Rituals of Entering Gurudwara: वैसे तो सिख धर्म में दया और सेवा भावना को सर्वोपरि माना गया है, और यह समाज दूसरों की निःस्वार्थ सहायता के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गुरुद्वारे में प्रवेश करने से पहले पांव क्यों पखारे जाते हैं? अगर नहीं, तो चलिए इस लेख के जरिए आज हम आपको सिख धर्म की इस पवित्र परंपरा के इतिहास और महत्व से रूबरू करवाते हैं।
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प्रथम गुरु के समय से चली आ रही ये परंपरा
आपको बता दें कि गुरुद्वारे में प्रवेश करने से पहले हाथ-पैर धोने (पांव पखारने) (Rituals of Entering Gurudwara ) की परंपरा सिख धर्म के संस्थापक प्रथम गुरु, गुरु नानक देव जी के समय से ही चली आ रही है। सिख इतिहास और मर्यादा के अनुसार, इसे किसी विशेष कर्मकांड के रूप में नहीं, बल्कि स्वच्छता, विनम्रता और समानता के सिद्धांत को स्थापित करने के लिए शुरू किया गया था।
दरअसल, प्राचीन काल में लोग लंबी दूरियां पैदल या खड़ाऊ में तय करते थे, जिससे पैरों में धूल-मिट्टी लग जाती थी। गुरुद्वारे के भीतर ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ का प्रकाश होता है, जिन्हें सिख धर्म में जीवित गुरु का दर्जा प्राप्त है। इसलिए, उस पवित्र स्थान की स्वच्छता और मर्यादा बनाए रखने के लिए अंदर जाने से पहले पैर धोना अनिवार्य किया गया।
सिख धर्म में हउमै को आध्यात्मिक प्रगति का माना बाधक
स्वच्छता के साथ-साथ, इस परंपरा (Rituals of Entering Gurudwara ) का दूसरा सबसे बड़ा कारण है ‘विनम्रता’। सिख धर्म में अहंकार यानी ‘हउमै’ को आध्यात्मिक प्रगति का सबसे बड़ा बाधक माना गया है। जब कोई व्यक्ति झुककर अपने पैर धोता है, तो यह इस बात का प्रतीक है कि वह अपने सामाजिक पद, धन और अहंकार को बाहर छोड़कर, गुरु के दरबार में एक साधारण सेवक की तरह प्रवेश कर रहा है।
विनम्रता के इस भाव के साथ ही, यह परंपरा ‘समानता’ का भी संदेश देती है। गुरुद्वारे का नियम राजा और रंक, दोनों के लिए एक समान है। चाहे कोई कितना भी अमीर या शक्तिशाली क्यों न हो, सबको एक ही स्थान पर पैर धोकर ही अंदर जाना पड़ता है, जो जात-पात और ऊंच-नीच के भेदभाव को पूरी तरह समाप्त करता है।
अंधविश्वास या पौराणिक ‘चरणामृत’ प्रथा
पुराने समय से लेकर आज तक, कई ऐतिहासिक गुरुद्वारों में आने वाले श्रद्धालुओं यानी ‘संगत’ के पैर धोने और उनके जूते संभालने (जोड़ा घर की सेवा) का कार्य स्वयंसेवक यानी ‘सेवादार’ करते हैं। खुद गुरु साहिबान ने अपने हाथों से संगत के पैर धोकर सेवा की वह महान मिसाल पेश की थी, ताकि उनके शिष्यों में निश्छल सेवा भाव पैदा हो सके।
यहाँ यह समझना भी बेहद ज़रूरी है कि कुछ लोग इस परंपरा को अंधविश्वास या पौराणिक ‘चरणामृत’ प्रथा से जोड़कर देखने लगते हैं। लेकिन सिख रहत मर्यादा के अनुसार, गुरुद्वारे के प्रवेश द्वार पर बने कुंड के पानी को पीना या उसे चमत्कारी मानना पूरी तरह वर्जित है। यह व्यवस्था किसी अंधविश्वास के लिए नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से आदर, शुचिता (स्वच्छता) और अनुशासन बनाए रखने के लिए बनाई गई एक बेहद सुंदर व्यवस्था है। तो आपको सिख धर्म में पांव पखारने (Rituals of Entering Gurudwara ) की इस पवित्र परंपरा से जुड़ी यह जानकारी कैसी लगी?































