जब सैकड़ो सिखों के मयांमार से भाग कर पूर्वोतर राज्यों में लेनी पड़ी थी शरण – Sikhism in Myanmar

Shikha Mishra | Nedrick News Ghaziabad Published: 24 Apr 2026, 05:36 AM | Updated: 24 Apr 2026, 05:38 AM

Sikhism in Myanmar: जब आप भारत के कई पड़ोसी देशों की स्थिति देखते है तो पाते है कि श्रीलंका हो या अफगानिस्तान, बांग्लादेश हो या फिर म्यांमार.. इस सभी देशों में जो नरसंहार हो रहा है, उसके कारण लाखों की संख्या में यहां रह रहे लोगों को पलायन करना पड़ रहा है औऱ ये सिलसिला सालो से जारी है, खासकर जो यहां के स्थानीय लोग नहीं है उनके साथ तो यहां के लोगो का विहेवियर बहुत ही ज्यादा खराब है, उनपर हमले करना, उनकी हत्या करना, काफी आम हो गया।

जिसका नतीजा ये हुआ कि प्रवासियों को वहां से पलायन करना पड़ा.. ऐसा ही मयांमार (Myanmar) में रह रहे सिखों के साथ हुआ.. जब वहां सालो से शांति से रह रहे सिखों पर वहां से पलायन करना पड़ा औऱ भाग कर अपने अपने परिवारो के साथ मयांमार (Myanmar) से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में बसना पड़ा था। जहां आज भी सिख मौजूद है, जो मयांमार से विस्थापन की कहानी सुनाते है। अपने इस लेख में हम मयांमार में सिख धर्म के फलने फूलने और वहां से पलायन करने की कहानी को जानेंगे।

मयांमार के बारे में जानें विस्तार से – Sikhism in Myanmar

मयांमार, जिसका आधिकारिक नाम ‘म्यांमार संघ गणराज्य’ है, जिसे 1989 तक बर्मा के नाम से जाना जाता था। मयांमार दक्षिण-पूर्व एशिया का सबसे बड़ा क्षेत्रफल वाला देश है, जिसका क्षेत्रफल 676,579 वर्ग किलोमीटर है, मयांमार एशिया का 10 सबसे बड़ा देश है तो वहीं 2022 के आकड़ो के अनुसार मयांमार की आबादी लगभग 5 करोड़ 57 लाख 70 हजार 232 के आसपास थी।  वहीं मयांमार (Myanmar) की राजधानी नेप्यीताव है तो वहीं वहीं यांगून जिसे पहले रंगून के नाम से जाना जाता था, वो मयांमार का सबसे बड़ा शहर है।

मयांमार (Myanmar) के उत्तर-पश्चिम में बांग्लादेश और भारत, उत्तर-पूर्व में चीन, पूर्व और दक्षिण-पूर्व में लाओस और थाईलैंड, और दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम में अंडमान सागर और बंगाल की खाड़ी से लगती है। यानि की मयांमार एक ऐसा देश है जो कई देशों से सीमा शेयर करता है। बर्मा एक बौद्ध देश है जहां कि 80 प्रतिशत आबाजी बौद्ध धर्म को मानती है।

ब्रिटिश हुकूमत ने जब भारत पर विस्तार किया 1886 से 1937 तक मयांमार को भारत का हिस्सा माना जाता था, जिस पर 1824 में ब्रिटिश हुकूमत ने शासन शुरु कर दिया था, और 1937 में इसे भारत से अलग करके ब्रिटिश उपनिवेश बना दिया था। लेकिन एक तरफ भारत में तो वहीं दूसरी तरह मयांमार में ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ आजादी की लड़ाई जारी थी, और  4 जनवरी 1948 को मयांमार (Myanmar) को भी अग्रेजी हुकुमत से आजादी मिल ही गई। हालांकि वहां लगातार गृह युद्ध जारी रहे.. जिससे वहां की स्थिति काफी बुरी होती चली गई। जो अब 2021 में आंग सांग सू कि की सरकार गिरने के बाद से फिर से जारी है।

