Gayaji Janardan Temple: क्या आपने कभी सुना है कि कोई इंसान खुद के जीते-जी अपना पिंडदान कर दे? सनातन धर्म में पितृ पक्ष का समय पूर्वजों के तर्पण और पिंडदान के लिए बेहद पवित्र माना गया है। अमूमन यह रस्म मृत्यु के बाद संतान या परिजनों द्वारा निभाई जाती है। लेकिन बिहार के गयाजी का जनार्दन स्वामी मंदिर इस परंपरा का एक अनोखा अपवाद है।
यह दुनिया का इकलौता ऐसा मंदिर है जहां कोई भी व्यक्ति जीते-जी अपना पिंडदान और आत्मश्राद्ध कर सकता है। भस्मकूट पर्वत पर स्थित इस मंदिर में 3 दिनों तक चलने वाले बेहद खास और गुप्त अनुष्ठानों के जरिए लोग अपने मोक्ष का मार्ग सुनिश्चित करते हैं। तो चलिए इस लेख के जरिए विस्तार से जानते हैं कि क्या है इसकी विधि और क्यों किया जाता है यह आत्मश्राद्ध।
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Janardan Temple में होता है आत्मश्राद्ध
आपको बता दें कि बिहार के गयाजी में स्थित जनार्दन मंदिर पूरी दुनिया का इकलौता ऐसा मंदिर है, जहाँ जीवित व्यक्ति अपने मोक्ष के लिए जीते-जी अपना पिंडदान और आत्मश्राद्ध करता है। यह अनोखा मंदिर गया के भस्मकूट पर्वत पर माँ मंगला गौरी मंदिर के उत्तर में स्थित है, जहाँ भगवान विष्णु ‘जनार्दन स्वरूप’ में विराजमान हैं।
क्यों करते है जीते-जी अपना ही पिंडदान
हिंदू शास्त्रों और सनातन परंपरा के अनुसार, हर व्यक्ति जीते-जी अपना आत्मश्राद्ध या पिंडदान नहीं कर सकता। इसके पीछे कुछ बेहद खास और जरूरी वजहें होती हैं, जिनकी वजह से लोग इस अनोखे जनार्दन मंदिर में आते हैं:
जिन लोगों की कोई संतान (बेटा या बेटी) नहीं होती या परिवार में कोई ऐसा सगा संबंधी नहीं होता जो उनकी मृत्यु के बाद श्राद्ध कर्म कर सके, वे अपने मोक्ष की चिंता में जीवित रहते हुए ही यह रस्म पूरी कर लेते हैं।
जो लोग घर-परिवार और संसार का त्याग कर संन्यासी, साधु या वैरागी बन जाते हैं, उनके लिए सांसारिक रिश्ते खत्म हो जाते हैं। ऐसे लोग संन्यास दीक्षा लेने से पहले या बाद में स्वयं का पिंडदान करते हैं ताकि वे पूरी तरह सांसारिक बंधनों से मुक्त हो सकें।
कई बार लोगों को यह शंका होती है कि उनकी मृत्यु के बाद उनके परिजनों द्वारा ठीक से श्राद्ध कर्म किया जाएगा या नहीं। यमलोक के कष्टों से बचने और सीधे परमधाम (मोक्ष) का टिकट पक्का करने के लिए भी लोग जीते-जी आत्मश्राद्ध करते हैं।
आत्मश्राद्ध करने की सबसे बड़ी धार्मिक मान्यता
जनार्दन मंदिर (Janardan Temple) में जीवित रहते हुए आत्मश्राद्ध करने की सबसे बड़ी धार्मिक मान्यता यही है कि इसके बाद व्यक्ति के मरने पर परिजनों को दोबारा कोई श्राद्ध कर्म या पिंडदान नहीं करना पड़ता।
शास्त्रों के अनुसार, जब कोई व्यक्ति जीते-जी अपना आत्मश्राद्ध कर लेता है, तो वह धार्मिक रूप से सांसारिक मोह-माया और कर्मों के बंधनों से मुक्त मान लिया जाता है।
मान्यता है कि इस विधि को पूरा करने के बाद व्यक्ति की आत्मा को मृत्यु के पश्चात यमलोक के कष्ट नहीं भोगने पड़ते और न ही उसे प्रेत योनि में भटकना पड़ता है। शरीर त्यागने के बाद आत्मा सीधे भगवान विष्णु के परमधाम (मोक्ष) को प्राप्त होती है।
क्योंकि व्यक्ति का श्राद्ध पहले ही संपन्न हो चुका होता है, इसलिए मृत्यु के बाद उसके परिवार वालों को केवल अंतिम संस्कार (दाह संस्कार) और सूतक के जरूरी नियमों का पालन करना होता है। उनके लिए गयाजी आकर दोबारा पिंडदान करना अनिवार्य नहीं रह जाता।
3 दिनों तक चलने वाली रस्में और विधि
गयाजी तीर्थस्थल पहुँचने पर श्रद्धालु सबसे पहले वैष्णव सिद्धि का संकल्प लेता है। इस दौरान वह अपने जीवन में जाने-अनजाने में हुए पापों का प्रायश्चित करता है। दूसरे दिन भगवान जनार्दन स्वामी के मंदिर (Janardan Temple) में विशेष पूजा-अर्चना और मंत्रों का जाप होता है। इसके बाद दही और चावल से बने 3 पिंड भगवान को अर्पित किए जाते हैं।
इस पिंडदान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें तिल का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं होता, जबकि मृत पूर्वजों के श्राद्ध में तिल अनिवार्य माना जाता है। अंतिम दिन गदाधर स्वामी की महापूजा और अभिषेक के साथ यह तीन दिवसीय अनुष्ठान पूरी तरह संपन्न होता है, जिससे व्यक्ति का आत्मश्राद्ध पूरा माना जाता है।













































