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संविधान, समानता और भ्रम: क्या वास्तव में देश में सभी को समान रूप से मिल रहा है “समानता का अधिकार” ?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 10 Mar 2025, 12:00 AM | Updated: 10 Mar 2025, 12:00 AM

संविधान सभी नागरिकों को समानता का अधिकार प्रदान करता है, लेकिन क्या यह समानता वास्तव में सभी को समान रूप से मिल रही है? इस प्रश्न पर विचार करना अत्यंत आवश्यक है, विशेषकर दलित और मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति के संदर्भ में. भारत के अल्पसंख्यक वर्गों की स्थिति दयनीय हो चली है. कभी इन्हें मॉब लिंचिंग का शिकार बनाया जाता है, कभी इन्हें पाकिस्तान परस्त बताकर प्रताड़ित किया जाता है तो कभी इनके धार्मिक अधिकारों पर अंकुश लगाने का प्रयास किया जाता है. ऐसे में संविधान में उल्लेखित समानता अब भ्रम का रुप ले चुकी है, जिसे सिर्फ एज्यूम किया जा सकता है. वास्तव में महसूस नहीं किया जा सकता. देश में अल्पसंख्यकों की स्थिति  कितनी दयनीय है और कैसे उनके अधिकारों पर प्रहार हो रहे हैं, चलिए जानने और समझने का प्रयास कर रहे हैं.

राजनीतिक और कानूनी परिस्थितियां

दरअसल, भारत में मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार 14.2 फीसदी है, जो उन्हें देश का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह बनाती है. इसके बावजूद यह समुदाय सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में कई चुनौतियों का सामना कर रहा है. राजनीतिक और कानूनी परिस्थितियों की बात करें तो मौजूदा सरकार में एक भी मंत्री मुस्लिम समुदाय से नहीं है.

जी हां, मोदी कैबिनेट में एक भी मंत्री मुस्लिम समुदाय से नहीं है. अगर आप नजर उठाकर देखेंगे तो देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों बीजेपी और कांग्रेस में भी उच्च स्तर का एक भी मुस्लिम समुदाय का नेता आपको नहीं दिखेगा, जो अपने लोगों पर इम्पैक्ट डाल सके या उनके लिए सीना ठोक कर खड़ा हो सके. यानी यह तो स्पष्ट है कि मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां मुस्लिम समुदाय के नेताओं को आगे बढ़ा ही नहीं रही  हैं, जिसका असर यह हो रहा है कि देश के करीब 18 करोड़ मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाला कोई अपना नेता नहीं है. साथ ही अगर हम अल्पसंख्यकों के कानूनी परिस्थितियों की बात करें तो दलितों की तो आज के समय में भी कोई सुनता नहीं है.

दलित उत्पीड़न के तमाम मामले तो पुलिस थाने में दर्ज ही नहीं होते. मुस्लिमों के साथ भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. पिछले कुछ वर्षों में ऐसा ट्रेंड देखने को मिला है कि अगर किसी घटना में मुस्लिम बनाम अन्य समुदायों का नाम आता है…तो कार्रवाई ज्यादातर मुस्लिमों पर होती है! बुलडोजर मुस्लिमों के घरों पर चलते हैं! अन्य समुदाय के आरोपियों पर ऐसी कार्रवाई देखने को नहीं मिलती है!

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UCC और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

वहीं, समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी जैसे कानून को इस्लाम मानने वाले सीधे तौर पर नकारते हैं और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर प्रहार बताते हैं. ध्यान देने वाली बात है कि देश के कुछ राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू करने के प्रयास हुए हैं, जिससे मुस्लिम समुदाय के व्यक्तिगत कानूनों पर गहरा प्रभाव पड़ा है. मुस्लिम समुदाय इसे अपनी धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप मानता आ रहा है.

इसके अलावा देश के कई राज्यों ने जबरन धर्मांतरण रोकने के लिए कानून बनाए हैं, जिन्हें ‘लव जिहाद’ कानून भी कहा जाता है. लेकिन अक्सर इस कानून का दुरुपयोग होते दिखा है. तमाम ऐसे मामले रहे हैं, जिनमें सामान्य प्रेम प्रसंग के मामलों में भी लव जिहाद कानून घुसाकर कार्रवाई की गई है या की जा रही है, जिससे उनकी स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है.

सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां

वहीं, देश में मुसलमानों की सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों की बात करें तो आपको हर जगह असमानता देखने को मिलेगी. शिक्षा और रोजगार में यह असमानता काफी ज्यादा है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मुस्लिम समुदाय की शिक्षा दर अन्य समुदायों की तुलना में काफी कम है. इस समुदाय को सरकारी नौकरियों और भर्ती प्रक्रियाओं में भी भेदभाव का सामना करता है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है.

धार्मिक किताबों पर प्रतिबंध

वहीं, धारा 370 को हटाने के बाद मोदी सरकार ने जमकर अपनी पीठ थपथपाई थी. कश्मीर को जन्नत बनाने का वादा किया था. हालात काफी हद तक सामान्य भी हैं लेकिन इसके लिए कश्मीरियों को काफी बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ी है. पहले तो इंटरनेट बैन जैसी चीजें देखने को मिली थी और अब हाल ही में कश्मीर में प्रशासन द्वारा इस्लामिक संगठनों से जुड़ी किताबों पर प्रतिबंध लगाए गए हैं और उन किताबों को बेचने वालों पर कार्रवाई जैसी चीजें देखने को मिली हैं, जिससे देश में धार्मिक स्वतंत्रता पर सवाल उठते हैं.

गोधरा कांड की आड़ में प्रताड़ना?

आपको बता दें कि पिछली घटनाएँ, जैसे गोधरा कांड, आज भी मुस्लिम समुदाय की पहचान और सुरक्षा को प्रभावित करती हैं. इन घटनाओं की छाया में, समुदाय अपनी सुरक्षा और पहचान को लेकर चिंतित रहता है. अक्सर दूसरे समुदाय के तमाम लोग इन घटनाओं की आड़ में मुस्लिम समुदाय पर फब्तियां कसते नजर आते हैं और अंजाम भुगतने की बात करते हैं. यानी कुल मिलाकर कहें तो देश में मुसलमानों की स्थिति अपने सबसे बुरे दौर में है. कोई उनकी सुनने वाला नहीं है, कोई उनके लिए बोलने वाला नहीं है, कोई उनके साथ खड़ा होने वाला नहीं है.

मुसलमानों के साथ देश में जो हो रहा है वह संविधान की मूल भावना के अनुरूप तो कदापि नहीं है. साथ ही ऐसी घटनाओं से धर्मनिरपेक्षता पर भी सवाल खड़े होते हैं. ऐसे में यह कहा जा सकता है कि संविधान द्वारा प्रदान की गई समानता का अधिकार तभी सार्थक होगा जब सभी समुदायों को समान अवसर और सुरक्षा मिले. मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों का समाधान करने के लिए समावेशी नीतियाँ और संवेदनशील दृष्टिकोण आवश्यक हैं. यह सुनिश्चित करना हमारा सामूहिक कर्तव्य है कि प्रत्येक नागरिक को संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार और सम्मान प्राप्त हो.

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