PC Act 1988 explained: सरकारी दफ्तरों में अक्सर लोगों को काम कराने के लिए रिश्वतखोरी या सिफारिश की खबरें सुनने को मिलती हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि कानून की नजर में सरकारी कुर्सी पर बैठकर गलत फायदा उठाना कितना बड़ा जुर्म है?देश में सरकारी महकमों से भ्रष्टाचार की जड़ें काटने और भ्रष्ट अधिकारियों पर नकेल कसने के लिए जो सबसे मजबूत कानूनी हथियार इस्तेमाल होता है, वह है Prevention of Corruption Act, 1988 यानी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (PC Act 1988)।इस कानून का मुख्य मकसद सरकारी व्यवस्था को साफ-सुथरा बनाना और जनता के अधिकारों की रक्षा करना है।
क्या है PC Act 1988? PC Act 1988 explained
Prevention of Corruption Act, 1988 भ्रष्टाचार से जुड़े अपराधों को रोकने और उनसे निपटने के लिए बनाया गया कानून है। इसमें वर्ष 2018 में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए थे, जिनके बाद रिश्वत लेने और देने से संबंधित प्रावधानों में बदलाव हुआ। इस कानून के तहत लोक सेवकों द्वारा अनुचित लाभ लेने, सरकारी पद का गलत इस्तेमाल करने और कुछ परिस्थितियों में रिश्वत देने वाले व्यक्तियों के खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है।
सिर्फ बाबू ही नहीं, मंत्री और बैंक अफसर भी इसके दायरे में
आम तौर पर लोग समझते हैं कि यह कानून सिर्फ छोटे-मोटे सरकारी क्लर्कों पर लागू होता है, लेकिन हकीकत में इसका दायरा बहुत बड़ा है। अधिनियम की धारा 2(c) के तहत ‘लोक सेवक’ (Public Servant) की परिभाषा काफी विस्तृत है। इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के अधिकारियों के अलावा मंत्री, सांसद, विधायक, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) के कर्मचारी, सरकारी बैंकों के मैनेजर और यहां तक कि सरकारी अनुदान पाने वाले शिक्षण संस्थानों के पदाधिकारी भी आते हैं। यानी कोई भी व्यक्ति जो जनता से जुड़े आधिकारिक दायित्वों का निर्वहन कर रहा है, वह इस कानून की निगरानी में रहता है।
रिश्वत लेना और मांगना दोनों संगीन अपराध
इस कानून की सबसे अहम धारा 7 है। अगर कोई लोक सेवक अपने आधिकारिक काम के बदले किसी भी रूप में अनुचित लाभ यानी ‘रिश्वत’ मांगता है या स्वीकार करता है, तो यह सीधा संज्ञेय अपराध बनता है। इसके अलावा, यदि कोई अधिकारी अपने पद का गलत इस्तेमाल करके अपनी आय के ज्ञात कानूनी स्रोतों से कई गुना अधिक संपत्ति जुटाता है, तो धारा 13 के तहत उस पर ‘आपराधिक कदाचार’ और ‘आय से अधिक संपत्ति’ (Disproportionate Assets) का गंभीर मुकदमा दर्ज होता है। इसमें दोषी पाए जाने पर न्यूनतम 4 साल से लेकर 10 साल तक की कठोर कैद और भारी जुर्माने की सजा हो सकती है।
2018 का ऐतिहासिक संशोधन: रिश्वत देने वाले पर भी कार्रवाई
साल 2018 में संसद ने इस कानून में बड़े और क्रांतिकारी बदलाव किए। पहले कानूनी शिकंजा मुख्य रूप से रिश्वत लेने वाले पर कसता था, लेकिन संशोधन के बाद धारा 8 के तहत जानबूझकर किसी लोक सेवक को रिश्वत देना या उसकी पेशकश करना भी अपराध बना दिया गया। हालांकि, यदि किसी आम नागरिक को मजबूरी में या दबाव में आकर घूस देनी पड़े, तो उसे 7 दिनों के भीतर जांच एजेंसी को इसकी लिखित जानकारी देनी होती है ताकि वह कानूनी कार्रवाई से बच सके।
इसके साथ ही, ईमानदार अफसरों को झूठी शिकायतों से बचाने के लिए कानून में धारा 17A जोड़ी गई, जिसके तहत किसी भी अधिकारी के खिलाफ आधिकारिक फैसले की जांच शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी की पूर्व मंजूरी लेना अनिवार्य किया गया है। वहीं मुकदमों के जल्द निपटारे के लिए विशेष अदालतों में ट्रायल को 2 साल (अधिकतम 4 साल) के भीतर पूरा करने का समय भी तय किया गया है।
सीबीआई (CBI) और राज्यों की एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) जैसी जांच एजेंसियां इसी कानून के तहत ट्रैप ऑपरेशन चलाती हैं और भ्रष्ट अधिकारियों को रंगे हाथ दबोचकर सलाखों के पीछे भेजती हैं।













































