Gurdwaras in Gujarat: सिख धर्म एक ऐसा धर्म है जो कभी भी अपनी मूल्य विचारों और गुरु परंपरा से खुद को अलग नहीं करता गुरुओं के वाणी और उनके वचनों को शब्द ब शब्द मानना ही सिख धर्म की सबसे खास बात है वह चाहे दुनिया के किसी भी कोने में रहे लेकिन अपनी परंपराओं अपने मूल संरचनाओं और अपनी मिट्टी को कभी नहीं भूलते खासकर जिन स्थानों पर गुरु साहिबान ने अपने कदम रखे वह स्थान तो सिखों के लिए वैसे ही सबसे पवित्र हो गया। कई ऐसे राज्य कई ऐसे स्थान है जो हर एक सिख के लिए बेहद मायने रखते हैं और उन्हें में से एक है गुजरात जहां सिखों के पहले गुरु नानक देव जी ने आनंद पाठ किया था जहां उन्होंने पहली बार श्री जगन्नाथ पूरी को देखकर भाव विभोर हो आरती की रचना की थी, जहां उन्होंने समुद्र के खारे पानी के बीच मीठे पानी की धारा बहाई थी। गुरु साहिब के गुजरात आगमन के सम्मान में कई गुरुद्वारों का निर्माण कराया गया। अपने स लेख में हम गुजरात में मौजूद 5 प्रमुख गुरुद्वारों के बारे में जानेंगे, जो वहां गुरु साहिब के पहली और उदासी के दौरान यात्रा के समय गुजरात आने की याद दिलाता है।
1. गुरुद्वारा लखपत साहिब – Gurdwara Lakhpat Sahib
गुजरात के बीहड़ रेगिस्तान कच्छ के एक फेमस कस्बे लखपत में स्थित गुरुद्वारा लखपत साहिब गुरुद्वारा श्री नानक दरबार साहिब या गुरुद्वारा पहली पातशाही के नाम से भी जाना जाता है, कहते है कि गुरु साहिब अपनी दूसरी उदासी (1506–1513) के बीच और चौथी उदासी 1519 से 1521 के बीच में दो बार गुजरात की यात्रा पर आये थे। औऱ वो कच्छ के लखपस कस्बे में भी कुछ समय के लिए रूके थे। यहां गुरुसाहिब ने अपने ज्ञान प्रकाश से लोगो को इस कदर प्रभावित किया था कि यहां उनके सम्मान में गुरूद्वारा लखपत साहिब बनावाय गया। इस गुरुद्वारे की महत्ता इसलिए भी बहुत ज्य़ादा है क्योंकि यहां पर गुरु साहिब की लकड़ी की खड़ाऊँ, एक पालकी (पंगूड़ा), प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथ भक्तो के लिए रखा हुआ है। उनके अलावा उदासी सम्प्रादाय के दो प्रमुख संतो से जुड़े ग्रंथ भी रखे हुए है। गुजरात राज्य पुरातत्व विभाग ने इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया है, वहीं 2004 में UNESCO एशिया-पैसिफिक अवॉर्ड ऑफ डिस्टिंक्शन मिलने के बाद इस गुरुद्वारे को वैश्विक पहचान मिली। एक समय पर ये स्थान बहुत बड़ा बंदरगाह और व्यापारिक केंद्र हुआ करता था। ये गुरुद्वारा पारंपरिक गुरुद्वारो के बजाये गुजराती वास्तुकला और उदासी डेरे की शैली में बनाया गया है। इसका प्रवेश द्वार दो मंजिला है। और 34 मीटर का एक विशाल निशानसाहिब स्थापित है। एक बहुत बड़ा दरबार हॉल है। वहीं गुरुद्वारे के परिसर में पीना पानी का एक कुआं है जिसका पानी कभी नहीं सूखता।
2. गुरुद्वारा साहिब भाई मोहकम सिंह – Gurdwara Sahib Bhai Mohkam Singh
