो गुरु जी (Guru Nanak Dev Ji) मुस्कुराए और उन्होंने मानव जीवन का सबसे बड़ा रहस्य समझाते हुए कहा—’मरदाना! इस पत्थर की तरह ही यह मानव जीवन और परमात्मा का नाम भी अमूल्य रत्न हैं।
लेकिन इस संसार में हर कोई अपनी-अपनी समझ और बुद्धि के हिसाब से इसका मूल्य लगाता है। अज्ञानी लोग इसे कौड़ियों यानी सांसारिक मोह-माया के बदले गंवा देते हैं, जबकि सालीस राय जैसा कोई सच्चा पारखी ही इसके असली मूल्य यानी आत्म-ज्ञान को समझ पाता है।’
इस अद्भुत घटना के तुरंत बाद, सालीस राय जौहरी अपने वफादार सेवक अध्रक्का के साथ गुरु नानक देव जी (Guru Nanak Dev Ji) के दर्शन करने पहुंचे। गुरु जी के शांत और दिव्य वचनों को सुनते ही सालीस राय का सारा अहंकार चूर-चूर हो गया और वे गुरु जी के चरणों में गिरकर उनके परम भक्त बन गए। गुरु नानक देव जी ने सालीस राय के भीतर छिपे सच्चे ज्ञान और गहरी विनम्रता को देखा। गुरु जी ने अत्यंत प्रसन्न होकर अपनी पवित्र दस्तार (पगड़ी) सालीस राय के सिर पर सजा दी और उन्हें पटना में नाम-सिमरन और परमात्मा के संदेश के प्रचार-प्रसार की बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपी।
आगे चलकर सालीस राय जौहरी की यही ऐतिहासिक हवेली वह पावन और पवित्र स्थान बनी, जहाँ सिखों के दसवें गुरु, सर्ववंश दानी श्री गुरु गोविंद सिंह जी का प्रकाश (जन्म) हुआ। आज इसी पवित्र और ऐतिहासिक धरती पर तख्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब पूरी भव्यता के साथ सुशोभित है, जहाँ देश-विदेश से लाखों संगतें शीश नवाने आती हैं।