मयांमार में सिख धर्म और उनका पलायन – Sikhism in Myanmar

गृह युद्ध का असर पूरे मयांमार (Myanmar) पर दिख रहा है, इलिलिए वहां रहने वाले सिखों के लिए ऐसे माहौल मेंरहना आसान नहीं है. सैकड़ो लोग पलायन भी कर रहे है। लेकिन म्यांमार की स्थिति को भाव कर सबसे पहले वहां से पलायन करने वाले थे कुछ सिख.. लेकिन पहले ये जानते है कि म्यांमार में सिख पहुंचे कैसे… दरअशल जब ब्रिटिश हुकुमत ने म्यांमार को अपना व्यापार केंद्र बनाना शुरु किया तब म्यांमार की तरफ रोजी रोटी के लिए सबसे पहले जाने वाले थे सिख। उस वक्त पंजाब से भारी संख्या में सिख म्यांमार जाकर व्यापार और रोजगार के अवसरो को देखते थे। जिससे वहां सिखो की आबादी तेजी से बढ़ी थी, वहीं वहां पर सुरक्षा के लिए ब्रिटिश आर्मी और पुलिस का हिस्सा बन कर भी सिख वहां गए थे..

म्यांमार (Myanmar) मे आज के समय में भी करीब 48 गुरुद्वारे मौजूद है, जहां पहला गुरुद्वारा केंद्रिय सिख गुरुद्वारा यांगून में 19 सदी शताब्दी के अंत में बनाया गया था। यहां रहने वाले ज्यादातर सिख पंजाब से ही आये हुए है जिन्हें बर्माइन पंजाबी कहा जाता है, जो सिख धर्म के पूरी निष्ठा को बनाये रखते है अपने धर्म के अनुसार ही जीवन जीते है। मौजूदा समय में भी मयांमार में करीब 2 से 3 हजार सिख रहते है, हर रविवार को संगत जमा होती है। कीर्तन किये जाते है, सिख धर्म की परंपरा बनी रही उसके लिए स्कूल और क्लासेस लिये जाते है, हर देश की तरह यहां भी सिख गुरुद्वारों में लंगर की प्रथा को फॉलो करते है। सही मायने में यहां रहने वाले सिख भी मयांमार में अलग अलग धर्मों और सास्कृंतिक की हिस्सा बन गए है।

जब सिखों को पलायन करना पड़ा – Sikhism in Myanmar

कहते है कि जब पहला विश्वयुद्ध हुआ तब भी बर्मा भारत का हिस्सा था, लेकिन उसकी सुरक्षा के लिए भारतीय फौजो को वहां भेजा गया। मयांमार भी युदध का हिस्सा था, सिख हमेशा से काबिल थे इसलिए सिखों सैनिकों भी वहां भेजा गया। युद्ध खत्म होने के बाद कई लोग वापिस आ गए लेकिन कुछ वही रहे। वो वहां रोजगार करते.. और बेहतर जीवन जीने की कोशिश करते थे लेकिन 1936 में मयांमार (Myanmar) में अशांति छाने लगी.. जो कि ब्रिटिश उपनिवेश बनने के लिए भी विरोध किया जा रहा था। कहा जाता है कि वहां के मूल समुदाय के लोगो ने सैक़ड़ो लोगो को वहां से भागने पर मजबूर कर दिया, जिसमें सबसे ज्यादा सिख थ।

वो भारत में भाग कर शरण लेने के लिए मजबूर हो गए थे। उस दौरान सैकड़ो सिख भारत के पूर्वोतर राज्यों में आये थे, और वहीं बसे हुए है, जो सिख धर्म की खूशबू को फैला रहे है। म्यांमार कब फिर से शांति राह पर चलेगा.. और कैसे होगी ये राज आसान.. ये अभी काफी लंबा जाने वाला है।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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