Makka Crop Tips: खरीफ सीजन की शुरुआत के साथ ही देशभर के किसान ज्वार, बाजरा और मक्का जैसी प्रमुख फसलों की बुआई की तैयारियों में जुट गए हैं। मानसून के आगमन के साथ खेतों में गतिविधियां तेज हो गई हैं, लेकिन कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि बुआई से पहले एक महत्वपूर्ण काम को नजरअंदाज करना किसानों को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। यह काम है भूमि शोधन, जिसे फसल सुरक्षा की पहली और सबसे जरूरी सीढ़ी माना जाता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि खेत की मिट्टी को पहले से तैयार और सुरक्षित नहीं किया गया तो भूमि जनित रोग और कीट फसलों को शुरुआती चरण में ही नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसका सीधा असर उत्पादन और किसानों की आय पर पड़ता है।
भूमि जनित रोगों से बढ़ता है खतरा| Makka Crop Tips
खरीफ मौसम में नमी बढ़ने के कारण मिट्टी में मौजूद कई प्रकार के हानिकारक जीवाणु, फफूंद और कीट तेजी से सक्रिय हो जाते हैं। ज्वार, बाजरा और मक्का जैसी फसलें विशेष रूप से इन समस्याओं से प्रभावित होती हैं। ऐसे में खेत की तैयारी के दौरान उचित भूमि शोधन करना बेहद जरूरी माना जाता है। फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ. हादी हुसैन खान का कहना है कि किसानों को रासायनिक दवाओं पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय जैविक उपायों को अपनाना चाहिए। इससे न केवल फसल सुरक्षित रहती है, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता भी लंबे समय तक बेहतर बनी रहती है।
जैविक तकनीकें बन रही हैं किसानों की पसंद
विशेषज्ञों ने किसानों को ट्राइकोडर्मा, बवेरिया बेसियाना और स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस जैसी जैविक दवाओं के इस्तेमाल की सलाह दी है। इन तीनों जैविक एजेंटों का काम अलग-अलग प्रकार के रोगों और कीटों से फसल की रक्षा करना है। ट्राइकोडर्मा फफूंद जनित रोगों को नियंत्रित करने में मदद करता है, जबकि बवेरिया बेसियाना खेत में मौजूद हानिकारक कीटों पर प्रभावी माना जाता है। वहीं स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस बैक्टीरिया जनित रोगों को नियंत्रित करने का काम करता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इन जैविक तत्वों के उपयोग से मिट्टी में मौजूद लाभदायक सूक्ष्मजीव भी सक्रिय हो जाते हैं। ये मित्र जीवाणु और फंगस मिट्टी में मौजूद हानिकारक रोगकारकों को खत्म करने में मदद करते हैं, जिससे खेत की उर्वरता बढ़ती है।
अंतिम जुताई के समय करें प्रयोग
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि इन जैविक दवाओं का उपयोग खेत की अंतिम जुताई के दौरान करना सबसे ज्यादा प्रभावी होता है। प्रति एकड़ खेत के लिए 3 किलो ट्राइकोडर्मा, 3 किलो बवेरिया बेसियाना और 3 किलो स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस की जरूरत होती है।
इन सभी को अलग-अलग 100-100 किलो अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या कंपोस्ट में मिलाकर खेत में डाला जाना चाहिए। हालांकि विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि तीनों जैविक उत्पादों को एक साथ मिलाकर खेत में नहीं डालना चाहिए। सबसे पहले ट्राइकोडर्मा युक्त खाद का छिड़काव करें। इसके लगभग तीन से चार घंटे बाद बवेरिया बेसियाना का प्रयोग करें और अंत में स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस को खेत में डालें।
फसल को मिलेगा प्राकृतिक सुरक्षा कवच
इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह रसायनों के बिना फसलों को सुरक्षा प्रदान करती है। मक्का में नुकसान पहुंचाने वाले फॉल आर्मीवॉर्म और स्टेम बोरर जैसे खतरनाक कीटों के अंडे और प्यूपा भी इस प्रक्रिया से काफी हद तक नियंत्रित हो जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान बुआई से पहले भूमि शोधन की इस जैविक विधि को अपनाते हैं, तो फसल रोगों और कीटों से सुरक्षित रहेगी। साथ ही मिट्टी की सेहत बेहतर होगी और उत्पादन में भी बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। यही वजह है कि खरीफ सीजन की शुरुआत से पहले भूमि शोधन को फसल प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
































