Gurudwara Singh Sabha: 1870 के दशक में, एक तरफ 1957 की विद्रोह की पहली क्रांति शांत हो चुकी थी, तो वहीं सिखो ने अंग्रेजी हुकुमत के साथ संधि कर ली थी, जिससे अंग्रेजी हुकुमत का भरोसा सिखो की तरफ मुड़ गया था, अंग्रेज पंजाब में प्रवेश कर चुके थे लेकिन वो सिखो को काफी सम्मान देते थे मगर इसी बीच एक बड़ी समस्या ने जन्म ले लिया.. 1849 में ईस्ट इंडिया कंपनी के पंजाब पर एकाधिकार होने के बाद वहां ईसाई मिशनरियों ने धर्म परिवर्तन कराने का खेल शुरु कर दिया था, तो वहीं हिंदू सुधार आंदोलनों के जरिये ब्रह्म समाज और आर्य समाज सिखो को फिर से हिंदू बनाने की कोशिश में लगे थे तो वहीं मुसलमानों ने अलीगढ़ आंदोलन और अहमदीया के जरिये लोगों को इस्लाम धर्म में लुभाने की चाले शुरु कर दी थी।
Also Read: 1 रहस्यमयी Lal Pathar और सालीस राय जौहरी की हवेली का वो सच जो कोई नहीं जानता | Guru Nanak Dev Ji
उड़िसा में गुरुद्वारा सिंह सभा
जिससे सिख धर्म के अस्तित्व पर खतरा पड़ सकता था और उसे रोकने के लिए ही 1873 में ठाकुर सिंह संधावालिया और भाई गुरमुख सिंह ने सिंह सभा आंदोलन की शुरुआत अमृतसर से की थी। इस आंदोलन का उद्देश्य था कि सिखो को उनकी मूल जड़ो से फिर से मिलाया जाये। सिख गुरुओं के विचारों के अनुसार सिख धर्म का फिर से प्रचार प्रसार किया गया, और धीरे धीरे ये आंदोलन विश्व भर में व्यापक हो गया.. इस आंदोलन के सम्मान में भारत समेत अन्य देशों में गुरुद्वारो का निर्माण कराया गया.. एक ऐसा ही गुरुद्वारा मौजूद है उड़िसा के सीमाई क्षेत्र में बसे शहर राउरकेला में.. बात करेंगे गुरुद्वारा सिंह सभा के बारे में।
सबसे ज्यादा सिख राउरकेला
ओडिशा राज्य के उत्तरी भाग में स्थित एक खूबसूरत जिला है सुंदरगढ़.. इसी में पड़ता है ओड़िसा का इस्पात शहर कहलाने वाला राउरकेला शहर। सुंदरगढ़ पूरे ओड़िसा में एक ऐसा शहर है जहां न केवल सिखों की अच्छी खासी आबादी है बल्कि यहां सिख धर्म की धरोहरों को संजोने के लिए सिख संगठन पूरा जोर लगाती है। 2011 की जनसंख्या आकड़ो के मुताबिक सुंदरगढ़ में तब करीब 5713 सिख रहा करते थे। जिसमें सबसे ज्यादा वो राउरकेला में ही रहते थे, उसके पीछे का कारण था यहां का इस्पात उद्योग। व्यापार औऱ रोजगार के कारण सिख यहां भारी संख्या में आते है.. औऱ जहां सिख है वहां उनका पूजा स्थल न हो ये कैसे हो सकता है। यहीं पर बना हुआ है ऐतिहासिक सिख सभा गुरुद्वारा।
ये गुरुद्वारा यहां रहने वाले सिखो के लिए उनका आध्यात्मिक, धार्मिक और सामाजिक केंद्र है। ये गुरुद्वारा भी सिख धर्म की सबसे बड़ी विचारधारा संगत, पंगत और सेवा के आधार पर ही कार्य करता है, जिसमें संगत यानि की पवित्र सभा का आयोजन, पंगत यानि की लंगर में सभी लोगों का एक साथ बैठना और सेवा, जिसमें व्यक्ति बिना किसी इच्छा के संगत की निस्वार्थ सेवा करने की भावना रखते हो। राउरकेला के बिसरा रोड पर स्थित गुरूद्वारा सिंह सभा 3 मंजिला एक आलीशान इमारत है। जो कि सफेद पत्थर से निर्मित है। जिसका निर्माण पारंपरिक गुरुद्वारे की ही तरह हुआ है। हांलांकि इसके इस्पात सीटी बनने की शुरु आजादी के बाद हुई थी।
जो कि 1959 में थी इसलिए अनाधिकारिक रूप से कहा जाता है कि ये गुरु द्वारा 1960 के बाद बनाया गया था, जब वहां सिखो की संख्या में इजाफा होने लगा। ये गुरुद्वारा सिख संगतो की मेहनत का नतीजा है.. सातो दिन खुलने वाला ये गुरुद्वार रात को 10 बजे बंद हो जाता है। रोजाना यहां सैकड़ो श्रद्धालु मत्था टेंकने आते है। जिससे इसका महत्व और बढ़ जाता है। गुरुद्वारे के बीच में दरबार साहिब है जहां पवित्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी विराजमान हैं.. जो सिख धर्म के शास्वत और जीवंत अंतिम गुरु के रूप में विराजमान है। इस गुरुद्वारे में एक सामुदायिक केंद्र भी है, जहां सिख धर्म से जुड़े धार्मिक, और पारंपरिक कार्यक्रम होते है। वहीं दरबार साहिब में नियमित तौर पर नितनेम यानि दैनिक प्रार्थनायें, कीर्तन, शास्त्रों की व्याख्या और कथा और साथ ही सामूहिक प्रार्थना अरदास की जाती है।
यहां रहने वाले सिखों में ऐसे कई सिख है जो पंजाब की धरती से यहां आये है औऱ यहीं के हो गए है। मौजूदा समय में राउरकेला में सिख समुदाय की धार्मिक और सामाजिक भागीदारी काफी अहम हो चुकी है। यहां की अर्थव्यवस्था में उनकी भूमिका काफी अहम है। सिखों के प्रभाव के कारण यहां कई गुरुद्वारे मौजूद है लेकिन गुरुद्वारा सिंह सभा की काफी अहमियत मानी जाती है। जिसे यहां आने वाले शुरुआती सिखों ने एकजुट होकर बवनाया था। आज ये गुरुद्वारा यहां रहने वाले सिखों की शान औऱ उनके परोपकार का प्रतीक है। सिंह सभा आंदोलन के काऱण सिख धर्म की रक्षा हुई थी, और ये गुरुद्वारा सी आंदोलन का प्रतीक है।