1699 में जब दसवे पातशाह गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा की स्थापना की थी, तब उन्होंने अपने पंज प्यारे चुने थे। जो धर्म की लौ को आगे ले जाने वाले बने। उनमें से ही एक थे भाई मोहकम सिंह। जो कि देवभूमि द्वारा जिले के बेट द्वारा के रहने वाले थे। 1705 में चमकौर के युद्ध में मुगलो के खिलाफ लड़ते हुए भाई मोहकम सिंह शहीद हो गए थे। उनके सम्मान में ही उनके जन्म स्थान पर गुरुद्वारा साहिब भाई मोहकम सिंह का निर्माण कराया गया। सिख इतिहासकारों की माने तो भाई मोहकम सिंह के पूर्वजों के घर पर खुद पहले गुरु गुरू नानक देव जी भी आकर रूके थे। ये गुरुद्वारा चारो तरफ से समुद्र से घिरा हुआ है। 2007 में इसकी जीर्णोधार किया गया और इसे बेहद भव्य, और पारंपरिक गुरुद्वारों की शैली में बनाया गया। ये स्वर्ण मंदिर के तर्ज पर बना है जिसे सफेद संगमरमर से बनाया गया हैएक मुख्य गुंबद औऱ चार छोटे छोटे गुंबद इसकी शान बढ़ा रहे है। वहीं 24 घंटे चलने वाला लंगर हॉल है, साथ ही आने वाले भक्तो के लिए सराय भी बनाये गए है।
3. गुरुद्वारा चादर साहिब – Gurudwara Chadar Sahib
भरूच शहर में बहने वाली नर्मदा नदी के किनारे बना एक ऐतिहासिक गुरुद्वारा चादर साहिब पहले गुरु गुरु नानक देव जी की याद में बनाया गया है। यहां गुरुसाहिब ने साधु महात्माओं को आध्यत्म की सच्ची शक्ति दिखाते हुए एक चादर पर नर्मदा नदीं को पार किया था। कहा जाता है कि यहां के तब के नवाब ने गुरु साहिब को नदी पार न कराने के लिए मल्लाह को सख्त हिदायत दी थी। लेकिन गुरुसाहिब ने इंक ओंकार का नाम लिया औऱ नदी में चादर बिठा कर खुद और भाई मरदाना के साथ बैठ गए, औऱ नदी पार कर गए। उनके इस चमत्कार के कारण यहां गुरुद्वारा बनाया गया, जिसे गुरुद्वारा चादर साहिब कहा गया। सफेद संगमरमर से बना ये गुरुद्वारा बेहद भव्य है, जिसमें एक बड़ा प्रार्थना हॉल है औऱ 24 घंटे चलने वाला लंगर है। गुरुद्वारे के ऊपर एक बड़ा सा गुंबद है, जहां स्वर्ण कलश बना है। और ये गोल्डन ब्रिज से भी साफ देखा जा सकता है। नर्मदा नदी की साधना करने वाले भक्त यहां भी दर्शन करने आते है।
4. नानकवाड़ी गुरुद्वारा साहिब – Nanakwadi Gurdwara Sahib
वडौदरा बड़ौदा शहर के खंडेराव बाजार में बना ऐतिहासिक गुरुद्वारा नानकवाड़ी साहिब, पहले पातशाह के चरण कमलो के वडोदरा की जमीन को छूने की याद दिलाता है। दूसरी उदासी में गुरु साहिब भरूच से लौटते वक्त यहीं रूके थे। उस वक्त ये स्थान जर्जर और टूटा फूटा एक मंदिर हुआ करता था, वहीं पास में एक कुआं था, जहां गुरुसाहिब ने कुएं में स्नान किया था.. तब से लेकर आज कर ये कुआं कभी सूखा ही नही.. वहीं गुरु साहिब के आगमन से पवित्र हुए इस स्थान पर गुरुद्वारा नानकवाड़ी गुरुद्वारा साहिब का निर्माण कराया गया। कहा जाता है कि यहां पिछले 500 सालो से रोजाना बिना व्याधान के गुरबाणी का पाठ हो रहा है।
5. गुरुद्वारा गोबिंद धाम साहिब – Gurudwara Gobind Dham Sahib
अहमदाशहर के सरखेज गांधीनगर हाइवे पर मौजूद एक भव्य सिख गुरुद्वारा, गुरुद्वारा गोबिंद धाम साहिब दसवे गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी को समर्पित है। इस गुरुद्वारे को सिख संगतो ने मिलकर 1994 में बनवाया था। जहां उनके संगत का, संगत के लिए, संगत द्वारा” मूल सिद्धांत पर बनाया गया है। ये गुरुद्वारा सफेद औऱ सुनहरे पत्थरो से बनाया गया है। यहां के लंगर हॉल को गुजरात का सबसे बड़ा कम्युनिटी कीचन माना जाता है। ये है गुजरात के 5 भव्य गुरुद्वारे, जो सिख धर्म की शान बढ़ा रहे है।








































