Chhath Puja 2025: अर्घ्य देने का सही तरीका क्या है? बांस या पीतल का सूपा, शास्त्र क्या कहते हैं?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 26 अक्टूबर 2025, 05:30 AM Updated: 26 अक्टूबर 2025, 05:30 AM
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Chhath Puja 2025: बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और नेपाल के कुछ हिस्सों में मनाया जाने वाला छठ महापर्व, भारतीय परंपराओं में अपनी अनूठी जगह रखता है। यह पर्व खासकर उगते और डूबते सूर्य के प्रति आस्था और श्रद्धा को दर्शाता है। इस पर्व में व्रति लगभग 36 घंटे का कड़ा उपवास रखते हैं, जिसमें नहाय-खाय, खरना, अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य और अंत में उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत पूरा किया जाता है।

और पढ़ें: Chhath Puja 2025: कल से छठ पूजा का शुभारंभ, जानें नहाय-खाय से ऊषा अर्घ्य तक हर दिन का महत्व

छठ पूजा में इस्तेमाल की जाने वाली हर चीज का विशेष महत्व होता है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है सूपा, जिसका प्रयोग अर्घ्य देने के लिए किया जाता है। सूपा बांस या पीतल का बनाया जाता है, और दोनों का अपना-अपना महत्व है।

बांस का सूपा- Chhath Puja 2025

बांस के सूपा को प्राकृतिक रूप से शुद्ध माना जाता है। इसे शुभ और पवित्र माना गया है। बांस आयु और समृद्धि का प्रतीक है। मान्यता है कि बांस के सूपा से अर्घ्य देने से संतान की आयु लंबी होती है और घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।

पीतल का सूपा

पीतल का सूपा भी पूजा में महत्वपूर्ण होता है। इसका पीला रंग सूर्य देव का प्रतीक माना जाता है। पीतल के सूपा में रखे गए फल और मिठाईयों को सूर्य देव को अर्पित करने से विशेष आशीर्वाद मिलता है। यह समृद्धि, सुख और धन की प्राप्ति का प्रतीक है।

कौन सा सूपा शुभ है?

बांस का सूपा शुद्धता, नैतिकता और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है, इसलिए यह अधिकतर व्रतियों द्वारा शुभ माना जाता है। वहीं पीतल का सूपा घर में सुख और समृद्धि लाने का प्रतीक है। दोनों ही प्रकार के सूपा अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं।

छठ महापर्व का इतिहास और महत्व

छठ महापर्व की शुरुआत प्राचीन काल से मानी जाती है। इसे सूर्य देवता की आराधना से जोड़कर देखा जाता है। उगते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा दानवीर कर्ण से जुड़ी हुई है। कथा अनुसार कर्ण भगवान सूर्य देव के परम भक्त थे और उन्होंने लंबे समय तक बिना कुछ खाए-पिए और पानी में खड़े रहकर सूर्य देव की उपासना की थी। इसी परंपरा का पालन आज भी व्रति करते हैं।

लोककथाओं के अनुसार, छठ पूजा का संबंध सप्त ऋषियों और उनकी पत्नियों से भी है, जिन्होंने सूर्य देव से आशीर्वाद प्राप्त किया था। इसके अलावा कहा जाता है कि भगवान राम और माता सीता ने भी सूर्य देव की आराधना के लिए छठ पूजा का आयोजन किया था।

छठ महापर्व का महत्व

इस पर्व में सूर्य पूजा का प्रमुख स्थान है। सूर्य को जीवन का स्रोत माना जाता है, और उनकी उपासना से स्वास्थ्य, सुख और समृद्धि मिलती है। व्रति सूर्य देव से लंबी और स्वस्थ जीवन की कामना करते हैं। इसके साथ ही 36 घंटे का उपवास शारीरिक और मानसिक शुद्धता का प्रतीक है। व्रति इस दौरान केवल आहार का परहेज ही नहीं करते, बल्कि अपने विचारों को भी शुद्ध रखने का प्रयास करते हैं।

और पढ़ें: Devuthani Ekadashi 2025: नोट करें सही तारीख, शुभ मुहूर्त और व्रत-पूजन की संपूर्ण विधि

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