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सुप्रीम कोर्ट: सभी महिलाएं सुरक्षित और कानूनी गर्भपात की हकदार

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सभी महिलाएं एक सुरक्षित और कानूनी गर्भपात प्रक्रिया की हकदार

गुरुवार, 28 सितम्बर को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने महिलाओं के गर्भपात (Abortion) पर  एक बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस ऐतिहासिक फैसले में कहा कि सभी महिलाएं एक सुरक्षित और कानूनी गर्भपात प्रक्रिया की हकदार हैं और इस संबंध में एक विवाहित और अविवाहित महिला के बीच कोई भेद करना गैरकानूनी है। सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट के तहत ‘वैवाहिक रेप’ भी रेप की श्रेणी में आता है।

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क्या था पूरा मामला

सुप्रीम कोर्ट के सामने यह मामला तब सामने आया जब एक 25 वर्षीय अविवाहित महिला ने दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था और अपनी 23 सप्ताह और 5 दिन के गर्भपात को समाप्त करने की मांग की थी। महिला ने अदालत के सामने यह दावा किया था कि उसकी गर्भावस्था आपसी सहमति के रिश्ते का परिणाम थी, लेकिन अविवाहित होने के कारण वह इस बच्चे को जन्म नहीं दे सकती थी। महिला ने आगे अदालत को आगे बताया कि, उसके साथी ने उससे शादी करने से इनकार कर दिया था। जिसके बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में भेज दिया था।

जिसके बाद 21 जुलाई, 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश जारी किया, जिसमें महिला को एम्स दिल्ली (AIMS Delhi) द्वारा बुलाई गई एक मेडिकल टीम के अधीन अपनी गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दी गई थी।

पहले क्या था गर्भपात पर कानून

1960 के दशक तक भारत में गर्भपात गैरकानूनी था और ऐसा करने पर एक महिला के लिये भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 312 के तहत तीन वर्ष की कैद अथवा ज़ुर्माने का प्रावधान किया गया था। डॉ. शांतिलाल शाह की अध्यक्षता वाले समूह को गर्भपात के मामले की जांच करने तथा यह तय करने के लिये कहा गया था कि क्या भारत को इसके लिए कोई कानून की आवश्यकता है?

जिसके बाद शांतिलाल शाह समिति ने एक मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट पेश की। इस मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) 1971, एक्ट के तहत चिकित्सक द्वारा गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दी गई। इस एक्ट के तहत 5 महीने के गर्भ को गिराने की भी मंजूरी दी गई थी। इस अधिनियम के तहत 24 हफ्ते के बाद गर्भपात के लिए कोई खास और ठोस वजह का होना जरूरी है। मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी रूल्स को 2021 में संशोधित किया गया था। कोर्ट का कहना था कि आपसी सहमति से प्रेंगनेंट होने वाली अविवाहित महिला उन श्रेणियों में शामिल नहीं थी।

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